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कहानीः आसमान में घर बना दो

अफ्रीका के किसी गांव में एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत होशियार था। वह हमेशा धनी व्यक्तियों और अपने मुखिया के बारे में मजाक करता रहता था। इस वजह से वह मुखिया को पसंद नहीं था। धनी व्यक्ति भी उससे नाराज रहते थे। एक दिन मुखिया ने सोचा कि क्योंं न इस व्यक्ति को सबक सिखाया जाए। इसलिए उसने एक योजना बनाई।

मुखिया ने किसी से संदेश भिजवाकर उसको अपने पास बुलवाया। वह मुखिया के सामने हाजिर हो गया। मुखिया ने कहा, सुना है, तुम बहुत होशियार हो।

वह मुस्कराते हुए मुखिया की बात सुनता रहा। मुखिया ने कहा, अगर तुम बहुत होशियार हो तो, क्या मेरे लिए आसमान में घर बना सकते हो। इस पर उस व्यक्ति ने हां करते हुए सिर हिलाया।

उसने कहा, जी मुखिया जी, आसमान में घर बनाना कौन सा कठिन काम है। मुखिया ने पूछा, कितने दिन में घर बना दोगे। उसने जवाब दिया, कल से काम शुरू कर दूंगा। यह कहकर वह व्यक्ति वहां से जाने लगा।

मुखिया ने उससे कहा, अगर तुमने आकाश में घर नहीं बनाया तो मेरे सेवक तुमको मार देंगे। उस व्यक्ति ने मुस्कराकर मुखिया की ओर देखा और फिर अपनी राह चला गया। दूसरे दिन उसने एक पतंग उड़ाई, जब पतंग काफी ऊंचाई पर पहुंच गई तो उसने डोर को एक पेड़ से बांध दिया।

इसके बाद वह मुखिया के पास पहुंचा और बोला, आसमान में आपके घर के लिए दीवारें खड़ी कर दी हैं, केवल छत डालनी रह गई है। आपसे निवेदन है कि अपने सेवकों से वहां लकड़ी के बोर्ड भिजवाने की कृपा करें, ताकि छत डाली जा सके।

मुखिया सोच में पड़ गया, इसने आकाश में दीवारें खड़ी कर दीं। फिर भी उसने अपने सेवकों से कहा कि जल्दी से इनके साथ जाओ, जैसे कहें, वैसे किया जाए। मुखिया के सेवक मौके पर पहुंचे तो देखा कि वहां पतंग उड़ रही है।

उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, बताओ क्या करना है। उस व्यक्ति ने कहा, तुमको लकड़ी के बोर्ड वहां पतंग तक पहुंचाने हैं। सेवकों ने कहा, कैसी बेवकूफों वाली बात करते हो, वहां तक हम कैसे पहुंचेंगे। उसने जवाब दिया कि यह डोर देख रहे हो, इसके सहारे वहां पहुंचोगे।

उसने सेवकों से कहा, अगर तुमने मेरा कहना नहीं माना तो तुम्हारे मुखिया से कह दूंगा। इसलिए बोर्ड लेकर इस डोर के सहारे वहां पहुंचो। सेवकों ने कहा, यह कैसे संभव है। उसने जवाब दिया, तुम्हारे मुखिया ने ही आसमान में घर बनाने को कहा है। कोशिश करो, शायद तुम वहां पहुंच जाओ।

सेवकों ने कहा, कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। नहीं तो यह मुखिया से कह देगा कि तुम्हारे सेवकों ने कोशिश तक नहीं की। यह कहते हुए उन्होंने प्रयास किया, लेकिन डोरी के सहारे पतंग तक पहुंचना तो असंभव सी बात थी।

सेवक दौड़ते हुए मुखिया के पास पहुंचे और बोले मुखिया जी, वो व्यक्ति पागल हो गया है। मुखिया भी मौके पर पहुंचा और कहने लगा कि पतंग तक पहुंचना संभव ही नहीं है।

इस पर उस व्यक्ति ने कहा, मुखिया जी,जब आपको पता था कि वहां तक कोई नहीं पहुंच सकता, तो आपने मुझे आकाश में घर बनाने का आदेश क्यों दिया। मुखिया के पास उसकी बात का कोई जवाब नहीं था। वह व्यक्ति हमेशा की तरह मुस्कराता हुआ पेड़ के पास पहुंचा और डोर को काटकर पतंग को हमेशा के लिए आजाद कर दिया।

 

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Rajesh Pandey

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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