Arth Ganga Livelihood Program: राजेश पांडेय, देहरादून, 29 अप्रैल, 2026ः नदी केवल जल की धारा नहीं, बल्कि सभ्यता की धुरी होती है। इसी धुरी को आधार बनाकर भारत सरकार की ‘नमामि गंगे’ परियोजना के तहत भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने वर्ष 2016 में एक अनूठे अभियान ‘गंगा प्रहरी’ की शुरुआत की। एक दशक से संचालित यह अभियान न केवल गंगा के जलीय जीवों के संरक्षण के प्रति लोगों को संवेदनशील बना रहा है, बल्कि नदी किनारे बसे समुदायों के लिए ‘अर्थ गंगा’ के माध्यम से आजीविका के नए द्वार भी खोल रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की इस परियोजना में गंगा प्रहरियों के आजीविका संवर्धन के लिए कार्य कर रहीं विशेषज्ञ हेमलता खंडूड़ी के साथ हुई विशेष चर्चा के माध्यम से अभियान के हर आयाम और इसकी सफलता की कहानी को विस्तार से समझा जा सकता है।
Arth Ganga Livelihood Program: अभियान की सफलता के पीछे जमीनी अनुभवों का बड़ा हाथ है। हेमलता खंडूड़ी ने अपने सफर की शुरुआत उत्तराखंड के प्रसिद्ध एनजीओ ‘श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम’ से की और बाद में विश्व बैंक की ‘स्वजल परियोजना’ के माध्यम से गांवों में शुद्ध पेयजल और सामुदायिक भागीदारी पर काम किया। इसके बाद, ‘महिला समाख्या’ परियोजना के जरिये उन्होंने महिला सशक्तिकरण और साक्षरता के क्षेत्र में गहरा अनुभव प्राप्त किया। जब नमामि गंगे के तहत जैव विविधता और गंगा संरक्षण की परियोजना शुरू हुई, तब संस्थान को ऐसे विशेषज्ञों की आवश्यकता थी, जो समुदायों को संरक्षण से जोड़ने के लिए उन्हें मोबिलाइज कर सकें। इसी अनुभव ने गंगा प्रहरियों को आजीविका से जोड़ने के अभियान को एक ठोस आधार दिया।
Arth Ganga Livelihood Program: श्रीमती खंडूड़ी शुरुआती अनुभवों को साझा करते हुए बताती हैं, अन्य राज्यों में काम करना उत्तराखंड की तुलना में काफी अलग था। उत्तराखंड में महिलाएं सामाजिक रूप से सक्रिय हैं, जबकि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उन्हें घर से बाहर निकालकर अभियान का हिस्सा बनाने में काफी समय लगा। लोगों को जलीय जीवों, जैसे कछुए और शुश (डॉल्फिन) के महत्व को समझाना एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि स्थानीय स्तर पर लोग इनके पारिस्थितिक महत्व से अनभिज्ञ थे।
‘अर्थ गंगा’: आजीविका और नदी का अटूट रिश्ता
एक सवाल पर उन्होंने बताया, ‘अर्थ गंगा’ भारत सरकार की एक ऐसी अवधारणा है, जो नदी तंत्र के संरक्षण और उसके किनारे रहने वाले समुदायों की आजीविका को आपस में जोड़ती है। इसके पीछे मूल सोच यह है कि यदि समुदाय को आर्थिक रूप से नदी से नहीं जोड़ा जाएगा, तो वे संरक्षण कार्यों में रुचि नहीं लेंगे। ऐतिहासिक रूप से भी सभ्यताएं नदियों के किनारे इसीलिए बसीं, क्योंकि वहां भोजन, कृषि और आवागमन के काफी संसाधन थे। वर्तमान में इस अवधारणा के तहत पर्यावरण आधारित और सस्टेनेबल लाइवलीहुड के क्षेत्रों में कार्य किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय लोगों का आर्थिक लाभ भी बना रहे और नदी की गुणवत्ता व स्वच्छता भी सुरक्षित रहे। संसाधनों के अति दोहन और प्रदूषण को रोकने के लिए समुदायों को ही रक्षक बनाना इस परियोजना का मुख्य केंद्र है।
गंगा बेसिन के पांच राज्यों में स्थानीय संसाधनों के आधार पर अलग-अलग गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
उत्तराखंड में मुख्य ध्यान पर्यटन पर है। स्थानीय लोगों को होम-स्टे विकसित करने, बर्ड वाचिंग और इको-टूरिज्म के लिए प्रशिक्षित किया गया है. इसके साथ ही मिलेट्स (मोटे अनाज) के प्रसंस्करण, बिस्कुट और लड्डू बनाने के साथ-साथ अगरबत्ती और प्रसाद निर्माण की ट्रेनिंग दी गई है। उत्तर प्रदेश में हस्तशिल्प और सिलाई के काम को आधुनिक रूप दिया जा रहा है, जैसे मूँज की घास से बास्केट और बैग बनाना। बनारस जैसे शहरों में इको-टूरिज्म और प्रसाद मेकिंग पर विशेष ध्यान दिया गया है। बिहार में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस और जलकुंभी (वॉटर हाइसिंथ) से विभिन्न उत्पाद बनाने का कौशल सिखाया गया है।
इन गतिविधियों का चयन करते समय दो मुख्य बातों पहला- स्थानीय समुदाय की इच्छा और दूसरा- वहां उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन का ध्यान रखा जाता है।
‘जलज’ और मार्केटिंग का डिजिटल मॉडल
कम्युनिटी एक्सपर्ट श्रीमती खंडूड़ी बताती हैं, उत्पादों के निर्माण के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन्हें बाजार तक पहुंचाने की होती है। इसके समाधान के रूप में ‘जलज’ (Jalaj) मॉडल को विकसित किया गया है। इसकी शुरुआत बनारस के अस्सी घाट पर एक बड़े बजरा (नाव) से हुई थी, जिसे मार्केटिंग और सूचना केंद्र के रूप में उपयोग किया गया। इस मॉडल की सफलता को देखते हुए अब पूरे गंगा बेसिन में लगभग 75 ‘जलज’ केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है। ये केंद्र न केवल उत्पादों की बिक्री करते हैं, बल्कि पर्यटकों को गंगा की जैव विविधता और उसके संरक्षण के प्रति जागरूक भी करते हैं। इसके माध्यम से प्रशिक्षित गंगा प्रहरी सीधे बाज़ार से जुड़कर अपनी आय बढ़ा पा रहे हैं।
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सस्टेनेबिलिटी और भविष्य की चुनौतियां
एक सवाल पर उनका कहना है, किसी भी परियोजना के समाप्त होने के बाद उसकी निरंतरता सबसे बड़ा सवाल होती है। इसके लिए संस्थान ने कई स्तरों पर प्रयास किए हैं। गंगा प्रहरियों की छोटी-छोटी संस्थाएं पंजीकृत की जा रही हैं ताकि वे भविष्य में भी संरक्षण और आजीविका के कार्यों को स्वतंत्र रूप से चला सकें। इसके अलावा उन्हें एनआरएलएम (NRLM) और जिला प्रशासन के साथ लिंक किया जा रहा है, ताकि उन्हें सरकारी योजनाओं और बाज़ार का निरंतर लाभ मिलता रहे। अभियान के दौरान यह भी देखा गया कि कौशल विकास का प्रभाव केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़ी संख्या में युवा भी इससे जुड़े हैं। कई गंगा प्रहरियों ने इस प्रशिक्षण के बाद अपनी योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरियों और अन्य अच्छे पदों पर स्थान प्राप्त किया है।
उनका मानना है, यह अभियान केवल आर्थिक मजबूती नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की भी कहानी है। महिलाओं के व्यक्तित्व में आया बदलाव इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। जो महिलाएं कभी घर से बाहर नहीं निकलती थीं, वे आज न केवल अपनी बात प्रमुखता से रखती हैं, बल्कि प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए दूसरे शहरों तक यात्रा करने में भी सक्षम हैं।
व्यक्तित्व विकास की यह प्रक्रिया संरक्षण के साथ-साथ स्वावलंबन की राह भी आसान बना रही है। गंगा प्रहरी अभियान ने यह साबित कर दिया है कि जब संरक्षण को स्वावलंबन से जोड़ दिया जाता है, तो वह एक जन-आंदोलन का रूप ले लेता है। आज गंगा किनारे रहने वाले लोग नदी को केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि अपनी जीवनरेखा के रूप में देख रहे हैं, कम्युनिटी एक्सपर्ट हेमलता खंडूड़ी कहती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Q&A)
प्रश्न 1: ‘गंगा प्रहरी’ अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है? उत्तर: इस अभियान का प्राथमिक उद्देश्य गंगा की जलीय जैव विविधता (Aquatic Biodiversity) का संरक्षण करना है। इसके लिए नदी किनारे रहने वाले स्थानीय समुदायों को ‘वालंटियर’ के रूप में प्रशिक्षित किया जाता है ताकि वे जलीय जीवों के प्रति संवेदनशील बनें और नदी के रक्षक के रूप में कार्य करें।
प्रश्न 2: ‘अर्थ गंगा’ की अवधारणा क्या है और यह संरक्षण के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? उत्तर: ‘अर्थ गंगा’ का अर्थ है नदी संरक्षण को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना। इसका तर्क यह है कि यदि गंगा किनारे रहने वाले लोगों को नदी के माध्यम से स्थायी आजीविका (Livelihood) मिलेगी, तो वे प्राकृतिक रूप से नदी को स्वच्छ और सुरक्षित रखने के लिए प्रेरित होंगे। यह संरक्षण और विकास के बीच एक संतुलन बनाने की प्रक्रिया है।
प्रश्न 3: गंगा प्रहरी बनने के लिए समुदायों को किस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है? उत्तर: भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा स्थानीय संसाधनों के आधार पर विभिन्न प्रशिक्षण दिए जाते हैं:
पर्यटन: बर्ड वाचिंग, टूरिस्ट गाइड और होम-स्टे प्रबंधन।
हस्तशिल्प: बाँस, मूँज की घास और कपड़े से आधुनिक उत्पाद बनाना।
प्रसंस्करण: मिलेट्स (मोटे अनाज) से खाद्य पदार्थ बनाना और धार्मिक पर्यटन के लिए अगरबत्ती व प्रसाद का निर्माण।
प्रश्न 4: ‘जलज’ (Jalaj) मॉडल क्या है और यह आजीविका में कैसे मदद करता है? उत्तर: ‘जलज’ गंगा प्रहरियों द्वारा बनाए गए उत्पादों के लिए एक मार्केटिंग और सूचना केंद्र है। इसकी शुरुआत बनारस में एक नाव (बजरे) से हुई थी। ये केंद्र पर्यटकों को गंगा की जैव विविधता की जानकारी देते हैं और साथ ही प्रहरियों के उत्पादों को सीधे बाजार उपलब्ध कराते हैं, जिससे उनकी आय बढ़ती है।
प्रश्न 5: क्या यह अभियान केवल महिलाओं के लिए है? उत्तर: नहीं। यद्यपि महिला सशक्तिकरण इस अभियान का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, लेकिन बड़ी संख्या में पुरुष और युवा भी इसमें सक्रिय हैं। कई युवाओं ने इस प्रशिक्षण के माध्यम से कौशल हासिल कर विभिन्न क्षेत्रों और यहाँ तक कि सरकारी नौकरियों में भी स्थान पाया है।
प्रश्न 6: परियोजना समाप्त होने के बाद इस कार्य की निरंतरता (Sustainability) कैसे सुनिश्चित की जाती है? उत्तर: इसकी निरंतरता के लिए संस्थान दो स्तरों पर काम कर रहा है:
संस्थागत ढाँचा: सक्रिय गंगा प्रहरियों की अपनी स्थानीय संस्थाएँ पंजीकृत की जा रही हैं।
सरकारी लिंक: प्रहरियों को एनआरएलएम (NRLM) और जिला प्रशासन की योजनाओं से जोड़ा जा रहा है ताकि उन्हें बाज़ार और सहायता मिलती रहे।
प्रश्न 7: उत्तराखंड के अलावा अन्य राज्यों में इस अभियान की क्या प्रमुख गतिविधियाँ हैं? उत्तर: * उत्तर प्रदेश: हस्तशिल्प, सिलाई और ‘मूँज’ घास के उत्पादों पर विशेष ध्यान है।
बिहार: यहाँ बाँस (Bamboo) और जलकुंभी (Water Hyacinth) से क्राफ्ट बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।
पश्चिम बंगाल: यहाँ स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुसार जलीय उत्पादों और पर्यटन पर जोर दिया जाता है।
प्रश्न 8: इस अभियान से महिलाओं के जीवन में क्या बड़ा सामाजिक बदलाव आया है? उत्तर: आर्थिक मजबूती के साथ-साथ महिलाओं के आत्मविश्वास और गतिशीलता (Mobility) में भारी वृद्धि हुई है। जो महिलाएँ पहले घर से बाहर निकलने में संकोच करती थीं, वे आज स्वतंत्र रूप से अपने केंद्र चला रही हैं, बातचीत कर रही हैं और एक उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं।




