राजेश पांडेय, 19 अप्रैल, 2026
Ganga Prahari Movement Dr Ruchi Badola: वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की डीन प्रोफेसर डॉ. रुचि बडोला से जब यह पूछा गया कि सेवानिवृत्ति के बाद की क्या योजना है, उन्होंने एक लाइन में कहा, “गंगा की सेवा”। 2016 में शुरू नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) के नमामि गंगे प्रोजेक्ट में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की भागीदारी का नेतृत्व कर रहीं डॉ. बडोला ने गंगा प्रहरी के कान्सेफ्ट पर काम ही नहीं किया, बल्कि यह उनका ही विचार है। इसकी भूमिका बच्चों से लेकर हर आयुवर्ग के लोगों को गंगा और सहायक नदियों के संरक्षण के लिए जागरूक करना तथा जलीय जीवन की सुरक्षा के लिए संवेदनशील बनाया। डॉ. बडोला गंगा बेसिन एरिया के 11 राज्यों में अपनी टीम को नेतृत्व प्रदान कर रही हैं। ‘गंगा प्रहरी’ और ‘बाल गंगा प्रहरी’ जैसे विश्व प्रसिद्ध अभियान ने नदी संरक्षण को जन आंदोलन में बदल दिया है। इसका श्रेय डॉ. बडोला और उनकी टीम को जाता है।
Ganga Prahari Movement Dr Ruchi Badola: डॉ. रुचि बडोला, जिन्होंने अपना पूरा जीवन पारिस्थितिकी और सामुदायिक प्रबंधन को समर्पित कर दिया है, मानती हैं कि संरक्षण तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक उसमें उस मिट्टी और पानी से जुड़े आम इंसान की भागीदारी न हो। उनकी इस यात्रा की शुरुआत खुद देहरादून की वादियों से हुई, जहां से निकलकर उन्होंने वन्यजीव संस्थान में एक शोधकर्ता के रूप में कदम रखा और बाद में एक ऐसी नीति की आधारशिला रखी जो आज वैश्विक स्तर पर सराही जा रही है।
रेडियो केदार के साथ गंगा प्रहरी मुहिम पर केंद्रित एक साक्षात्कार में डॉ. बडोला कहती हैं, नदी सिर्फ जल की धारा नहीं होती, बल्कि वह एक सभ्यता की धड़कन होती है। भारत की जीवनदायिनी गंगा के साथ भी यही सत्य जुड़ा है। विज्ञान और स्वदेशी ज्ञान में किसी तरह के द्वंद्व को खारिज करते हुए डॉ. रुचि बडोला कहती हैं, लोग अक्सर पूछते हैं कि क्या विज्ञान और पुरानी परंपराएं एक साथ चल सकती हैं? उनका अनुभव कहता है कि टकराव विज्ञान से नहीं, बल्कि उस ‘आधुनिकता’ से है जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाती है।
Ganga Prahari Movement Dr Ruchi Badola: उन्होंने पाया कि गंगा के किनारे बसे समुदायों के पास सदियों पुराना ऐसा ज्ञान है जो वैज्ञानिक रूप से भी उतना ही सटीक है। उदाहरण के लिए, हमारे बुजुर्ग जानते थे कि जंगलों में प्रवेश करते समय अनुशासन का पालन क्यों जरूरी है। तेज आवाज न करना या जंगल में चमकीले कपड़े पहनकर नहीं जाना, परफ्यूम नहीं लगाना, यह सब केवल अंधविश्वास नहीं… बल्कि ‘वाइल्डलाइफ डिसीप्लिन’ का हिस्सा है, जिसे आज आधुनिक वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। गंगा प्रहरी अभियान ने इसी पारंपरिक विवेक को वैज्ञानिक शोध के साथ जोड़ने का काम किया है।
डॉ. बडोला बताती हैं, इस मुहिम का एक बेहद भावनात्मक और सशक्त हिस्सा ‘गंगा ग्रैंडमास’ (Ganga Grandmas) वर्कशॉप रही। हमने महसूस किया कि 55-60 साल से अधिक उम्र की महिलाओं के पास ज्ञान की वह पूंजी है, जो किसी किताब में नहीं मिलेगी। पहाड़ों में प्रचलित ‘धारा पूजना’ जैसी रस्में यह सिखाती हैं कि जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाना हमारी सामाजिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारी है। आज के एकल परिवारों और सोशल मीडिया के दौर में यह ज्ञान कहीं खो न जाए, इसके लिए इन ‘गंगा ग्रैंडमास’ के अनुभवों को संकलित किया गया। यह बुजुर्ग महिलाएं अब केवल घरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अपने गांवों में पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी प्रचारक बन गई हैं।
एक सवाल पर डॉ. रुचि बडोला का कहना है, बच्चों में संवेदनशीलता जगाने के लिए ‘बाल गंगा प्रहरी‘ कार्यक्रम को एक नया आयाम दिया गया है। उनका मानना है, मनुष्य जो अनुभव करता है, उसे वह 80% तक याद रखता है। इसीलिए बच्चों को केवल किताबी ज्ञान न देकर उन्हें प्रकृति के करीब ले जाया जाता है। उन्हें नाटकों, कहानियों और खेलों के माध्यम से यह समझाया जाता है कि भविष्य की असली पूंजी साफ पानी और शुद्ध ऑक्सीजन हैं। लक्ष्य यह है कि बच्चा बड़ा होकर चाहे किसी भी पेशे में जाए, लेकिन उसके भीतर एक जिम्मेदार नागरिक जीवित रहे जो अपनी नदी और पर्यावरण की रक्षा करना जानता हो। आज गंगा के किनारे बसे कई स्कूलों में स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति जो जागरूकता दिखती है, वह इसी शिक्षा का परिणाम है।
अक्सर यह सवाल उठता है कि किसी को इस अभियान से जुड़ने पर क्या लाभ होगा?, के जवाब में डॉ. बडोला स्पष्ट करती हैं कि “खाली पेट संरक्षण संभव नहीं है”, लेकिन उन्होंने गंगा प्रहरियों को कभी पैसा या मानदेय नहीं दिया, क्योंकि वे उन्हें किसी योजना पर निर्भर नहीं बनाना चाहती थीं। इसके बजाय, उन्होंने ‘ह्यूमन कैपिटल’ विकसित करने पर ध्यान दिया। प्रहरियों को कंप्यूटर, प्लंबिंग, हस्तशिल्प और इको-टूरिज्म की ट्रेनिंग दी गई। उन्हें सिखाया गया कि यदि गंगा साफ होगी, तो डॉल्फिन देखने पर्यटक आएंगे और उससे उनकी आजीविका बढ़ेगी। आज यह लोग मोटे अनाज (मिलेट्स) के उत्पाद बना रहे हैं और बाजार से जुड़कर अपनी आर्थिकी मजबूत कर रहे हैं। यह मॉडल अब खुद-ब-खुद आगे बढ़ रहा है, क्योंकि लोगों ने इसे अपनी प्रगति का हिस्सा मान लिया है।
Ganga Prahari Movement Dr Ruchi Badola: डॉ. रुचि बडोला बताती हैं, पिछले दस वर्षों में नमामि गंगे और गंगा प्रहरी अभियान के प्रभाव अब धरातल पर दिखने लगे हैं। वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में अब डॉल्फिन, घड़ियाल, कछुए और ऊदबिलाव उन जगहों पर भी देखे जा रहे हैं, जहां से वे लुप्त हो चुके थे। गंगा प्रहरी आज न केवल स्वयंसेवक हैं, बल्कि वे वैज्ञानिकों के लिए ‘सिटीजन साइंस’ का काम कर रहे हैं। उनकी रोज की रिपोर्टिंग से जलीय जीवन के संरक्षण में बड़ी मदद मिल रही है। डॉ. बडोला का कहना है, “पृथ्वी की पूजा ही सबसे बड़ी पूजा है”। भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा और विज्ञान के साथ-साथ अपनी संस्कृति के उस विवेक को भी अपनाना होगा जो हमें प्रकृति के साथ जीना सिखाता है।
शिक्षा से नेतृत्व तक का सफर
डॉ. रुचि बडोला, जिन्होंने अपना जीवन पारिस्थितिकी और सामुदायिक प्रबंधन को समर्पित किया है, उनकी स्वयं की यात्रा बेहद प्रेरणादायक है। देहरादून में जन्मी डॉ. बडोला ने अपनी स्कूली शिक्षा ‘कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी’ से पूरी की। इसके बाद उन्होंने एमकेपी कॉलेज देहरादून से अर्थशास्त्र में मास्टर्स किया। अपनी शैक्षणिक यात्रा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से अर्थशास्त्र में पीएचडी (PhD) की उपाधि प्राप्त की। शुरुआत में सिविल सेवा में जाने का विचार रखने वाली डॉ. बडोला ने अंततः शोध के रास्ते को चुना। उस वक्त भारतीय वन्यजीव संस्थान नया-नया संस्थान खुला था। पहली बार वहां पर कुछ रिसर्च प्रोजेक्ट्स के अंतर्गत रिसर्चर्स के लिए एडवर्टाइजमेंट आया। एडवर्टाइजमेंट में लिखा था कि इकोनॉमिक्स और सोशियोलॉजी वाले भी अप्लाई कर सकते हैं। रिटन एग्जाम दिया, जो क्वालीफाई हो गया, फिर इंटरव्यू हुआ तो उसमें भी चयन हो गया। तीन महीने की ट्रेनिंग कराई गई, जंगलों में रहना, टेंट में रहना, तकनीक सीखना। मेरे टीचर्स को उम्मीद नहीं थी कि यह लड़की जंगलों में चल पाएगी, लेकिन जब उन्हें लगा कि यह तो पहाड़ की, तो उनको कॉन्फिडेंस आया।
कला और अर्थशास्त्र की पृष्ठभूमि होने के बावजूद उन्होंने कठिन वैज्ञानिक प्रशिक्षण लिया और राजाजी-कॉर्बेट क्षेत्र में सोशियो-इकोलॉजिकल सिस्टम्स पर अपना पायनियरिंग प्रोजेक्ट “कैसे जंगलों के किनारे वाले लोग जंगल पर निर्भर करते हैं और उनकी निर्भरता का क्या असर जंगलों की वेजिटेशन और वन्यजीवों पर पड़ता है” को पूरा किया। इसी बीच संस्थान में फैकल्टी पोजीशंस आईं। एक आर्ट्स के स्टूडेंट को वाइल्डलाइफ साइंस जैसे डिपार्टमेंट में लिया गया। उनके लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी अपने को सार्थक बनाना। एक कला वर्ग की छात्रा से लेकर संस्थान की डीन बनने तक का उनका सफर यह साबित करता है कि प्रतिबद्धता हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
Frequently Asked Questions (FAQ)
1. गंगा प्रहरी कौन हैं?
गंगा प्रहरी वे स्वयंसेवक हैं जो गंगा नदी के किनारे बसे समुदायों से आते हैं और जलीय जीवन के संरक्षण व स्वच्छता के लिए कार्य करते हैं।
2. बाल गंगा प्रहरी अभियान का क्या उद्देश्य है?
इसका उद्देश्य बच्चों को कहानियों और खेलों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाना है ताकि वे भविष्य के जिम्मेदार नागरिक बन सकें।
3. गंगा ग्रैंडमास (Ganga Grandmas) क्या है?
यह एक वर्कशॉप और मुहिम है जिसमें बुजुर्ग महिलाओं के पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक रस्मों (जैसे धारा पूजना) को नदी संरक्षण से जोड़ा जाता है।
4. गंगा प्रहरी अभियान में स्थानीय लोगों को क्या लाभ मिलता है?
अभियान के तहत उन्हें कौशल विकास (जैसे इको-टूरिज्म, हस्तशिल्प) की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे नदी की स्वच्छता के साथ-साथ उनकी आजीविका भी बढ़ती है।
5. डॉ. रुचि बडोला कौन हैं?
डॉ. रुचि बडोला भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की डीन हैं और नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत ‘गंगा प्रहरी’ अभियान की मुख्य सूत्रधार हैं।



