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Video: एलेक्जेंडर की दिलकश आवाज का दीवाना रहा है दून

1960 के दशक में ऑर्केस्ट्रा पर हिंदी गाने पहले पहल जिस आवाज़ में गूंजे वो एलेक्जेंडर की ही थी

  • जितेंद्र अंथवाल

पुराने देहरा की धरोहर ‘एलेक्जेंडर’। एलेक्जेंडर हमारी और हमसे थोड़ा बाद वाली पीढ़ी के बीच भी एक जाना पहचाना नाम हैं। 1990 के दशक की शुरुआत तक विवाह समारोहों, सांस्कृतिक आयोजनों के मंच पर ऑर्केस्ट्रा और एलेक्जेंडर एक-दूसरे के पर्याय थे। ये वो दौर था जब देहरादून का डीएवी कॉलेज अपने काव्यमंच और यूनियन वीक के लिए उत्तर भारत में अपनी अलग पहचान रखता था।

जाने-माने कवि, पत्रकार व कॉलेज के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. गिरिजा शंकर त्रिवेदी जी के माध्यम से यूनियन वीक के काव्य मंच पर देश के तकरीबन सभी नामचीन कवियों की मौजूदगी रही है। उसी तरह यूनियन वीक में एलेक्जेंडर के ऑर्केस्ट्रा की मौजूदगी भी वर्षों तक छात्रसंघ के इस आयोजन को ऊंचाइयां देती रही।

दरअसल, एलेक्जेंडर को देहरा की धरोहर इसलिए कहा, क्योंकि यहां 1960 के दशक में ऑर्केस्ट्रा पर हिंदी गाने पहले पहल जिस आवाज़ में गूंजे वो एलेक्जेंडर की ही थी। मिशन स्कूल (सीएनआई ब्वायज) के आर्ट के टीचर रहे मिस्टर ओपी ग्रीम ने 1958 में देहरा के पहले ऑर्केस्ट्रा की स्थापना की। ‘दूनाइट्स’ नाम से बनाया गया यह ऑर्केस्ट्रा उस वक़्त देहरादून ही नहीं, इस पूरे गढ़वाल-कुमाऊं क्षेत्र का निजी तौर पर बना पहला ऑर्केस्ट्रा था।

दूनाइट्स में मिस्टर ग्रीम के अलावा जैरी, बीर सिंह नेपाली (बीरू दाई) और बॉबी चार्ल्स, ये कुल चार सदस्य थे। ऑर्केस्ट्रा अंग्रेजी म्यूजिक और अंग्रेजी गीत ही प्रस्तुत करता था। इसकी ज्यादातर प्रस्तुतियां आईएमए, दून क्लब और मसूरी में हुआ करती थीं। 1967 में इस ऑर्केस्ट्रा से जॉन एलेक्जेंडर लॉजर्स जुड़े, जो मिशन स्कूल में मिस्टर ग्रीम के स्टूडेंट रह चुके थे।

एलेक्जेंडर के जरिये यहां हिंदी फिल्मी गीतों का ऑर्केस्ट्रा में सफर शुरू हुआ। 1968 में दून का दूसरा ऑर्केस्ट्रा स्थापित हुआ, जो ‘ऐमेचर्स’ के नाम से था। इसकी स्थापना सीडीए में कार्यरत सोलोमन प्रकाश ने की। 1970-80 के दशक में मिस्टर पंछी के ‘मेलोडिका’, कांति कुमार के ‘सिटीलाइट्स’ समेत कई ऑर्केस्ट्रा दून में हुए। मगर, एलेक्जेंडर का जलवा कायम रहा।

सीटी पर गीत, मेल-फीमेल वॉयस में गीत उनकी लोकप्रियता की वजह बनीं। किशोर कुमार के गीत ‘झुमरू’ को एलेक्जेंडर से सुने बगैर कोई आयोजन खत्म नही होता था। पैरोडी ‘थोड़ी सी भिंडी-थोड़ी सी दाल, मुझको दे दो बांकेलाल’…अब तक पुराने लोगों को याद है। बतौर एकाउंटेंट सीडीए से रिटायर होने के बाद एलेक्जेंडर अब ग्राफिक एरा में कार्यरत हैं। ऑर्केस्ट्रा की मिठास आज डीजे के शोर में भले ही गुम सी गयी हो, मगर एलेक्जेंडर का म्यूजिक को लेकर जूनून 74 साल की उम्र में अब भी यथावत है।

उत्तरांचल प्रेस क्लब के होली सम्बन्धी आयोजन के जरिये हम दून की ‘संगीतमयी पहचान’ रहे एलेक्जेंडर से नई पीढ़ी का परिचय कराने और पुरानी पीढ़ी की मीठी स्मृतियों को ताजा करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी कार्यक्रम की रूपरेखा तय करने के लिए आज एलेक्जेंडर जी क्लब कार्यालय पहुंचे, तो कुछ गाने-गुनगुनाने से खुद को नहीं रोक पाए। आप भी सुनिए उनकी बांसुरी सरीखी ‘सीटी’ से फ़िल्म ‘मधुमति’ के गीत की ये मधुर लहर…..।

  • लेखक वरिष्ठ पत्रकार और उत्तराखंड के सांस्कृतिक मामलों के गहरे जानकार हैं। वर्तमान में उत्तरांचल प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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