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किमसार का गेंदी खेलः जब तक गोल नहीं होता खेल चलता रहता है, चाहे रात हो जाए

पौड़ी गढ़वाल जिले के किमसार में कुंवारों और विवाहितों में गेंद का खेल

किमसार (पौड़ी गढ़वाल)। राजेश पांडेय

पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर ब्लाक (Yamkeshwar block) का बेहद सुंदर गांव किमसार (Kimsar), जो यहां एक बार घूमने आ जाए, बार-बार याद करे। किमसार गांव ऋषिकेश से करीब 30 किमी. दूर है, जिसमें से लगभग 12 किमी. का हिस्सा राजाजी टाइगर रिजर्व (Rajaji Tiger reserve) से होकर गुजरता है। यहां तक पहुंचने के लिए आधा रास्ता बहुत खराब हालत में है। कौड़िया, तल्ला बणास, मल्ला बणास, कसाण होते हुए किमसार पहुंचते हैं। हम अपने मित्र नियोविजन संस्था के संस्थापक सॉफ्टवेयर इंजीनियर गजेंद्र रमोला के साथ मेले में पहुंचे।

किमसार गांव में वर्षों से एक परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है, वो है मकर संक्रांति (Makar Sankranti) पर गेंदी का मेला। गेंदी का मेला (Gendi ka mela) में एक विशेष खेल होता है, जिसे गेंदी का खेल कहा जाता है। इसमें एक बड़ी गेंद, जो रबर और लेदर की बनी है, जिसे लगभग 50 साल पहले गांव के रणजीत सिंह, लेकर आए थे। इस खेल को दो पक्ष एक दूसरे के पाले में गोल करने के लिए खेलते हैं। हालांकि, वर्तमान में जिस गेंद से खेल होता है, वो 50 साल पुरानी है, पर गांव में गेंदी के खेल की परंपरा कितनी पुरानी है, किसी को नहीं मालूम। लोग इस परंपरा को सैकड़ों साल पुराना बताते हैं।

इस खेल में दोनों पक्षों में कितने खिलाड़ी होंगे, का कोई नियम नहीं है। पर, दो पक्षों में कौन लोग खिलाड़ी होंगे, इसका एक नियम है। रामजीवाला गांव (Ramji wala Gaon) के निवासी राकेश चंद्र भट्ट बताते हैं, जो पुरुष विवाहित हैं या जिनके पुत्र हैं, वो एक पक्ष में शामिल होते हैं, जबकि जो अविवाहित हैं या जिनके पुत्र नहीं हैं, उनको दूसरे पक्ष में शामिल किया जाता है। एक तरह से यह विवाहित और कुंवारों के बीच गेंद कब्जाने का खेल माना जा सकता है।

पौड़ी गढ़वाल के रामजी वाला गांव निवासी राकेश चंद्र भट्ट ने गेंदी के खेल पर विस्तार से जानकारी दी। फोटो- गजेंद्र रमोला

गेंदी का खेल देखने, मेले में शामिल होने के लिए दूर दूर से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। भट्ट बताते हैं, भगवान श्रीकृष्ण गोकुल में अपने साथियों के साथ गेंद खेलते थे, इसी परंपरा को हम गांववाले वर्षों से निभा रहे हैं। यह मेला गांव की आर्थिकी को भी मजबूत करता है। हमारे गांव के लोग, यहां खानपान, सब्जियों, फलों के स्टॉल लगाते हैं। बाहर से भी बड़ी संख्या में दुकानदार यहां सामान बेचने आते हैं।

किमसार के सहदेव, जिनके दादा जी वर्षों पहले गेंद लेकर आए थे। बताते हैं, हमें अपनी परंपरा को निभाने में खुशी मिलती है। इस मेले का हमें बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है। हम किमसार के निवासी और आसपास के सभी गांव इस मकर संक्रांति पर्व को बड़े उत्साह से मनाते हैं। यह हमारे लिए बड़े गर्व का विषय है। बताते हैं, गेंद दादी जी पाटम देवी जी के पास रहती हैं, दादी जी की आयु लगभग 99 साल है। मेले से एक दिन पहले ढोल बाजों के साथ, गेंद लेने के लिए ग्रामीण हमारे घर पहुंचते हैं।

किमसार गांव के सहदेव सिंह और मातबर सिंह, गेंदी मेले पर बात करते हुए। फोटो- गजेंद्र रमोला

किमसार के ही, मातबर सिंह बताते हैं, उनको इस मेले की प्रतीक्षा रहती है, हालांकि वो कभी गेंदी का खेल में शामिल नहीं हुए, पर अच्छा लगता है लोगों को यह खेलते हुए देखकर। किमसार के ही,कोमल सिंह बताते हैं, अब उनकी उम्र गेंद खेलने की नहीं है, क्योंकि इसमें गेंद को कब्जाने के लिए काफी दौड़ना पड़ता है। वो युवावस्था में खेलते थे, अब डर लग रहता है कि कहीं चोट न लग जाए। जब गेंद गोल तक पहुंचती है, तो दर्शक रोमांचित हो जाते हैं।

राकेश चंद्र भट्ट बताते हैं, यह खेल गोल होने के साथ ही समाप्त हो जाता है। गोल होने में दोपहर से चाहे शाम हो जाए या फिर रात ही क्यों नहीं। खेल गोल होने पर ही ओवर होता है। मन करता है, इस खेल में शामिल हो जाऊं।

किमसार के संक्रांति मेले में जलेबियां खूब बिकीं। विक्रेता जगदीश कंडवाल जलेबियां बनाते हुए। फोटो- गजेंद्र रमोला

उधर, मेले में जलेबियां खूब बिक रही हैं। विक्रेता जगदीश कंडवाल बताते हैं, उन्होंने चार कुंतल जलेबी बेच दी। एक किलो का रेट 120 रुपये है। हमने उनसे कहा, तब तो आप लखपति हो गए। जगदीश तेजी से हंसते हुए बोले, तब तो मजा आ गया। वहीं, देहरादून से आए चाट विक्रेता रमेश उनियाल बताते हैं, उन्होंने चार किलो आलू की टिक्कयां बेच दीं। हमें मेले में काफी लाभ हुआ।

किमसार के संक्रांति मेले में खरीदारी करतीं महिलाएं। फोटो- राजेश पांडेय

किमसार संक्रांति मेले में खानपान के साथ ही, बच्चों के खिलौनों, श्रृंगार का सामान, बिंदी चूड़ियों, कपड़ों के स्टाल सजे थे। सब्जियां भी बिक रही थीं। चावल के दाने पर नाम लिखने वाले स्टाल पर युवाओं की भीड़ थी। सब उत्साह में थे, सभी खुश नजर आ रहे थे।

किमसार में संक्रांति मेला। फोटो- राजेश पांडेय

वहीं, दोपहर में मेला शुरू होने से पहले स्टॉल पर कढ़ाइयां, दरांतियां, फावड़े जैसे लोहे के सामान रख रहीं, विमला देवी बताती हैं, ऋषिकेश से मेले में पहुंची हैं। बताती हैं, यह सामान लोडर में लाए हैं, जिसका किराया डेढ़ हजार रुपये दिया है। पर, आज शनिवार है, लोहे का सामान बिकेगा या नहीं, इसमें संशय लग रहा है। वैसे, उनका अनुभव है कि मेले में इन बातों का ध्यान कम ही रखा जाता है। बताती हैं, रसोई, खेती में इस्तेमाल होने वाले लोहे के बर्तन और औजार खुद बनाते हैं।

ऋषिकेश से किमसार मेले में स्टाल लगाने पहुंचे पहाड़िया, जो लोहे का सामान बनाते और बेचते हैं। फोटो- राजेश पांडेय

मेले में लोहे के सामान के विक्रेता पहाड़िया भी मिले, जो बताते हैं, उनको भी मेले की सूचना मिली थी, इसलिए आ गए। वो मेलों में जाते रहते हैं, जिसमें काफी सामान बिक जाता है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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