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टाइगर जंगल पर राज करने के लिए उठाते हैं यह खतरनाक कदम!

बहुत बूढ़े टाइगर्स अक्सर अपने युवा साथी द्वारा मार डाले जाते हैं

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

शेर (Lion) जंगल का राजा होता है और अपने एरिया में टाइगर (Tiger) यानी बाघ। बहुत शानदार दिखने वाली यह बिल्ली प्रजाति जंगल पर राज करने के लिए जन्म लेती है। ब्रिटिश प्रकृतिवादी चार्ल्स डार्विन की “Survival of the fittest” थ्योरी के अनुसार, जो जीव अपने पर्यावरण के लिए बेहतर रूप से अनुकूलित हैं, वो जीवित रहने और सफलतापूर्वक प्रजनन के लिए सबसे उपयुक्त हैं। यह थ्योरी डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से विकसित हुई है। बाघ के जीवन पर बात करें तो वो अपने बच्चों को जंगल के माहौल के अनुकूल देखना चाहते हैं। इसके लिए उनको कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं, जिनके बारे में सुनकर ही हम सहम सकते हैं।

विश्व बाघ दिवस (World Tiger Day) पर रेडियो ऋषिकेश के साथ एक साक्षात्कार में बाघ विशेषज्ञ राजेंद्र प्रसाद नौटियाल, जिनके पास वर्तमान में वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो (Wild life crime control bureau) के गढ़वाल मंडल प्रमुख की जिम्मेदारी है, बताते हैं, टाइगर फैमिली (Tiger family) में रहते हैं। बाघ, जो फैमिली हेड होता है, वो बहुत Possessive यानी अधिकार जमाने वाला होता है। बाघ और बाघिन एक साथ मिलकर शिकार करना पसंद करते हैं।

पर, इसमें एक बहुत विचित्र बात देखी गई है, यदि टाइगर परिवार में कोई बीमार या कमजोर बच्चा जन्म लेता है, तो टाइगर परिवार उसको जीवित नहीं छोड़ता। इसका संदेश यह है कि प्रकृति में रहना है तो मजबूत होकर ही रहना होगा।

एक दूसरे के लिए रास्ता छोड़ देते हैं हाथी और बाघ

हाथी और टाइगर जब भी कभी आमने-सामने आ जाते हैं, तो एक दूसरे के लिए रास्ता छोड़ देते हैं। जंगल के ये दो बड़े जानवर आपस में अक्सर नहीं भिड़ते। हालांकि, जब कभी जंगल में टाइगर की संख्या बढ़ जाती है, उनके लिए भोजन की कमी हो जाती है, तो वो हाथियों के छोटे बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं। आमतौर पर, हाथियों की शेरों या बाघों से लड़ाई कम ही देखने को मिली है।

कमजोर और बूढ़े शेर- बाघ

शेर या बाघ जब बूढ़ा हो जाता है, उसमें पहले की तरह शिकार करने की ताकत नहीं होती, उस समय वो किन हालात से होकर गुजरता है, इस पर श्री नौटियाल बताते हैं, जंगल में रहने वाले टाइगर अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार, लगभग 14 या 15 साल या कुछ और वर्ष तक जीवित रहते हैं, पर जो टाइगर चिड़ियाघरों (Zoo) में होते हैं, वो लगभग 25 साल तक जीवित रह जाते हैं। उनका वजन भी बहुत ज्यादा होता है।

जंगल में वो ही जानवर ज्यादा समय तक जिंदा रह पाएगा, जो मजबूत होगा, जो टाइगर्स बहुत बूढ़े हो जाते हैं, आमतौर पर देखा गया है कि वो जंगल में ही दूर किसी गुफा में जाते हैं और वहीं दम तोड़ देते हैं या फिर वो अपने युवा साथी द्वारा मार डाले जाते हैं। ये युवा टाइगर वो होते हैं, जो उस इलाके में अपना नया  Domain तैयार करते हैं। हमें जंगलों में टाइगर के जो शव मिलते हैं, उनमें से 90 फीसदी मामलों में यही होता है कि इनको किसी जवान टाइगर ने खत्म किया था।

बाघिन की तलाश में चला था बड़ा अभियान

एक बाघिन की तलाश से जुड़ा किस्सा साझा करते हुए फॉरेस्ट अफसर श्री नौटियाल बताते हैं, राजाजी टाइगर रिजर्व की एक बाघिन, काफी दिन तक नजर नहीं आई, तो उसको सर्च करने के लिए कई-कई दिन तक जंगल में कंदराओं में, मचानों पर बिताए, पर वो नहीं मिली। माना गया कि वो किसी खड्ड में रह गई है वृद्धावस्था के कारण, क्योंकि वो 17-18 वर्ष की हो गई थी। उसकी खोज तीन महीने तक चली। उसको तलाश करने के अभियान में 500 लोग तैनात किए गए थे। वो हमारे लिए बहुत चैलेंजिंग और कठोर दौर रहा है।

वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो (Wild life crime control bureau) के गढ़वाल मंडल प्रमुख राजेंद्र प्रसाद नौटियाल एक साक्षात्कार में बाघों के बारे में खास जानकारियां दे रहे हैं। फोटो- रेडियो ऋषिकेश से साभार

बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए उठाए थे यह कदम

बाघ विशेषज्ञ राजेंद्र प्रसाद नौटियाल बताते हैं, नवंबर 2013 में उनकी राजाजी टाइगर रिजर्व की गोहरी रेंज में बतौर रेंजर नियुक्ति हुई थी। उस समय एक टाइगर की जहर देकर रिवेंज कीलिंग की घटना हुई थी। यह मामला सुर्खियों में था। अपराधी को गिरफ्तार कर लिया गया। उस इलाके में पोचर्स के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की गईं। हमने बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए वन्य जीवों के तस्करों पर सख्ती से लगाम कसीं। वनों में घुसने के उनके सभी रास्ते बंद कर दिए गए।

वहीं, लैंटाना की झाड़ियां उखाड़कर टाइगर्स के लिए प्राकृतिक प्रवास में बेहतर सुधार किया गया। घास के मैदान तैयार किए गए, ताकि टाइगर आसानी से शिकार कर पाएं। घास के मैदानों में हिरण और अन्य पशु आते हैं, जो टाइगर की भोजन श्रृंख्ला का एक अहम हिस्सा हैं। इसका सुखद परिणाम यह रहा कि, जहां 2013-14 में राजाजी टाइगर रिजर्व में 13-14 टाइगर होते थे, वहीं 2018 तक 36 टाइगर हो गए। चार वर्ष में लगभग तीन गुना संख्या बढ़ी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब इन आंकड़ों को जारी किया, तब उत्तराखंड की विशेष तारीफ की गई।

कम से कम 30 किमी. रोजाना चलता है टाइगर

फॉरेस्ट अफसर श्री नौटियाल बताते हैं, राजाजी टाइगर रिजर्व में कालागढ़ होते हुए कॉर्बेट से भी टाइगर आ जाते हैं और वापस चले जाते हैं। टाइगर अपने प्राकृतावास में कम से कम रोजाना 30 किमी. तक चलता है। ये तराई से नेपाल में भी पहुंच जाते हैं। हाल ही में, पन्ना टाइगर रिजर्व का भ्रमण किया था, वहां बाघों के 1700 किमी. दूर तक चले जाने की जानकारी मिली। जब तक स्थाई ठिकाना नहीं मिलता, ये चलते रहते हैं।

बाघ क्यों है महत्वपूर्ण

श्री नौटियाल बताते हैं, बाघ जैवविविधता को संरक्षित करता है। पानी, हवा को शुद्ध करने में इसका योगदान है। जहां तक अर्थशास्त्र की बात है तो कार्बेट रिजर्व में ही 175 बाघ हैं, जिनको देखने के लिए बड़ी संख्या में टूरिस्ट वाइल्ड लाइफ सफारी के लिए आते हैं। वहां करीब 400 से अधिक रिजॉर्ट हैं, जिनमें 20 हजार से अधिक लोग वाइल्फ लाइफ टूरिज्म से सीधे तौर पर जुड़े हैं। वाइल्ड लाइफ टूरिज्म (Wild life tourism) से दूर-दूर तक के रोजगार हासिल कर रहे हैं। गांवों की आर्थिक प्रगति हो रही है। देश में विभिन्न स्थानों में वाइल्ड लाइफ टूरिज्म बढ़ा है।

मानव वन्य जीव संघर्ष

एक टाइगर के लिए 10 गुणा 10 किमी. यानी 90 से 100 वर्ग किमी. का एरिया चाहिए। टाइगर रिजर्व में 175 बाघ हैं और इसका एरिया लगभग साढ़े पांच सौ वर्ग किमी. का है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो कार्बेट में बाघ अपनी अधिकतम सीमा को पार कर चुके हैं। इसलिए बाघों का आसपास के इलाकों में चले जाना देखा जा रहा है। इससे रोड किलिंग और मानव-वन्य जीव संघर्ष  (Human vs Animal Conflict) भी हो रहा है।

जब हाथी ने पेड़ हटाकर रास्ता खोला

फॉरेस्ट अफसर श्री नौटियाल बताते हैं, हाथी बहुत समझदार जानवर है। मैं पौड़ी से राजाजी की कुनाऊं रेंज वापस आ रहा था। नवंबर का महीना था, हल्की बारिश हो रही थी, रात के नौ बज चुके थे। लक्ष्मणझूला वाले रास्ते के बीचोंबीच एक पेड़ गिरा था। गाड़ी की रोशनी में, मैंने देखा कि पास में ही एक हाथी खड़ा था। ड्राइवर ने गाड़ी की लाइट्स बंद कर दीं और करीब सौ मीटर बैक करके गाड़ी खड़ी कर दी। ड्राइवर ज्यादा अनुभवी था। उन्होंने मुझसे कहा, वायरलैस करके स्टाफ की मदद से इस पेड़ को हटा देते हैं।

पर, आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि पांच मिनट भी नहीं हुए होंगे, उस हाथी ने पेड़ को रास्ते से हटा दिया और दूसरी जगह पर जाकर खड़ा हो गया। हमें ऐसा लगा कि हाथी ने हमारे जाने के लिए किसी द्वारपाल की तरह गेट खोल दिया हो। इससे साबित होता है कि हाथी कितना बुद्धिमान जानवर है।

वन अधिकारी श्री नौटियाल कहते हैं, इस पूरे घटनाक्रम में एक बात यह भी है कि हमने गाड़ी को लाइट्स बंद करके लगभग सौ मीटर पीछे करके हाथी का सम्मान किया था, इस पर हाथी ने भी हमारा सम्मान करते हुए पेड़ को रास्ते से हटाया और दूसरी जगह जाकर खड़ा हो गया।

फॉरेस्ट अफसर श्री नौटियाल का कहना है, पर्यटक शांत होकर जंगल सफारी करें, जंगल के जीवों को देखने का आनंद लें। कभी भी जंगली जानवर को देखकर हॉर्न न बजाएं, ज्यादा उत्तेजित न हों। इस दौरान जानवरों को देखकर शोर न मचाएं। शोर करने से जानवर Irritate हो जाते हैं।

हाथी की इगो का दायरा 30 मीटर

वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट श्री नौटियाल बताते हैं, हाथी की इगो का दायरा लगभग 30 मीटर है। यदि राह चलते हाथी मिल जाता है, तो शांत भाव से अपनी गाड़ी या खुद को हाथी के इगो वाले दायरे से बाहर कर लीजिए। कम से कम 100 मीटर दूर कर लीजिए। रात का समय है तो गाड़ी की लाइटें बंद कर दीजिए। हॉर्न मत बजाइए। वो आपको कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

Rajesh Pandey

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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