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लंपी के संक्रमण से गाय की मौत ने छीना मधु की आजीविका का जरिया

लंपी बीमारी के संक्रमण को रोकने के लिए ये महत्वपूर्ण जानकारियां काम आएंगी

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

झड़ौंद गांव की मधु वर्मा की सात साल की गाय दस दिन से लंपी रोग से पीड़ित थी। गुरुवार सुबह साढ़े छह बजे गाय ने दम तोड़ दिया। इसी के साथ उनकी आजीविका का प्रमुख स्रोत खत्म हो गया। उनके पास दो छोटी बछिया रह गईं। यहां एक और दुखद पहलू यह है कि अंतिम संस्कार के लिए मृत गाय उठवाने के लिए लगभग सात घंटे तक मशक्कत करनी पड़ी। उन्होंने जेसीबी मंगाने के लिए फोन किया, पर कोई राहत नहीं मिल पाई। दोपहर डेढ़ बजे माजरी ग्रांट से पशु को उठाने के लिए एक लोडर की व्यवस्था हो पाई।

झड़ौंद गांव, देहरादून के डोईवाला ब्लाक का हिस्सा है, जहां अधिकतर परिवारों की आजीविका कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर है। बीमारी से गाय की मृत्यु के बारे में बात करते हुए मधु की आंखें नम हो जाती हैं। कहती हैं, “यह हमारे यहां ही जन्मी बच्ची थी। बहुत अच्छी गाय थी। अभी तक सुबह शाम छह लीटर दूध दे रही थी। अब इसकी दो बछिया बची हैं। इनमें एक बछिया में भी इसी बीमारी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं।”

मधु बताती हैं, “करीब दस- ग्यारह दिन पहले गाय के शरीर पर फोड़े (lump) निकल आए थे। हमें पता था कि पशुओं में बीमारी फैल रही है। तुरंत इलाज शुरू करा दिया। गाय ने चारा खाना बंद कर दिया था। दूध भी छह से आधा लीटर तक पहुंच गया। दो दिन से तो दूध भी नहीं दे रही थी। आज तड़के गाय खड़ी हुई थी। सुबह साढ़े छह बजे इसने प्राण त्याग दिए। अपने पशु को तड़पते देखकर हमारा मन नहीं कर रहा है कि भविष्य में पशु पालें।” उनका कहना है कि “नया पशु इस बीमारी के खत्म होने के बाद ही खरीदेंगे।”

मधु के पति प्रदीप वर्मा, जो प्राइवेट नौकरी करते हैं, बताते हैं, “काफी इलाज कराया, पर गाय को बचा नहीं सके। इलाज पर काफी खर्चा आ गया। गाय का बीमा नहीं था। हमारे पास घास बोने लायक ही खेतीबाड़ी है। गाय लगभग छह लीटर दूध प्रतिदिन देती थी। मात्र तीस रुपये प्रति लीटर दूध साइकिल वाले लेने आते हैं। पहले डेयरी से जुड़े थे, वहां मात्र 20 से 24 रुपये प्रति लीटर मिल रहा था। सरकार कहती है, किसानों की आय दोगुनी करेंगे। कैसे होगी आय दोगुनी, आप ही बताइए, सरकार की डेयरी से अच्छे तो साइकिल वाले हैं, जो 30 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से दूध खरीद रहे हैं।”

देहरादून के झड़ौंद गांव निवासी पशुपालक प्रदीप वर्मा की दुधारू गाय की लंपी रोग से मृत्यु हो गई। फोटो- राजेश पांडेय

“मैं जब गाय का दूध दस रुपये प्रति लीटर बेच रहा था, तब मुझे फायदा था, क्योंकि उस समय पशु आहार का कट्टा दो से ढाई सौ रुपये मिलता था। आज पशुआहार 14-15 सौ रुपये प्रति कट्टा मिल रहा है और दूध मात्र 30 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। वो तो अच्छा है कि हमारे पास अपने खेत से पशुओं का चारा मिल जाता है,” प्रदीप कहते हैं।

उधर, जब हम सिमलास गांव के दिनेश के घर पहुंचे तो उस समय वो गौशाला में धुआं कर रहे थे। बताते हैं, “धुएं से मच्छर, मक्खियां पशुओं के पास नहीं लगते।”

देहरादून के सिमलास गांव निवासी पशुपालक दिनेश की दुधारू गाय की लंपी रोग से मृत्यु हो गई। फोटो- राजेश पांडेय

उन्होंने बताया, “खेतीबाड़ी और पशुपालन ही आजीविका का जरिया हैं। गाय की मृत्यु से ऐसा लगा, जैसा घर का कोई सदस्य चला गया। तीन दिन तक खाना भी नहीं खाया गया। गाय लगभग 12 से 14 लीटर दूध दे रही थी। बीमारी की शुरुआत में गाय ने चारा खाना बंद कर दिया। मैंने समझा, हो सकता है गाय रात में रखा चारा नहीं खा रही है, लेकिन बाद में गाय के शरीर पर दाने पड़ गए। मैंने स्वयं के खर्चे पर इलाज कराया। अब हमारे पास दो पशु रह गए।”

देहरादून के सिमलास गांव निवासी पशुपालक दिनेश की बछिया के खुर के पास गांठ से घाव बन गया। फोटो- राजेश पांडेय

दिनेश बताते हैं कि ” उनकी बछिया के गर्भाधान का समय था, पर गाय का इलाज कराने की भागदौड़ में बछिया का गर्भाधान भी नहीं करा पाए। उनकी छोटी बछिया के खुर के पास गांठ बनी है, इसका इलाज भी करा रहे हैं। ”

देहरादून के सिमलास गांव निवासी पशुपालक कांति देवी। फोटो- राजेश पांडेय

दिनेश की मां कांति बताती हैं, “नई गाय खरीदने के लिए पैसा चाहिए। कम से कम 40-45 हजार रुपये में गाय आएगी। अभी गाय के इलाज पर पैसा खर्च हो गया। हम बाजार से आहार खरीद रहे थे। खेत से भी चारा खिला रहे थे।”

प्रगतिशील किसान एवं पूर्व प्रधान उमेद बोरा। फोटो- राजेश पांडेय

उधर, सिमलासग्रांट के पूर्व प्रधान एवं प्रगतिशील किसान उमेद बोरा का कहना है, “डोईवाला क्षेत्र में लंपी रोग से बड़ी संख्या में पशुपालक प्रभावित हैं। उन पशुपालकों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है, जिनकी आजीविका गाय का दूध बेचकर चल रही थी। बीमारी की चपेट में आए पशुओं ने दूध देना लगभग बंद कर दिया है। जिन परिवारों को पशु हानि हुई है, उनके पास नये पशु खरीदने के लिए पैसा नहीं है।”

देहरादून के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. विद्यासागर कापड़ी बताते हैं, “फील्ड स्टाफ से मिले आंकड़ों के अनुसार, देहरादून जिले में कल (बुधवार) तक लंपी रोग के 2224 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें 240 केस नए थे। अभी तक 1038 मामले रिकवर हो चुके हैं, यानी इतने पशु स्वस्थ हो गए हैं। अभी तक जिले में 39 पशुओं की मृत्यु की सूचना है।”

डॉ.कापड़ी का कहना है, “फील्ड स्टाफ घर घर जा रहे हैं, वहीं से यह डाटा मिल रहा है। वहीं पशुपालक चिकित्सालयों तक भी आ रहे हैं। वैक्सीनेशन अभियान जारी है, जिले में अभी तक लगभग 26 हजार वैक्सीन लगाई जा चुकी हैं।”

डॉ. कापड़ी बताते हैं, “वैक्सीनेशन में हर पशु के लिए अलग से नीडल उपलब्ध कराई जा रही है। सभी पैरावेट्स, पशुधन प्रसार अधिकारियों और अन्य स्टाफ को प्रत्येक पशु के लिए नीडल चेंज करने के निर्देश हैं। यदि कोई एक ही नीडल से कई पशुओं का वैक्सीनेशन कर रहा है, इसके बारे में तत्काल संबंधित अधिकारी को बताएं। वैक्सीनेशन पशुओं की इम्युनिटी को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

क्या है पशुओं में फैलने वाला लम्पी रोग

पशुपालन विभाग के अनुसार, गौवंशीय पशुओं में फैल रहा लम्पी स्किन रोग विषाणु जनित संक्रामक रोग है, जो मच्छरों, मक्खियों एवं चीचड़ी आदि से भी फैलता है। बीमारी से प्रभावित पशु को हल्के से तेज बुखार के साथ-साथत्वचा पर मोटी-मोटी गांठे (गूमड़) हो जाती है। इन गांठों के फूटने पर तरल पदार्थ निकलता है, जिससे गांठें घाव में बदल जाती हैं। तथा, पशुओं में दूध का उत्पादन कम हो जाता है।

एक वेबसाइट के अनुसार, भारत में सबसे पहले लम्पी स्किन डिजीज वायरस का संक्रमण साल 2019 में पश्चिम बंगाल में देखा गया था, जो 2021 तक 15 से अधिक राज्यों में फैल गया। यह बीमारी सबसे पहले 1929 में अफ्रीका में पाई गई थी। पिछले कुछ साल में यह बीमारी कई देशों के पशुओं में फैल गई, साल 2015 में तुर्की और ग्रीस और 2016 में रूस जैसे देश में इसने तबाही मचाई। जुलाई 2019 में इसे बांग्लादेश में देखा गया, जहां से ये कई एशियाई देशों में फैल रहा है।

लंपी बीमारी से बचाव की गाइड लाइन

  • पशुपालन विभाग की गाइड लाइन के अनुसार, लंपी से संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए, उनके बीच न्यूनतम शारीरिक दूरी तीन से पांच मीटर बनाकर रखें। अगर एक पशु में संक्रमण हुआ तो दूसरे पशु भी इससे संक्रमित हो जाते हैं।
  • रोगी पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए तथा उनको चारा एवं पानी भी एक साथ नहीं देना चाहिए।
  • पशुशाला के आसपास पानी व गंदगी एकत्रित न होने दें। इससे मच्छर आदि पनपते हैं।
  • पशुशाला में कीटों की संख्या पर काबू करने के उपाय करने चाहिए, मुख्यत: मच्छर, मक्खी, पिस्सू और चिंचडी का उचित प्रबंध करना चाहिए। गौशाला में कीटनाशक दवाई का छिड़काव अवश्य करें।
  • स्वस्थ पशु का दूध दुहाने के बाद ही रोगी पशु का दूध दोहन करें।
  • स्वस्थ पशुओं से पहले रोगी पशुओं के दैनिक कार्य ना करें। इससे रोगी पशु से स्वस्थ पशु में संक्रमण फैलने की आशंका रहती है।
  • पशुओं के बाड़े के अंदर की दीवारों में चूने से पुताई करें।
  • रोगी पशुओंं को 25 लीटर पानी में दो मुट्ठी नीम के पत्तों का पेस्ट मिलाकर नहलाना लाभकारी होगा।
  • मृत पशुओं के शव के निस्तारण के लिए लगभग डेढ़ मीटर गहराई का गड्ढा खोदकर मृत पशु के शव को चूना व नमक डालकर दबाया जाए।
  • पशुपालकों को अपने शरीर की साफ सफाई का भी ध्यान रखना चाहिए।
  • रोगी पशुओं की जांच और इलाज में उपयोग हुए सामान को खुले में नहीं फेंकना चाहिए।
  • अगर, अपने पशुशाला पर या आसपास किसी असाधारण लक्षण वाले पशु को देखते हैं, तो तुरंत नजदीकी पशु अस्पताल में इसकी जानकारी देनी चाहिए।

लम्पी रोग से पशुओं को बचाने के आयुर्वेदिक उपाय

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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