current AffairsFeaturedWomen

डॉ. हंसा मेहता ने यूएन के मानवाधिकारों घोषणापत्र में महिलाओं के हित में कराया था बड़ा बदलाव

इस बदलाव को लैंगिक समानता व महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है

भारत की प्रसिद्ध महिलाधिकार पैरोकार डॉक्टर हंसा मेहता ने संयुक्त राष्ट्र के गठन के शुरुआती दिनों में तैयार किए गए मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र (UDHR) का प्रारूप तैयार करने में अग्रणी भूमिका निभाई। डॉक्टर हंसा मेहता संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग में अमेरिका की ऐलीनॉर रूज़वेल्ट के अलावा एक मात्र अन्य महिला सदस्य थीं।

भारत की प्रसिद्ध महिलाधिकार पैरोकार, शिक्षाविद, समाज सुधारक और लेखिका डॉक्टर हंसा मेहता की स्मृति में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में बीते मंगलवार को, भारतीय मिशन के सहयोग से स्मृति संवाद आयोजित किया गया। यूएन महासभा के अध्यक्ष अब्दुल्ला शाहिद और विश्व व्यापार संगठन (WTO) की महानिदेशक ने भी इस कार्यक्रम में शिरकत की।

डॉक्टर हंसा मेहता ने संयुक्त राष्ट्र के गठन के शुरुआती दिनों में तैयार किए गए – मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र (UDHR) का प्रारूप तैयार करने में अग्रणी भूमिका निभाई। उनका जन्म तीन जुलाई 1897 को भारत की तत्कालीन बड़ोदा रियासत (वर्तमान में गुजरात) में हुआ था जो आगे चलकर महिला अधिकारों की मुखर पैरोकार बनीं।

हंसा मेहता ने 1946 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (AIWC) में भारतीय महिलाओं के अधिकार चार्टर की अगुवाई की। इसमें लैंगिक समानता के साथ भारत में महिलाओं के सिविल अधिकारों व उनके लिए न्याय की मांग की गई थी। इस महिला अधिकार चार्टर के अनेक प्रावधान भारतीय संविधान में अनेक लैंगिक निष्पक्ष प्रावधानों का आधार बने। डॉक्टर मेहता भारतीय संविधान का प्रारूप तैयार करने वाली कमेटी की भी सदस्य होने के साथ-साथ, मूल अधिकारों पर सलाहकार कमेटी की भी सदस्य थीं।

डॉक्टर हंसा मेहता, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग में, अमेरिका की ऐलीनॉर रूज़वेल्ट के अलावा एक मात्र अन्य महिला सदस्य थीं। उन्होंने मानविधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र के अनुच्छेद – 1 में, मूल रूप में – सम्पूर्ण मानवता का प्रतिनिधित्व करने के लिए पुरुषों का नाम दिया गया था, जिसमें लिखा गया था – “तमाम पुरुष स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं।” डॉक्टर हंसा मेहता ने इस वाक्यांश को बदलकर यह लिखे जाने की पेशकश की – “तमाम इनसान स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं।” डॉक्टर हंसा मेहता द्वारा प्रस्तावित इस समावेशी भाषा को ना केवल स्वीकार किया गया, बल्कि इस बदलाव को लैंगिक समानता व महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है।

संयुक्त राष्ट्र में भारतीय मिशन के एक वक्तव्य में कहा गया है कि यह स्मृति संवाद शुरू करने का मक़सद, वैश्विक समुदाय में लैंगिक समानता के बारे जागरूकता बढ़ाना, महिलाओं का सशक्तिकरण और महिलाओं व लड़कियों के मानवाधिकारों को केन्द्रीय प्राथमिकता पर लाना है। भारतीय मिशन के अनुसार इस संवाद के ज़रिये यह सन्देश पुष्ट करने की कोशिश की जाती कि मानवाधिकार, शान्ति और सुरक्षा व टिकाऊ विकास हासिल करने के लिए, लैंगिक समानता और महिलाओं व लड़कियों के अधिकारों को वास्तविक रूप देना बुनियादी आवश्यकता है।

ऐसे में जबकि दुनियाभर में तमाम समुदाय, वैश्विक महामारी से प्रभावित हुए हैं और असाधारण चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, महिलाओं को कोविड-19 के नकारात्मक आर्थिक व सामाजिक प्रभावों के असमान दंश झेलना पड़ा है। आँकड़ों से मालूम होता है कि महामारी के कारण अत्यन्त गम्भीर निर्धनता के गर्त में धकेली जाने वाली आबादी में लगभग 50 प्रतिशत संख्या महिलाओं व लड़कियों की होगी। डॉक्टर हंसा मेहता स्मृति संवाद में 2022 की थीम है – कोविड-महामारी से समावेशी व लैंगिक संवेदनशील पुनर्बहाली पर ध्यान केन्द्रित करना।- साभार- यूएन समाचार

newslive24x7

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button