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उम्र 69 साल, रातभर गार्ड की नौकरी, सुबह लगाते हैं टी स्टाल

कहते हैं, बारिश हो या ठंड, शायद ही कोई दिन हो, जब टी स्टाल नहीं लगाया हो

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव ब्लॉग

सर्द शाम यही कोई साढ़े सात बजे 69 साल के विजय पाल वर्मा ऋषिकेश रोड पर साइकिल से जौलीग्रांट जा रहे हैं। दोनों हैंडल पर बड़े थैले टंगे हैं, जो ज्यादा वजनदार नहीं हैं। सौंग नदी पुल पार करने के बाद थोड़ी चढ़ाई पर विजय पाल साइकिल से उतर जाते हैं और पैदल ही चलते हैं। बातचीत में वो बताते हैं, डोईवाला के प्रेमनगर बाजार में रहते हैं और जौलीग्रांट हिमालयन हॉस्पिटल चौक पर बतौर गार्ड सेवाएं देते हैं। रात को वहां की 10-12 दुकानों की देखरेख की जिम्मेदारी उनकी है। डेढ़ साल से गार्ड हैं और सुबह चार बजे के बाद वहीं चौक पर चाय का स्टाल चलाते हैं। कहते हैं, बारिश हो या ठंड, शायद ही कोई दिन हो, जब टी स्टाल नहीं लगाया हो।

हमने सुबह उनकी दुकान पर चाय पीने की इच्छा जाहिर की, तो विजय पाल बोले, सुबह आ जाओ, वहीं मिलूंगा, हिमालयन हॉस्पिटल के मेन गेट के पास। चाय आपको पसंद आएगी।

ठंड काफी है। डोईवाला से जौलीग्रांट तक मिठाइयों की दुकानें खुली हैं। एक-दो परचून और अखबार विक्रेताओं की दुकानें खुली हैं।

प्रेमनगर बाजार से जौलीग्रांट स्थित श्रीदेव सुमन चौक की दूरी लगभग चार किमी. है। वर्मा जी, रोजाना आने जाने के लिए लगभग आठ किमी. साइकिल चलाते हैं।

सुबह के छह बजे हम पहुंच गए उनके टी स्टाल पर जहां, कुछ लोग खड़े हैं, पास में ही उन्होंने अलाव जला रखा है। यह अलाव राहगीरों को सर्दी से राहत देता है और गरमा गरम चाय पीने का मौका भी।

विजयपाल बताते हैं, शुरुआत में मैंने देहरादून में ही भैंसे पालकर डेयरी खोली। इसके बाद देहरादून के चंदन नगर में टी स्टाल चलाया।यह 1981-82 का समय था। नौकरियों के मौके मिले पर मैंने अपना खुद का काम करना ज्यादा सही समझा।

मैं ऋषिकेश चला गया, वहां त्रिवेणी घाट पर फूलों की बिक्री करने लगा। करीब 18 साल ऋषिकेश में फूलों का व्यवसाय किया। पर, वहां दुकानों को पक्का किया जा रहा था, जिसके लिए मेरे पास पैसा नहीं था। वर्ष 2000 में काम छोड़कर देहरादून चंदन नगर आ गया। वहां परचून की दुकान खोली, जिसमें नुकसान हो गया। दस साल बाद फिर ऋषिकेश गया और वहां फिर से फूलों का काम शुरू किया।

ऋषिकेश से फिर देहरादून वापसी और वहां से डोईवाला आकर मकान बनाया। बच्चों को पढ़ाया, एक बेटी की शादी की। बेटा होटल मैनेजमेंट करके विदेश नौकरी करने चला गया। बेटे और एक बेटी की शादी की जिम्मेदारी है।

इससे पहले यहां जौलीग्रांट में ही एक व्यावसायिक संस्थान में सेवाएं दे रहा था, पर वो संस्थान बंद हो गया। यहां से हरिद्वार चला गया, जहां टी स्टाल लगाया। फिर, डोईवाला आ गया। अब करीब डेढ़ साल से बतौर गार्ड जौलीग्रांट में सेवाएं दे रहा हूं। सुबह चार बजे के बाद यहां टी स्टाल लगाता हूं। करीब तीन से चार लीटर दूध की चाय बिक्री हो जाती है।

वो बताते हैं, सुबह यहां बहुत लोग होते हैं, जिनको चाय की तलाश रहती है। मैंने चंदरनगर देहरादून के टी स्टाल पर 25 पैसे की चाय पिलाई।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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