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गुमनाम हीरो गुलाम हसन, जो हैंडलूम उत्पादों में जान फूंकते हैं

खुद ही तैयार करते हैं डिजाइन, बड़ी संख्या में लोगों को ट्रेनिंग दे चुके हैं गुलाम हसन

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

करीब 47 साल के गुलाम हसन, हैंडलूम पर बनाए जाने वाले कपड़े का डिजाइन तैयार कर रहे हैं। बताते हैं, पहले डिजाइन प्लान करना होता है और फिर उसी हिसाब से ताना तैयार करते हैं और फिर बाने पर कपड़ा बनाते हैं। ताना और बाना हैंडलूम के दो हिस्से हैं। ताना में धागों का समूह लगाया जाता है, जबकि बाना,जिसे हम खड्डी भी कह सकते हैं, से जोड़कर कपड़ा बुना जाता है। बाना में पैडल और शटल होते हैं, जिनसे धागों को कसकर कपड़ा बनता है।

वो वर्षों से तरह तरह के डिजाइन बना रहे हैं, उनको डायमंड वाला डिजाइन ज्यादा पसंद है, जिसको बनाना जटिल तो है, पर उनको काफी अभ्यास हो गया है, इसलिए यह अब मुश्किल नहीं है। वो दस पैडल वाले हैंडलूम पर आसानी से काम कर लेते हैं। दस पैडल वाले हैंडलूम का इस्तेमाल अलग-अलग रंगों वाले डिजाइनर कपड़े बनाने में किया जाता है।

गुलाम हसन मास्टर ट्रेनर हैं, जिनको मास्टर कहलाना अच्छा लगता है।  रेडियो ऋषिकेश से बात करते हुए जब उनसे पूछा गया, अभी तक कितने लोगों को हैंडलूम का प्रशिक्षण देकर आजीविका से जोड़ चुके हैं, पर उनका कहना है, मैंने गिनती नहीं की, सैकड़ों होंगे। मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि कितने तरह के डिजाइन का कपड़ा बना चुका हूं। कहते हैं, मुझे खुशी होती है, जब कोई हमसे सीखने आता है। सीखने वालों में महिलाओं की संख्या अधिक है। कॉलेज के छात्र-छात्राएं भी सीखने आते हैं, ये बच्चे आजीविका के लिए नहीं, बल्कि हैंडलूम वर्क को समझने के लिए सीखते हैं। ये ताना-बाना दोनों का काम सीखते हैं।

बचपन का किस्सा साझा करते हुए गुलाम हसन के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगती है, पर थोड़ी देर में ही अपने पिताजी को याद करके भावुक हो जाते हैं। कहते हैं, पिताजी सही कहते थे, हैंडलूम से खिलवाड़ मत करो, इसमें थोड़ी सी भी लापरवाही बरती तो चोट लग सकती है।

बताते हैं, पिताजी ने हमें यह काम नहीं सिखाया होता तो, शायद जीवन में कुछ नहीं कर पाते। मैंने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की, पर हैंडलूम पर मन लगाया सीखा, भरपूर सीखा और आज भी नये-नये डिजाइन बनाना सीखने की ललक है।

हम उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के मेमन सादात गांव के रहने वाले हैं। हमारे गांव में कई परिवारों को कपास के सूत से कपड़ा बनाने के लिए दो-दो तानाबाना (हैंडलूम) दिए गए थे। मेरे पिताजी, चाचाजी सभी इन पर काम करते थे। गांव में ही कई परिवार तकलियों पर कपास से धागा बनाते थे। पर, एक मशीन औऱ थी, जिसे हम चरखा कहते थे, से भी धागा बनाया जाता था। पर, यह मशीन गांधी जी वाले चरखे की तरह नहीं थी।

गुलाम हसन बताते हैं, पिताजी हमें हैंडलूम से दूर रहने को कहते थे। पर, हम कहां मानने वाले, जैसे ही वो खाना खाने जाते, हम चुपके से हैंडलूम के पैडल पर जोरों से पैरों को पटकने लगते। लापरवाही और अज्ञानता से हैंडलूम चलाने की कोशिश करने से धागा टूट जाता या फिर शटल बाहर निकल जाती। ऐसा होते ही हम वहां से भाग जाते। बाद में, हमें खूब डांट पड़ती।

बाद में, पिताजी ने हमें हैंडलूम सिखाया। ताना-बाना दोनों पर काम करना सीखा। आज समझ में आता है, वो हमें क्यों डांटते थे। पैडल दबाते ही शटल एक हिस्से से दूसरे हिस्से की ओर तेजी से दौड़ती है। शटल कई बार बाहर निकलकर शरीर पर कहीं भी लग सकती है। मेरे साथ कई बार हुआ, जब शटल से चोट लगी। खून भी बहने लगता है, गुलाम हसन कहते हैं।

हैंडलूम पर कपड़ा बनाने की प्रक्रिया, के बारे में बताते हैं, सबसे पहले कपड़े की चौड़ाई के हिसाब से प्लानिंग करते हैं। कई बार, जब धागों की प्लानिंग में गलती हो जाती है तो कपड़ा खराब हो जाता है। ताना में लगा धागा तो फिर से इस्तेमाल हो जाता है, पर बाना में कपड़ा बन चुका धागा, दोबारा नहीं मिलता। ये तो खराब ही समझो, पर हम इसे दूसरे प्रोडक्ट बनाने में प्रयोग कर लेते हैं। हम, हैंडलूम पर डोर मैट, योगा मैट, योगा बेल्ट, पर्दे, चादरें, दरियां, शॉल… ये सभी आइटम बनाते हैं। पर, वर्षों के अभ्यास की वजह से, अब गलती की आशंका कम ही रहती है।

गुलाम हसन का कहना है, पहले जब हम Weaver के रूप में काम करते थे, तो हमारा ध्यान केवल कपड़े की बुनाई पर होता था। पैडल और शटल पर ही पूरा फोकस रखते थे। जब आपको अभ्यास हो जाता है तो हाथ और पैर खुद ब खुद काम करते हैं, वो भी सही टाइमिंग के साथ। हम इस दौरान रेडियो और डेक पर पुराने फिल्मी गाने सुनते थे। वो फिल्मी गाने “ओ मेरी महबूबा, तुझे जाना है तो जा…” को पसंदीदा गाना बताते हैं।

कहते हैं, आज हम मास्टर (प्रशिक्षक) हैं, तो गाने वगैरह नहीं सुन पाते, क्योंकि डिजाइन बनाना, योजना तैयार करने में बहुत ध्यान लगाने की जरूरत होती है। हमारे बनाए डायमंड (Dimond Design print), जिग जैग (Zig Zag Design Print) बहुत पसंद किए जाते हैं। ज्यादातर सामान एक्सपोर्ट होता है। हैंडलूम से बने ये उत्पाद प्रदर्शनियों में रखे जाते हैं। सामान्य रूप से बाजार में कम ही मिलते हैं। पर, उन्होंने अपने बनाए डिजाइन वाले उत्पादों को बिक्री होते देखा है। बहुत अच्छा लगता है,जब हमारी मेहनत और हुनर को लोग पसंद करते हैं।

बिजनौर, पानीपत, पिलखुवा, देहरादून और फिर ऋषिकेश के पास डांडी गांव में काम कर चुके हैं। इन दिनों ऋषिकेश के पास ढालवाला स्थित भारतीय ग्रामोत्थान संस्था में सेवाएं दे रहे हैं। 1989 से इस संस्था से जुड़े रहने के दौरान उनको मास्टर ट्रेनर की जिम्मेदारी मिली। बताते हैं,  Weaver से Master Trainer बनना बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने देहरादून, कोटद्वार, विकासनगर सहि कई जगहों पर महिलाओं को हैंडलूम चलाने का प्रशिक्षण दिया। महिलाएं उनसे सीखकर आजीविका चला रही हैं। कई बार ये महिलाएं मिलती हैं और कहती हैं, “भाई साहब आपने हमें सिखाया, हम बहुत खुश हैं। ” यह सुनकर मुझे भी बहुत खुशी होती है।

Rajesh Pandey

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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