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Uttarakhand: भाजपा के सामने अपना ही रिकार्ड तोड़ने की चुनौती, कांग्रेस को लगानी होगी लंबी छलांग

2017 में 46.51 फीसदी वोट मिले थे भाजपा को, कांग्रेस को पहले से 15 फीसदी से अधिक वोट जुटाने होंगे

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

उत्तराखंड में पहाड़ से मैदान तक शीत लहर चल रही है और बीच बीच में बारिश से भी मौसम ठंडा हो रहा है। इन सबके बीच दिन में मतदाता धूप और विधानसभा चुनाव पर चर्चा से कुछ गरमाहट महसूस कर रहे हैं, पर चुनाव में जीत के लिए दिनरात एक कर रहे राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना वोट बैंक बचाने की है।

राज्य में अभी तक दो-दो बार सरकारें बना चुके सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस को इसी चुनौती ने बेचैन किया है। यह चुनौती तब और ज्यादा परेशान करती दिखती है, जब एक और राजनीतिक दल AAP (आम आदमी पार्टी) पूरी ताकत से दावेदारी पेश कर रहा है। अभी तक उत्तराखंड राज्य में विधानसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस ही प्रमुख रूप से भागीदारी करते रहे और बारी-बारी से सत्ता में रहे।

इन दलों के सामने चुनौतियों को जानने से पहले, 2002 से 2017 तक चुनावों में इनको हासिल वोट प्रतिशत पर नजर डालते हैं-

2002 से 2017 तक प्राप्त वोट प्रतिशत

वर्ष भाजपा कांंग्रेस बसपा उक्रांद निर्दलीय
2002 25.81 26.91 11.20 6.36 16.63
2007 31.90 29.59 11.76 6.38 11.21
2012 33.38 34.03 12.28 3.20 12.28
2017 46.51 33.49 7.04 1 10.38

2002 में कांग्रेस ने 26.91 प्रतिशत वोटों के साथ उत्तराखंड में सरकार बनाई थी, जबकि भाजपा को 25.81 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे।2007 में भाजपा के वोट बैंक में सुधार हुआ और उसने 31.9 प्रतिशत वोट हासिल किए और सरकार बनाई, इस चुनाव में कांग्रेस को 29.59 फीसदी वोट मिले। 2012 में कांग्रेस और फिर 2017 में भाजपा ने सरकार बनाई।

इन आंकड़ों से मुख्य रूप से निम्न तथ्य सामने आते हैं-

2002 से 2017 तक हर चुनाव में भाजपा के वोट बैंक में बढोतरी हुई। भले ही वो सत्ता में आई हो या नहीं। केवल 2017 के चुनाव को छोड़कर कांग्रेस भी हर बार वोट प्रतिशत में इजाफा करती रही। हालांकि 2017 के चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत महज 0.54 फीसदी ही कम हुआ। पर, भाजपा ने 2017 में 13.13 फीसदी वोटों की बड़ी उछाल के साथ सत्ता हासिल की।

2002 में बहुजन समाज पार्टी के सात प्रत्याशी निर्वाचित हुए थे। बसपा को 11.20 फीसदी वोट मिले थे। 2007 में बसपा के 11,76 फीसदी वोटों के साथ आठ प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी। 2012 में बसपा के निर्वाचित दावेदारों की संख्या घटकर तीन हो गई, पर पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़कर 12.28 प्रतिशत हो गया। 2017 में बसपा का एक भी प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर सका और वोट प्रतिशत 7.04 फीसदी पर पहुंच गया।

वहीं, 2002 में उत्तराखंड क्रांति दल के चार प्रत्याशी विजयी हुए और उक्रांद का वोट प्रतिशत 6.36 फीसदी पर था। 2017 में उक्रांद का वोट प्रतिशत एक फीसदी पर पहुंच गया।

निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2002 में 16.63 फीसदी वोट हासिल किए। 2007 में 11.21 फीसदी, 2012 में 13.34 और 2017 में 10.38 फीसटी वोट ही निर्दलियों को मिले। कुल मिलाकर निर्दलियों का वोट बैंक उत्तराखंड में लगातार कम होता जा रहा है। हालांकि 2002 से लेकर 2012 तक तीन-तीन तथा 2017 में दो निर्दलीय उम्मीदवार निर्वाचित हुए हैं। अभी तक राज्य में निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोटों के अनुसार कहा जा सकता है, अधिकतर मतदाताओं का विश्वास राजनीतिक दलों में ही रहा है।

2017 के चुनाव में वोट प्रतिशत पर गौर करें तो 2012 की तुलना में यहां सिर्फ भाजपा के वोट बैंक में ही उछाल देखा गया। 2017 में कांग्रेस (33.49 फीसदी) , बसपा (7.04) और निर्दलीय (10.38 फीसदी) के वोटों में पहले की तुलना में कमी आई। साफ जाहिर होता है कि 2017 में कांग्रेस, बसपा, उक्रांद और निर्दलीय को मिलने वालों वोटों का कुछ प्रतिशत भाजपा के खाते में गया था।

2017 में भाजपा के वोटों में अत्यधिक वृद्धि की प्रमुख वजह

  • पूर्व राज्य सरकार के प्रति जनता में नाराजगी, जैसा कि हर चुनाव में होता रहा है
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता
  • 2013 की आपदा में राहत कार्यों को लेकर लगे आरोप
  • कांग्रेस के विधायकों का बगावत करके भाजपा में शामिल होना

हम शर्मिंदा हैंः उत्तराखंड की राजनीति में इस नये शब्द को लेकर

2022 में भाजपा के सामने चुनौतियां

  • 2017 में स्थापित किए गए 46.51 फीसदी वोटों के माइल स्टोन से आगे निकलना
  • सरकार से नाराज मतदाताओं को अपने पक्ष में रोकना
  • किसानों की नाराजगी
  • पूर्ण बहुमत के बाद भी राज्य में मुख्यमंत्रियों को बदलने से विपक्ष को मिला बड़ा मुद्दा
  • पहले कांग्रेस और अब पूरी ताकत के साथ चुनाव मैदान में खड़ी AAP से भी वोटों को बचाने की चुनौती

2022 में कांग्रेस के सामने चुनौतियां

  • 2017 के चुनाव में भाजपा द्वारा स्थापित 46.51 फीसदी से अधिक वोटों के माइल स्टोन को पार करने के लिए अपने 2017 की तुलना में लगभग 15 फीसदी से अधिक वोटों का बड़ा उछाल लाना
  • सरकार से नाराज होने वाले मतदाताओं को अपने पक्ष में करना
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मतदान
  • चुनाव मैदान में तैयार AAP से वोटों को बचाने की चुनौती

2022 में AAP के सामने चुनौतियां

  • AAP को अपना वोट प्रतिशत 46 फीसदी से अधिक करना होगा
  • सरकार से नाराज होने वाले मतदाताओं को अपने पक्ष में करना
  • राज्य की हर विधानसभा में वार्ड स्तर तक पहुंच बनाना
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मतदान

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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