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बड़ी दुविधा में फंस गए प्रधानमंत्री आवास योजना के पात्र चांडी गांव के गरीब परिवार

Rajesh Pandey
Last updated: July 27, 2024 7:18 pm
Rajesh Pandey
3 years ago
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देहरादून जिले के माजरीग्रांट ग्राम पंचायत के चांडी गांव में अपने कच्चे घर के सामने खड़े लच्छूराम। फोटो- राजेश पांडेय
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राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

केंद्र सरकार की यथास्थान झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास परियोजना है, जिसके तहत झुग्गीवासियों के पुनर्वास के लिए दिल्ली के कालकाजी में बनाए गए 3024 नवनिर्मित ईडब्ल्यूएस फ्लैट्स का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष 2022 की दो नवंबर को उद्घाटन किया था। पर, जब हम उत्तराखंड के देहरादून जिले के चांडी गांव पर नजर डालते हैं तो यहां पात्र मानकर स्वीकृति देने के बाद भी 20 परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ उस जगह पर नहीं मिल रहा है, जहां वो वर्षों से रह रहे हैं। जहां वो वर्षों से रह रहे हैं, उस भूमि को जंगलात की बताया जा रहा है। अब, इन पात्र परिवारों को गांव से बाहर एक-एक बीसा भूमि लालतप्पड़ क्षेत्र में आवंटित करके वहां प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ देने की बात कही जा रही है। पर, चांडी गांव के करीब 60 वर्षीय ताराचंद सवाल उठाते हैं, प्रधानमंत्री जी की बात है, जहां झुग्गी, वहीं मकान, तो फिर उनके साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है?

लगभग 40 साल के विनोद, चांडी गांव में रहते हैं। उनका चार सदस्यों वाला परिवार रिश्तेदार के मकान से सटाकर तिरपाल और लकड़ियों से बनाए अहाते में रहता है,जिसमें रसोई भी है और परिवार सोता भी यहीं है। विनोद बताते हैं, “कुछ समय पहले उनके अकाउंट में प्रधानमंत्री आवास योजना की लगभग 60 हजार रुपये की पहली किस्त आई थी, जिसमें से कुछ पैसा निकालकर और कुछ इधर उधर से कर्जा लेकर मकान का निर्माण शुरू कराया। अब उनको बताया जा रहा है, इस रकम को वापस करना होगा। उनके बैंक अकाउंट को ब्लॉक कर दिया गया है। उनके खाते में लगभग 20 हजार रुपये हैं। वो अब इस दुविधा में हैं कि खर्च किए गए 40 हजार रुपये कैसे वापस करेंगे।”

कहते हैं, “अगर उनको आवास योजना की उम्मीद नहीं जगाई जाती तो वो कर्जा लेकर मकान का निर्माण शुरू नहीं करते। वो कर्ज में हैं। किसी निजी संस्थान में बतौर माली काम करने वाले विनोद को हर माह सात- आठ हजार रुपये मिलते हैं, जिसमें लगभग तीन हजार रुपये बेटे के इलाज पर खर्च हो जाते हैं। बड़े बेटे का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता।”

देहरादून जिले के माजरीग्रांट ग्राम पंचायत के चांडी गांव में तिरपाल व टिन डालकर रहने लायक बनाई जगह के सामने बैठे विनोद। फोटो- राजेश पांडेय

जिस क्षेत्र चांडी की बात कर रहे हैं, वो माजरी ग्रांट ग्राम पंचायत में आता है। इस ग्राम पंचायत के चांडी और बाल कुंवारी में लगभग तीन सौ परिवार रहते हैं, जिनमें से 40-42 परिवार ऐसे बताए जाते हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं और इनके पास आवास नहीं हैं। ये दोनों इलाके वन क्षेत्र के अंतर्गत बताए जाते हैं।

ग्राम प्रधान अनिल पाल के अनुसार, “इन परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान स्वीकृत हो गए थे, पर बाद में वन भूमि का पेंच फंस गया। इसलिए ये जहां रह रहे हैं, वहां आवास स्वीकृत करने से अधिकारियों ने इनकार कर दिया।” पर, ग्रामीणों का कहना है, “पहले भी यहां निर्माण हुए हैं, शौचालय निर्माण भी सरकारी धनराशि से हुआ है।”

चांडी गांव में ही लच्छूराम का घर तिरपाल, पुरानी लकड़ियों और मिट्टी से बना है। उनके अनुसार, यह घर लगभग 40 साल पुराना है। छह सदस्यों का परिवार एक कमरे में रहता है,जिसकी छत से बरसात में पानी टपकता है। बताते हैं, “हर साल तिरपाल बदलने के भी पैसे नहीं होते। आवास की जरूरत है, इसलिए कुछ साल पहले पैसे इकट्ठे करके घर के पास ही निर्माण शुरू किया, यह इस उम्मीद में शुरू किया गया था कि प्रधानमंत्री आवास योजना (Pradhan Mantri Awas Yojana-PMAY) से कुछ सहयोग मिलेगा, पर उनका घर का सपना टूट गया, क्योंकि उनको यहां आवास बनाने के लिए पैसा नहीं मिलेगा। जो पैसा, उनके अकाउंट में डाला गया है, वो ब्लॉक कर दिया गया है। उनको और अन्य पात्र परिवारों को, जो भूमि आवंटित करने की बात की जा रही है, उस पर उनका कहना है, एक बीसा जमीन में क्या होगा। कहां हम घर बनाएंगे, कहां पशुओं को बांधेंगे और कहां सब्जियां उगाएंगे। उस जमीन में गुजारा नहीं हो सकता।”

लच्छूराम बताते हैं, “उन पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूटता रहता है। घर का कोई न कोई सदस्य अस्वस्थ हो जाता है। हमारे पास आजीविका का कोई मजबूत माध्यम नहीं है। बेटा एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करता है, कभी जाता है, कभी नहीं जा पाता। रात को दस बजे यहां से जाने के लिए कोई साधन हमारे पास नहीं है।”

देहरादून जिले के माजरीग्रांट ग्राम पंचायत के चांडी गांव में अपने कच्चे घर के सामने तारा चंद। फोटो- राजेश पांडेय

ताराचंद बताते हैं, “लगभग 20-25 साल पुराना मिट्टी, लकड़ियों से बना कच्चा घर अब रहने लायक नहीं बचा। इसमें पानी टपकता है। आंधी में टिन उड़ने लगती है। खाते में आवास बनाने के लिए, जो 60 हजार रुपये आए थे, उन पर बैंक ने टिक लगा दी है, यानी हम इस पैसे को नहीं निकाल सकते। अब लालतप्पड़ में जमीन पर मकान नहीं बनाएंगे। एक बीसा में क्या होगा। हमें लगा था कि हमारा भी पक्का घर होगा, पर अब यह सपना टूट ही गया है।”

श्याम सिंह, जो अपने पास ही घर के लायक ही जमीन बताते हैं, का कहना है, “प्रधानमंत्री आवास योजना का पैसा उनके खाते में आया है। पर, उन्होंने इसमें से एक भी पैसा खर्च नहीं किया। उनको एक अधिकारी ने कहा, पैसा ब्याज सहित वसूल किया जाएगा। उन्होंने साफ साफ कह दिया, अपना पैसा निकाल लो। मैंने खर्च नहीं किया। पर, हम इसी बाहर कहीं और नहीं जाएंगे। एक बीसा भूमि पर क्या होगा। हमारे पास पशु हैं, परिवार है। इतनी कम जमीन में न तो घर बनेगा और न ही हम सही तरह से रह सकेंगे। हमें यहीं आवास बनाने के लिए पैसा मिलेगा तो ठीक है। नहीं तो हम धीरे-धीरे ही सही, चाहे कितना ही समय लग जाए, अपने लिए घर बना ही लेंगे।”

देहरादून जिले के माजरीग्रांट ग्राम पंचायत के चांडी गांव में श्याम सिंह का कच्चा घर। फोटो- राजेश पांडेय

इस पूरे मामले में माजरी ग्रांट ग्राम पंचायत के प्रधान अनिल पाल बताते हैं, “2018 में जियो टैग सर्वे किया गया था। चांडी प्लांटेशन और बाल कुंवारी गांव, जो वन क्षेत्र में आते हैं, कुल मिलाकर 40-42 परिवारों के पास कच्चे मकान हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के पैसे पर इसलिए रोक लगाई गई है, क्योंकि वन विभाग द्वारा कोई अनापत्ति नहीं दी जा रही है। इस पर, प्रशासन ने इन परिवारों को आवास दिलाने के लिए वन क्षेत्र से अलग लालतप्पड़ में भूमि के आवंटन का प्रस्ताव पारित किया है।”

देहरादून के माजरी ग्रांट ग्राम पंचायत के प्रधान अनिल पाल। फोटो- राजेश पांडेय

ग्राम प्रधान अनिल पाल बताते हैं, “यह भूमि आवंटन इन परिवारों की सहमति से किया गया है। प्रत्येक परिवार को एक-एक बीसा भूमि आवंटित की गई है। भूमि प्रबंधन समिति द्वारा आवंटित भूमि पर आवास बनाने के लिए 20 लोगों को पहली किस्त के रूप में 60-60 हजार रुपये खातों में दिए गए। कुछ लोगों ने खाते से पैसे निकालकर आवंटित भूमि पर आवास नहीं बनाए, इसलिए खातों पर रोक लगा दी। हम चाहते हैं कि इन परिवारों को आवास मिलें, पर नियम कहता है कि वन क्षेत्र की भूमि पर योजना से आवास नहीं बनाए जा सकते। लोगों को आवंटित भूमि पर आवास बनाने चाहिए।”

यह है मामला
बताया जाता है, वर्ष 1962 में वनों के लिए पौधारोपण करने वाले परिवारों को सरकार ने चांडी और बालकुंवारी गांवों में रहने के लिए जमीन दी थी। इस क्षेत्र में आबादी बढ़ गई। सरकार की कई योजनाओं के तहत बिजली, पानी, सड़क की सुविधाएं मिल रही हैं। यहां कृषि भी हो रही है और पशुपालन भी किया जा रहा है। सरकारी योजना के तहत शौचालयों का निर्माण किया गया। पर, अब जब इन परिवारों के लिए केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना स्वीकृत हो गई है, पैसा आ गया है। अब इस पैसे से यहां आवास बनाने से रोका जा रहा है। पैसा भी वापस लेने के लिए इनके खातों को ब्लॉक किया गया है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि अधिकारी केंद्र सरकार की योजना का पैसा किसी भी लाभार्थी को सरकारी जमीन पर आवास बनाने के लिए नहीं दे सकते। ग्राम प्रधान अनिल पाल के अनुसार, “वन विभाग अनापत्ति नहीं दे रहा है, इसीलिए पात्र ग्रामीणों को योजना का लाभ दिलाने के लिए भूमि आवंटित की गई है, लेकिन ग्रामीण वहां नहीं जाना चाहते।”

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ByRajesh Pandey
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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

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