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गायक बनने के लिए गधे ने टिड्डी से सलाह ली

किसी जंगल के पास एक गधा रहता था। वह अपनी बेसुरी आवाज से बहुत परेशान था। वह भी चाहता था कि उसकी आवाज किसी गायक की तरह हो। वह भी सुरों में गीत गाना चाहता था। एक दिन वह हरी घास के मैदान में चर रहा था कि उसे मधुर गीत सुनाई दिया।
घास से भरे मैदान में काफी तलाश के बाद गधे ने एक टिड्डी को गाते हुए देखा। गधे ने टिड्डी को डिस्टर्ब किए बिना गीत का आनंद लिया। गीत समाप्त होने पर उसने टिड्डी से पूछा, दोस्त मैं भी यही हरी घास खाता हूं, जो शायद तुम भी खाते होगे। मैं भी तुम्हारी तरह गाना चाहता हूं। मुझे बताने का कष्ट करोगे कि तुम और क्या खाते हो।
टिड्डी ने सोचा कि गधा उससे मजाक कर रहा था, इसलिए उसने भी मजाक में जवाब दिया कि वह हरी घास पर जमा ओंस की बूंदों का सेवन करता है। ओंस से उसकी आवाज में स्वयं सुर आ जाते हैं। गधे ने टिड्डी का धन्यवाद किया और तय कर लिया कि आज से ओंस वाली घास ही चरेगा। उसने देखा कि सुबह-सुबह घास पर ओंस जमा होती है, इसलिए तड़के ही घास चरी जाए।
गधा सुबह-सुबह मैदान में पहुंच जाता और ओंस वाली घास चरता। कई माह बाद भी उसकी आवाज तो पहले जैसी ही थी। वह कभी भी सुर में गीत नहीं गा पाया, लेकिन सुबह-सुबह घास के मैदान में सैर करने और चरने से उसकी सेहत अच्छी हो गई। वह उस टिड्डी को तलाश करता रहा, जिसने उसे बताया था कि ओंस का सेवन करने से आवाज अच्छी हो जाती है।
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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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