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05 दिसंबर को मृदा दिवसः मिट्टी में बढ़ रहा खारापन खाद्य सुरक्षा पर खतरा

खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने मिट्टी का खारापन बढ़ने को एक ऐसी समस्या बताया है, जिससे वैश्विक ख़ाद्य सुरक्षा के लिए संकट बढ़ रहा है। मिट्टी में खारापन बढ़ने की वजह, जल की अपर्याप्त आपूर्ति और ख़राब गुणवत्ता वाली जल निकासी प्रणालियां  तथा अनुपयुक्त जल प्रबन्धन को बताया गया।
यूएन समाचार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, मृदा (soil) या मिट्टी के खारेपन से तात्पर्य मिट्टी में नमक का अत्यधिक स्तर पाया जाना है, जिससे पौधों और वनस्पति का विकास प्रभावित होता है और यह जीवन के लिए ज़हरीला भी हो सकता है। ऐसा स्वाभाविक वजहों से हो सकता है, जैसे कि मरुस्थलों में जल की कमी और गहन वाष्पीकरण के कारण, या फिर मानवीय गतिविधियां भी मिट्टी में खारेपन की वजह बन सकती हैं।
‘विश्व मृदा दिवस’ (World Soil Day) हर वर्ष 5 दिसम्बर को मनाया जाता है, जिसके ज़रिये स्वस्थ मिट्टी की अहमियत को रेखांकित करने के साथ-साथ मृदा संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाता है।

यूएन एजेंसी के महानिदेशक क्यू डोन्गयू ने शुक्रवार को  एक कार्यक्रम में कहा, “मिट्टी, कृषि की नींव है और दुनिया भर में किसान, हमारे 95 फ़ीसदी भोजन के उत्पादन के लिए मिट्टी पर निर्भर हैं।”
“इसके बावजूद, हमारी मृदाओं के लिए जोखिम पैदा हो गया है।”
यूएन एजेंसी ने ज़ोर देकर कहा कि कृषि के टिकाऊ तौर-तरीक़ों के अभाव, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और बढ़ती विश्व आबादी के कारण, मृदा पर दबाव बढ़ रहा है, और दुनिया भर में चिन्ताजनक दर पर मृदा क्षरण हो रहा है।
एक अनुमान के अनुसार, 83 करोड़ हेक्टेयर से अधिक मृदा, पहले से ही खारेपन से प्रभावित है, जो कि विश्व में भूमि की कुल सतह का 9 फ़ीसदी है।
खारेपन से प्रभावित मिट्टी सभी महाद्वीपों और हर प्रकार की जलवायु परिस्थितियों में पाई जाती है। सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में मध्य एशिया, मध्य पूर्व, दक्षिण अमेरिका, उत्तर अफ़्रीका और प्रशान्त क्षेत्र हैं।
मृदा संसाधनों के बेहतर प्रबन्धन के लिए, यूएन एजेंसी देशों को ज़रूरी समर्थन मुहैया करा रही है। उज़बेकिस्तान में, यूएन एजेंसी की वैश्विक मृदा साझीदारी (Global Soil Partnership) के तहत, वैज्ञानिकों के साथ मिलकर जलवायु-स्मार्ट मृदा प्रबन्धन तरीक़ों को विकसित किया जा रहा है। इससे मिट्टी के खारेपन से प्रभावित इलाकों में फ़सलों को फिर से फलने-फूलने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा, यूएन एजेंसी ने भरोसेमन्द डेटा की उपलब्धता पर भी बल दिया है। कई देश इस विषय में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 142 देशों में से 55 प्रतिशत के पास मृदा विश्लेषण के लिये पर्याप्त क्षमता का अभाव है। इनमें से अधिकतर देश अफ़्रीका और एशिया में स्थित हैं।
यूएन एजेंसी के मुताबिक़, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन व कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए, स्वस्थ मृदा की अहम भूमिका पर, पिछले महीने कॉप 26 जलवायु सम्मेलन के दौरान भी चर्चा हुई। एजेंसी ने देशों से आग्रह किया है कि टिकाऊ मृदा प्रबन्धन के लिए मज़बूत संकल्प लेते हुए, मिट्टी से जुड़ी जानकारी व क्षमताओं को जल्द से जल्द बेहतर बनाया जाना होगा।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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