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Web Story: हल्दी को क्यों कहते हैं ‘भारतीय केसर’

हल्दी, जिसे वैज्ञानिक रूप से करकुमा लोंगा के नाम से जाना जाता है, का एक लंबा और समृद्ध इतिहास है जो हजारों वर्षों तक फैला है।

हल्दी मसाला दक्षिण एशिया, विशेष रूप से भारत का मूल निवासी है, और यह इस क्षेत्र की संस्कृति और भोजन का एक अभिन्न अंग रहा है।

हल्दी का उपयोग भारत में वैदिक संस्कृति में 4,000 साल से अधिक पुराना है, जहां इसका उपयोग भोजन और औषधीय दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाता था।

हल्दी ने पारंपरिक आयुर्वेदिक चिकित्सा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका उपयोग कई प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता था, और इसके सूजन-रोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों ने इसे आयुर्वेदिक उपचार पद्धतियों में एक आवश्यक जड़ी-बूटी बना दिया।

हल्दी का व्यापक रूप से भारतीय व्यंजनों में मसाले के रूप में उपयोग किया जाता था, जो करी, चावल सहित विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में इसका जीवंत रंग और स्वाद देता था।

सांस्कृतिक महत्व: भारत में हल्दी का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी है। इसका उपयोग अनुष्ठानों और समारोहों में किया जाता था और इसका पीला रंग शुद्धता और उर्वरता का प्रतीक है।

व्यापार और विस्तार: समय के साथ, हल्दी की लोकप्रियता भारत से बाहर भी फैल गई। इसे व्यापार मार्गों के माध्यम से दक्षिण पूर्व एशिया, चीन और मध्य पूर्व में लाया गया, जो विभिन्न क्षेत्रीय व्यंजनों में एक आवश्यक मसाला बन गया।

हल्दी ने मध्ययुगीन काल के दौरान यूरोप में अपना रास्ता बनाया, जहां इसका उपयोग मुख्य रूप से रंग भरने वाले एजेंट और औषधीय जड़ी बूटी के रूप में किया जाता था। इसके चमकीले रंग के कारण इसे “भारतीय केसर” के नाम से जाना जाता था।

20वीं और 21वीं सदी में आधुनिक वैज्ञानिक शोध ने हल्दी के कई स्वास्थ्य लाभों की पुष्टि की है। हल्दी में पाया जाने वाला एक यौगिक करक्यूमिन, इसके संभावित सूजनरोधी, एंटीऑक्सीडेंट और चिकित्सीय गुणों के लिए बड़े पैमाने पर अध्ययन किया गया है।

भारत दुनिया में हल्दी का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। हल्दी की खेती आज दुनिया के कई हिस्सों में की जाती है।

वैश्विक व्यंजन: हल्दी की लोकप्रियता विश्व स्तर पर बढ़ी है, और अब इसका उपयोग एशियाई से लेकर मध्य पूर्वी से लेकर पश्चिमी व्यंजनों तक, कई अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों में किया जाता है।

हल्दी की खुराक और करक्यूमिन युक्त उत्पादों ने अपने संभावित लाभों के कारण स्वास्थ्य पूरक के रूप में लोकप्रियता हासिल की है, खासकर सूजन और कुछ पुरानी स्थितियों के प्रबंधन में।

हल्दी के पाक और औषधीय उपयोग के लंबे इतिहास ने, इसके सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व के साथ, एक मूल्यवान और पोषित मसाले के रूप में अपनी जगह पक्की कर ली है। इसके स्वास्थ्य लाभों और रसोई में बहुमुखी उपयोग ने इसे दुनिया के कई हिस्सों में प्रमुख बना दिया है।

Rajesh Pandey

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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