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Video- बच्चों, हम शर्मिंदा हैंः दिन में एक बार खाना, स्कूल के लिए 12 किमी. के पैदल रास्ते में तीन किमी. की चढ़ाई

सुबह स्कूल पहुंचने की जल्दी, खाने का मन नहीं होता, शाम को एक बार ही खाना खाती हैं ये बेटियां

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

देहरादून जिले के कंडोली गांव में रहने वालीं 12वीं कक्षा की छात्रा सोनी और उनसे छोटी दो बहनें सपना और दीक्षा प्रतिदिन सुबह सात बजकर 45 मिनट पर अपने घर से स्कूल के लिए निकलती हैं। इनको स्कूल ने छूट दी है कि वो तय समय से 15 मिनट देरी से पहुंच सकते हैं, क्योंकि इनके घर से गडूल ग्राम सभा स्थित राजकीय इंटर कॉलेज, इठारना लगभग छह किमी. की पैदल दूरी पर है, जिसमें तीन किमी. खड़ी चढ़ाई है और फिर कहीं कच्चा व कहीं पक्का रास्ता है।

घने जंगल से होकर गुजरती पगडंडियां, जो संभवतः बरसाती पानी के बहाव से बनी हैं, इनसे होकर छात्राओं को विद्यालय जाना पड़ता है। कई जगह तो यह रास्ता किसी सूखी नहर की तरह दिखता है। सात साल से इसी रास्ते से स्कूल जा रही सोनी बताती हैं, पहले तो यह रास्ता भी नहीं था। गांववालों ने बच्चों के स्कूल जाने के लिए झाड़ियां काटकर, जगह-जगह पत्थर लगाकर रास्ता बनाया है। बरसात में यहां बहुत पानी बहता है।

कंडोली से इठारना तक का छह किमी. का रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है और कई जगह ऐसा है। फोटो- राजेश पांडेय

न्यूज लाइव और डुगडुगी ने हम शर्मिंदा है, पहल शुरू की है, जिसके तहत शनिवार सुबह कंडोली गांव के बच्चों के साथ राजकीय इंटर कॉलेज इठारना तक लगभग छह किमी. की पैदल यात्रा की गई। इस पहल का नेतृत्व कर रहे सामाजिक मुद्दों के पैरोकार और डुगडुगी के संस्थापक मोहित उनियाल के साथ, बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की मुहिम चला रही संस्था नियोविजन के संस्थापक गजेंद्र रमोला, आईटी प्रोफेशनल दीपक जुयाल भी शामिल रहे। इस मुहिम का उद्देश्य, पर्वतीय गांवों की महिलाओं और बच्चों के सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर करके समाधान की ओर बढ़ना है।

उनियाल बताते हैं, हम इसलिए शर्मिंदा हैं, क्योंकि सामाजिक जीवन में दो दशक गुजारने के बाद भी, हम अपने आसपास रहने वाले लोगों की किसी एक समस्या के समाधान के लिए कुछ नहीं कर पाए। इससे पहले, उन्होंने हल्द्वाड़ी गांव के बच्चों के साथ उनके धारकोट स्थित विद्यालय तक का करीब आठ किमी. का पैदल सफर किया था। तब बच्चों के सामने पढ़ाई के लिए विषम परिस्थितियों का मामला काफी चर्चा में रहा था।

शनिवार (19 फरवरी,2022) की सुबह करीब सात बजे हम लोग कंडोली गांव पहुंच गए। हमने इन बेटियों के साथ उनके स्कूल तक का सफर शुरू किया। इन छात्राओं में सोनी 12वीं, सपना नौवीं और दीक्षा सातवीं कक्षा में पढ़ती हैं। तीनों छात्राएं घर से कुछ हल्का फुल्का खाकर स्कूल जाती हैं, जिसमें चाय, बिस्किट या फिर रोटियां होती हैं। पर, इनका यह ब्रेक फास्ट प्रतिदिन का नहीं है, कई दिन तो केवल चाय पीकर ही स्कूल जाना पड़ता है। कभी स्कूल जाने की जल्दी होती है और कभी इतनी सुबह कुछ खाने का मन नहीं करता। ये दिनभर में लगभग 12 किमी. पैदल चलने के बाद शाम करीब पांच बजे तक घर पहुंचती हैं।

देहरादून जिला के कंडोली से इठारना स्कूल जाते हुए रास्ते में खरक गांव के स्रोत से दीक्षा ने पानी की बोतल भरी। दीक्षा बताती हैं कि उनके गांव में करीब डेढ़ माह से पानी नहीं आ रहा है। फोटो- राजेश पांडेय

सोनी बताती हैं, स्कूल से घर लौटकर शाम पांच बजे तक ही खाना खा पाते हैं। इसके बाद घर के कामकाज निपटाते हैं और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी करते हैं। मां और पिता भी बहुत काम करते हैं, हम पशुपालन में उनका हाथ बंटाते हैं। रात का खाना बनाना पड़ता है। समय मिलने पर पढ़ाई करते हैं। शाम पांच बजे खाना खाने के बाद कई बार ऐसा होता है कि रात को भोजन करने का मन नहीं होता। खाने में क्या होता है, के सवाल पर बच्चे बताते हैं- दाल-चावल, सब्जी, रोटी। इनमें ही कुछ पौष्टिक हो तो अच्छी बात है। पोषक तत्वों के नाम पर अलग से कुछ नहीं होता।

देहरादून जिला में कंडोली से इठारना की ओर करीब एक किमी. आगे बढ़कर खरक गांव है, जहां तीन घर हैं। यहां रहने वाले मोहन कक्षा दसवीं के छात्र हैं, जो इठारना स्थित स्कूल जाते हैं। फोटो- डुगडुगी

इनके घर से करीब एक किमी. बाद खरक नाम का गांव है, जहां तीन घर हैं, जिनके बीच काफी दूरी है। यहीं एक घर से मोहन भी पढ़ाई के लिए राजकीय इंटर कॉलेज इठारना जाते हैं, वो इस बार दसवीं की बोर्ड परीक्षा के लिए तैयार हैं। मोहन भी इन्हीं बच्चों के साथ स्कूल जाते-आते हैं। वो भी पौष्टिकता के नाम पर ऐसा कुछ नहीं खाते, जिसकी बढ़ती उम्र के बच्चों को जरूरत होती है। मोहन बताते हैं, उनके भोजन में भी दाल, चावल, सब्जी रोटी ही होते हैं।

दसवी कक्षा के छात्र मोहन खरक गांव में रहते हैं। घर से इठारना स्कूल जाते हुए मोहन। फोटो- राजेश पांडेय

मोहन बताते हैं, उनकी पढ़ाई में सबसे बड़ी समस्या सड़क की है। हमारे गांव तक सड़क पहुंच जाती तो, स्कूल जाने-आने में इतना समय नहीं लगता। सभी बच्चे साइकिलों से स्कूल जाते। सामने पहाड़ की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, वो देखो वहां मेरा घर है। घर पहुंचकर थक जाते हैं और फिर घर के काम भी तो हैं। स्कूल से आकर बकरियां चराने ले जाता हूं। छुट्टी के दिन ही पढ़ाई के लिए समय मिल पाता है।

यह सवाल बहुत गंभीर है…सोनी एक गंभीर सवाल उठाते हुए कहती हैं, मैं सात साल से इस खराब रास्ते से होकर स्कूल जा रही हूं। मेरी इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी होने वाली है। मुझे अपने छोटे भाई बहनों की चिंता है, जिनको इस रास्ते पर कई वर्ष तक चलना होगा। सरकार को यहां सड़क बना देनी चाहिए या फिर दूर से आने वाले बच्चों के लिए स्कूल के पास छात्रावास बनाए। उनका कहना है, जब सूर्याधार झील बनी, तो गांव वालों को पता चला कि मंदिर (इठारना के मंदिर) तक सड़क बनेगी। हम बहुत खुश हुए, चलो स्कूल तक जाने में दिक्कत नहीं होगी। पर, ऐसा कुछ नहीं हुआ। जिस रास्ते से होकर हम स्कूल जाते हैं, वहां दूर-दूर तक न तो घर हैं और न ही कोई दिखता है। किसी कष्ट में किसको पुकारेंगे।

कंडोली गांव की 12वीं की छात्रा सोनी को प्रदेश सरकार ने पढ़ाई के लिए टैबलेट दिया है। सोनी और उनकी बहनें दीक्षा व सपना इठारना स्थित स्कूल जाते हुए रास्ते में एक जगह बैठकर टैबलेट में मैथ के फार्मूले देख रहे हैं। फोटो- राजेश पांडेय

कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में रहने, शिक्षा हासिल करने के बाद भी इन बच्चों को शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते। उनके विद्यालय में आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए मिड डे मील की व्यवस्था है। ये बच्चे दोपहर का भोजन स्कूल में करते हैं, पर नौवीं कक्षा और इससे अधिक कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को मिड डे मील नहीं मिलता।

देहरादून के कंडोली गांव से बच्चों के साथ उनके स्कूल तक के छह किमी. के पैदल सफर पर जाने से पहले कंडोली स्थित अशोक रावत के आवास पर। फोटो- डुगडुगी

कंडोली निवासी अशोक रावत बताते हैं, लंबी दूरी तय करने में समय लगता है, इसलिए बच्चों को सुबह बहुत जल्दी स्कूल जाना होता है। सुबह-सुबह खाने का मन नहीं होता, इसलिए वो चाय, बिस्किट खाकर ही स्कूल चले जाते हैं। पढ़ाई के लिए ये बच्चे बहुत परिश्रम करते हैं, उस हिसाब से इनके लिए संतुलित और पौष्टिक भोजन की आवश्यकता है। घर में पशुपालन की वजह से दूध, मट्ठा उपलब्ध रहता है। यहां खेतों में जो भी कुछ उगता है, वो जैविक है। पौष्टिकता के नाम पर यही सबकुछ है, भोजन में कुछ अलग नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात है, हमारे गांव की बेहतर आबोहवा, जो हमें स्वस्थ रखती है।

देहरादून जिला के इठारना स्थित इंटर कालेज के भौतिक विज्ञान के शिक्षक सतेंद्र नेगी (दाएं से तीसरे) के साथ बच्चे और डुगडुगी की टीम। फोटो- डुगडुगी

राजकीय इंटर कॉलेज इठारना में भौतिक विज्ञान के शिक्षक सतेंद्र नेगी कहते हैं, यदि इठारना को छोड़ दिया जाए तो बाकि सभी बच्चे दूरस्थ गांवों से आते हैं। इनके सामने बहुत सारी समस्याएं हैं। ये विज्ञान वर्ग के छात्र हैं। शहरों में रहने वाले बच्चों को कोचिंग की सुविधा मिल जाती है, पर इनको नहीं। यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि इनका पाठ्यक्रम पूरा कराने में शतप्रतिशत योगदान दें। शिक्षक इनका पाठ्यक्रम दिसंबर माह तक पूरा कराकर दो माह रीविजन में लगाते हैं। सात-आठ साल से  विद्यालय का परीक्षा परिणाम शतप्रतिशत रहा है।

कठिन परिश्रम करने वाले बच्चों को पौष्टिक भोजन क्यों नहीं

राजकीय इंटर कालेज इठारना में ज्यूलीं, मादसी, कंडोली, छिछियाड़ी, सहित कई ऐसे गांवों से बच्चे पहुंचते हैं, जिनकी दूरी छह से दस किमी. तक बताई जाती है। उनियाल बताते हैं, पूरे उत्तराखंड में ऐसे बहुत से गांव हैं, जहां से बच्चे पढ़ाई के लिए प्रतिदिन 16 किमी. से भी अधिक पैदल दूरी तय करते हैं। पर, सरकारी स्तर पर इन बच्चों के स्वास्थ्य और पौष्टिक भोजन के लिए कोई विशेष पहल सामने नहीं आई है। अधिक दूरी चलकर स्कूल पहुंचने वाले बच्चों के लिए मिड डे मील का प्रावधान होने की आवश्यकता है। चाहे ये बच्चे नौवीं या इससे अधिक कक्षा के छात्र-छात्राएं हों।

देहरादून जिला स्थित राजकीय इंटर कालेज इठारना स्थित विद्यालय। इस विद्यालय भवन का निर्माण चल रहा है, इसलिए कक्षाएं स्थानीय राजकीय स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में चल रही हैं।  फोटो- सपना रावत, कक्षा 9

राजकीय इंटर कॉलेज इठारना में वर्तमान में डेढ़ सौ बच्चे पढ़ाई करते हैं, इनमें 60 फीसदी बालिकाएं हैं। इस विद्यालय में बड़ी संख्या में बच्चे दूर के गांवों से आते हैं, जिनमें बालिकाओं की संख्या ज्यादा है। नियोविजन के संस्थापक रमोला कहते हैं, दूरस्थ गांवों से स्कूल आने वाले बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण की जांच तथा भोजन में पौष्टिक तत्वों की आवश्यकता पर गंभीरता से विचार नहीं करना चिंताजनक बात है। विद्यालय स्तर पर यह व्यवस्था इसलिए नहीं हो रही है, क्योंकि उनके पास नौवीं एवं इससे अधिक कक्षा के बच्चों को मिड डे मील कराने के लिए न तो बजट की व्यवस्था है और न ही उनको अनुमति प्राप्त है। भोजन करने के समय में लंबा अंतराल एवं अधिक परिश्रम करने से बच्चों की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

राजकीय इंटर कालेज, इठारना के शिक्षकों के साथ। फोटो- डुगडुगी

हाल ही में जारी 2020-21 के एनएफएचएस- 5 (National Family Health Survey – 5) के अनुसार, उत्तराखंड में 15 से 19 वर्ष की बालिकाओं में 40.9 फीसदी बालिकाएं एनीमिया यानी रक्त की कमी की समस्या से ग्रस्त हैं, इनमें 41 फीसदी शहरी एवं 40.9 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों से हैं, जबकि 2015-16 के सर्वे में शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र का यह प्रतिशत 46.4 था। लड़कों की बात करें तो 2019-21 के सर्वे के अनुसार, 15 से 19 वर्ष के 27.6 फीसदी एनीमिया से पीड़ित हैं।

देहरादून जिला के कंडोली गांव से इठारना तक के रास्ते पर न्यूज लाइव संवाददाता राजेश पांडेय। फोटो- गजेंद्र रमोला

यूनीसेफ की किशोरों में पोषण पर एक रिपोर्ट में कहा गया है, भारत में दस से 19 वर्ष तक के 25.30 करोड़ किशोर-किशोरियां हैं। किशोरावस्था पोषण की दृष्टि से संवेदनशील समय होता है, जब तेज शारीरिक विकास के कारण पौष्टिक आहार की माँग में वृद्धि होती है। किशोरावस्था के दौरान लिए गए आहार संबंधी आचरण पोषण संबंधी समस्याओं में योगदान कर सकते हैं, जिसका स्वास्थ्य एवं शारीरिक क्षमता पर आजीवन असर रहता है। रिपोर्ट बताती है, भारत में किशोरों का एक बड़ा भाग, 40 फीसदी लड़कियां और 18 फीसदी लड़के एनीमिया (रक्त की कमी) से पीड़ित है। किशोरों में एनीमिया, उनके विकास, संक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरोध-शक्ति तथा बौद्धिक विकास और कार्य की उत्पादकता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन ए और आयोडीन सहित, विटामिन और खनिज की कमियों को रोकने के लिए भोजन का सुदृढ़ीकरण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

देहरादून जिला का कंडोली गांव गडूल ग्राम सभा में आता है, जहां से बच्चे छह किमी. का जंगल और जोखिमवाला रास्ता पार करके इठारना स्थित विद्यालय पहुंचते हैं। यह तीन किमी. चढ़ाई वाला रास्ता है। फोटो- डुगडुगी

नार्दर्न गैजेट के संपादक वरिष्ठ पत्रकार एसएमए काजमी कहते हैं, ये चिंताजनक हालात बच्चों के स्वास्थ्य, उनके करिअर के बारे में काफी कुछ सोचने को विवश करते हैं। बड़ी हैरत और दुख की बात है कि बच्चों को स्कूल जाने के लिए जोखिम वाले रास्तों से कई किमी. पैदल चलना पड़ता है। इन बच्चों के पोषण पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। इसमें तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक है।

ये छोटे बच्चे भी खूब पैदल चलते हैं
कंडोली निवासी विमला देवी। विमला देवी सोनी की मां हैं। फोटो- डुगडुगी

उधर, कंडोली में रहने वाले कक्षा पांच तक के बच्चों को लगभग दो किमी. सिल्ला चौकी के राजकीय प्राथमिक विद्यालय जाना पड़ता है। सोनी का छोटा भाई अभिषेक कक्षा चार में पढ़ता है। वह भी पढ़ाई के लिए प्रतिदिन चार किमी. पैदल चलता है। सोनी की मां विमला देवी बताती हैं, रास्ते के एक किनारे पर सूर्याधार झील है, पर यहां सुरक्षा दीवार नहीं बनाई है। बच्चे इस रास्ते से होकर जाते हैं, हमें चिंता बनी रहती है। अभी कुछ दिन पहले एक वाहन इस झील में गिर गया था।

देहरादून जिला स्थित सिल्ला चौकी के निवासी ये बच्चे कक्षा छह से आठ तक की कक्षाओं में पढ़ते हैं। इन स्कूल घर से लगभग सात किमी. दूर भोगपुर में है। ये रोजाना 14 किमी. पैदल चलते हैं। फोटो- राजेश पांडेय

कंडोली से भोगपुर के रास्ते में हमें कक्षा छह में पढ़ने वाले मनीषा व आयुष, कक्षा सात की छात्रा शिल्पा और कक्षा आठ के छात्र किशोर मिले। ये बच्चे सिल्लाचौकी में रहते हैं और भोगपुर स्कूल में पढ़ते हैं। इनके घर से स्कूल सात किमी. है, हालांकि यह पर्वतीय रास्ता नहीं है, पर छोटे बच्चे प्रतिदिन 14 किमी. पैदल चलते हैं। रास्ते में कोई वाहन मिल जाए, तो ये लिफ्ट लेकर भी स्कूल पहुंच जाते हैं।  पर, जिस दिन हमारी इनसे मुलाकात हुए, उस समय ये पैदल अपने घर जा रहे थे।

इठारना तक सड़क, पर सार्वजनिक परिवहन नहीं

इठारना में पहले इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई नहीं होती थी, तब बच्चे लगभग 15 किमी. दूर भोगपुर इंटर कॉलेज जाते हैं। ग्रामीण बताते हैं, तब भी पैदल ही जाते थे, क्योंकि उनके गांव तक पहले पक्की सड़क नहीं थी। अब भोगपुर से सड़क तो बन गई है, पर सार्वजनिक परिवहन के नाम पर एक ही वाहन है। यहां सार्वजनिक परिवहन नहीं होने की वजह ज्यादा लोगों का आवागमन नहीं होना है, जो लोग आवागमन करते हैं, उनके पास अपनी बाइक या चौपहिया वाहन हैं।

कंडोली से इठारना स्कूल जाते हुए बच्चों ने कैमरा दिखाने को कहा। सपना ने पूरा समय कैमरा अपने पास रखा और इठारना गांव और अपने स्कूल में बच्चों के बहुत सारे फोटो क्लिक किए। फोटो- डुगडुगी
समाधान जो हो सकते हैं

सामाजिक मुद्दों के पैरोकार मोहित उनियाल और गजेंद्र रमोला बच्चों की समस्याओं के कुछ समाधान बताते हैं। वो कहते हैं, स्कूल की भागदौड़ से बचाने को, इन बच्चों के लिए स्कूल के पास ही बोर्डिंग की व्यवस्था की जा सकती है। जब तक सड़क नहीं बन जाती, तब तक के लिए ऑनलाइन माध्यम से गांव में ही स्कूल लग सकता है। कोविड के दौर में ऑनलाइन कक्षाओं से पढ़ाई का खूब दावा किया गया था। जब वीडियो कान्फ्रेंसिंग पर विकास कार्यों की समीक्षा की जा सकती है, तो यहां वर्चुअल क्लास क्यों नहीं लगाई जा सकती। डिजीटल इंडिया का नारा तो यहां भी सफल होना चाहिए।

कंडोली से बच्चों के साथ इठारना स्थित स्कूल जाते हुए सामाजिक मुद्दों के पैरोकार मोहित उनियाल, गजेंद्र रमोला और आईटी प्रोफेशनल दीपक जुयाल। फोटो- डुगडुगी

वो सवाल उठाते हैं, जब राज्य में बड़ी -बड़ी टनल बनाई जा रही हैं, क्या इनके गांवों तक सड़क नहीं पहुंच सकती। क्या इन बच्चों के गांवों तक सड़क एवं पानी सहित अन्य सुविधाएं नहीं पहुंचनी चाहिए। जब तक सड़क नहीं बनती, तब तक वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर इन बच्चों को वहां से वैन से स्कूल आना-जाना कराया जा सकता, जहां संभव हो। इन बच्चों के पौष्टिक भोजन की व्यवस्था स्कूल में की जा सकती। हॉस्टल में रहने, भोजन -पानी की सुविधाएं प्रदान करके, इन बच्चों को खेल प्रशिक्षण में शामिल किया जा सकता है।

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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