Ginger farming in Dehradun: देहरादून के इन गांवों में अदरक की कामयाब खेती, एक बुवाई से दो बार उपज लेते हैं किसान

Rajesh Pandey
देहरादून जिले में मालदेवता - सरखेत के पास क्यारा सिल्ला मार्ग पर घन्तू का सेरा स्थित खेत में अदरक का बीज बोते हुए महिला किसान उर्मिला पंवार। फोटो- राजेश पांडेय

Ginger farming in Dehradun: देहरादून, 8 जून, 2026ः  माल देवता से आगे घन्तू का सेरा बांदल नदी के किनारे एक ऐसा इलाका है, जो अपनी नगदी फसलों के लिए जाना जाता है। क्यारा और सिल्ला तक हमने बांदल नदी के दोनों किनारों पर देहरादून के साथ, टिहरी जनपद के खेतों में भी फसलें देखीं। यहां अधिकतर गांवों में खेती वर्षा आधारित ही है। कृषि एवं औद्यानिकी विशेषज्ञ डॉ. आरपी कुकसाल बताते हैं, “उत्तराखंड के पर्वतीय असिंचित (वर्षा आधारित) क्षेत्रों में अदरक की खेती नगदी और व्यावसायिक फसल के रूप में लोकप्रिय है।”

Ginger farming in Dehradun: घन्तू के सेरा में सड़क किनारे घर के पास क्यारियों में उर्मिला पंवार अपने पुत्र मनोज व उनकी पत्नी के साथ अदरक की बुवाई कर रही थीं। हमने उनसे अदरक की खेती के पूरे गणित को समझने की कोशिश की। क्या वास्तव में अदरक सहित अन्य नकदी फसलें लाभ का सौदा हैं। उर्मिला बताती हैं, “अदरक उगाने से लाभ है, इसलिए तो हम खेतों में मेहनत कर रहे हैं। उन्होंने बताया, यहां किसान अदरक, प्याज,आलू, बीन्स, धनिया, हल्दी खूब उगाते हैं। हम बार बीज बोकर अदरक की दो उपज हासिल करते हैं। पहली उपज लगभग तीन महीने में प्राप्त कर लेते हैं। यह वो हिस्सा होता है, जो हम बोते हैं।”

Ginger farming in Dehradun: उन्होंने बताया, अभी हम एक खास तकनीक से बीज बो रहे हैं। बीज पर जो किल्ले (अंकुर) निकले हैं, इनको ऊपर की तरफ करना है। करीब दो ढाई महीने में पौध के नीचे से बीज वाले हिस्से को बाहर निकाल लेंगे। पर, इस हिस्से को पौधे से अलग करने में सावधानी बरतनी चाहिए। आधा बीघा में तीन कुंतल बीज बोया है, तो इसमें से पुरानी अदरक लगभग ढाई कुंतल ही मिल पाएगी, क्योंकि लगभग आधा कुंतल गल जाती है या खराब हो जाती है।”

“जून में बीज बो रहे हैं, सितंबर तक उपज का पहला भाग यानी बोया हुआ बीज हासिल कर लिया। फिर अक्तूबर या नवंबर तक दूसरी बार उपज हासिल करते हैं। कुल मिलाकर हमें इतनी ही उपज और मिल जाती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो  लगभग छह कुंतल उपज दोनों बार में मिल जाती है।

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किसान उर्मिला पंवार ने बताया, पहली उपज, जिसे हम पुरानी अदरक कहते हैं, को बाजार में अच्छा मूल्य मिलता है। यहां की अदरक 90-100 रुपये प्रति किलो तक बिकती है। यहां से देहरादून मंडी तक फसल को लोडर से पहुंचाया जाता है। कई किसान एजेंट्स के माध्यम से फसल बाजार पहुंचाते हैं। कुछ किसान स्वयं ही मंडी जाकर फसल बेचते हैं। अदरक अच्छी पैदावार वाली उपज है। खास बात यह है कि इसको बंदर और अन्य जानवर भी नहीं खाते।

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किसान मनोज पंवार। फोटो- राजेश पांडेय

किसान मनोज पंवार बताते हैं, “अदरक को कुछ महीने बाद निकालेंगे तो और ज्यादा उपज मिलेगी। हम छह माह में ही दोनों उपज खेतों से बाहर निकालकर बाजार भेज देते हैं।”

कृषि एवं औद्यानिकी विशेषज्ञ डॉ. आरपी कुकसाल बताते हैं, “अदरक का बीज काफी महंगा मिलता है। किसान उपज को दो बार हासिल करके बीज निकाल लेते हैं, यह अच्छी बात है। इस क्षेत्र में काफी संख्या में किसान अदरक की खेती करते हैं। बाजार में कच्ची अदरक की डिमांड भी रहती है। वैसे, अदरक लगभग आठ से नौ महीने की फसल है। बताते हैं, उत्तराखंड के पर्वतीय असिंचित (वर्षा आधारित) क्षेत्रों में अदरक की खेती नगदी और व्यावसायिक फसल के रूप में लोकप्रिय है।”

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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