Simran Agarwal Ganga Conservation Training: राजेश पांडेय, देहरादून, 05 मई, 2026ः गंगा नदी की गहराई में बसने वाले जलीय जीवों और उनके पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना एक बड़ी चुनौती है। रेडियो केदार ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की प्रोजेक्ट एसोसिएट और संरक्षण विशेषज्ञ सिमरन अग्रवाल से इसी विषय पर वार्ता की। 5 वर्षों से ‘नमामि गंगे’ परियोजना से जुड़ीं सिमरन की यात्रा किसी लैब के शांत वातावरण से शुरू हुई थी, जहां वे सूक्ष्म स्तर पर जेनेटिक्स और ‘स्ट्राइप्ड हायना’ जैसे जीवों का अध्ययन कर रही थीं। वर्तमान में गंगा के संरक्षण अभियान से जुड़ी हैं और समुदायों के बीच जाकर उनको नदियों और उनमें पलने वाले जीवों के संरक्षण के लिए आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करती हैं।
Simran Agarwal Ganga Conservation Training: सिमरन अग्रवाल ने कैमिस्ट्री, बॉटनी एंड जूलॉजी में एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन की। इसके बाद, बायोटेकनोलॉजी में ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से मास्टर्स किया। टाइगर प्रोजेक्ट में डेजर्टेशन (Dissertation) किया था, स्ट्राइप्ड हायना (Striped Hyenas) पर। उनका शुरुआती करियर बायोटेक्नोलॉजी और जेनेटिक्स के लैब वर्क तक सीमित था। टाइगर प्रोजेक्ट में ‘स्ट्राइप्ड हायना’ पर शोध करने के बाद नमामि गंगे प्रोजेक्ट से जुड़ीं। इस प्रोजेक्ट में कार्य करना बिल्कुल अलग है।
Simran Agarwal Ganga Conservation Training: उनका कहना है, लैब के एसी कमरों में काम करना आसान है, लेकिन फील्ड पर जाकर लोगों की समस्याओं को समझना और उन्हें संरक्षण के लिए तैयार करना एक चुनौतीपूर्ण अनुभव रहा, जिसने उनके आत्मविश्वास को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। अपनी पहली ट्रेनिंग के लिए हैदरपुर वेटलैंड बिजनौर जाते समय रोडवेज की बसों का सफर और संसाधनों को अकेले जुटाने का संघर्ष उनके लिए एक बड़ी सीख लेकर आया। इसी संघर्ष ने उन्हें सिखाया कि संरक्षण केवल विज्ञान नहीं है, बल्कि यह लोगों के व्यवहार को बदलने की एक कला है।
कहती हैं, गंगा संरक्षण अभियान के केंद्र में एक अनूठी प्रशिक्षण पद्धति है, जिसे ‘किर्कपैट्रिक मॉडल’ कहा जाता है। यह मॉडल केवल यह नहीं देखता कि किसी ने क्या सीखा, बल्कि यह इस पर नजर रखता है कि उस सीख का जमीनी स्तर पर क्या परिणाम निकला। इसी मॉडल के तहत गंगा प्रहरियों, पुलिस, वन विभाग के कार्मिकों, छात्रों और स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित किया जाता है।
सिमरन बताती हैं कि संरक्षण की इस प्रक्रिया में पांच मुख्य मॉड्यूल काम करते हैं, जिनमें जलीय जीवों की निगरानी से लेकर संकट में फंसे जीवों के बचाव (रेस्क्यू) और उनके आवास के प्रबंधन तक की बारीकियां सिखाई जाती हैं। आज इस प्रशिक्षण का असर यह है कि स्थानीय लोग खुद आगे आकर गंगा डॉल्फिन और अन्य जीवों की रक्षा के लिए ‘क्विक रिस्पांस टीम’ के रूप में कार्य कर रहे हैं। WII द्वारा दी जाने वाली ‘कंज़र्वेशन ट्रेनिंग’ केवल सैद्धांतिक नहीं है। इसमें पांच मुख्य स्तंभों बायोडायवर्सिटी मॉनिटरिंग, रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन (जलीय जीवों का बचाव), हैबिटाट एवं वेटलैंड मैनेजमेंट, कम्युनिटी इंगेजमेंट, कंजर्वेशन एजुकेशन को शामिल किया गया है।
एक सवाल पर उनका कहना है, यदि हम कौशल विकास (Skill Development) की बात करें, तो हमारा प्रशिक्षण कार्यक्रम पूरी तरह से Interactive रहता है। इसमें विशेषज्ञों के व्याख्यान आयोजित किए जाते हैं और प्रतिभागियों को फील्ड विजिट पर भी ले जाया जाता है। इसे उदाहरणों के माध्यम से समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए, पुलिस अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए हमने भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) में एक ‘वाइल्डलाइफ मॉकअप सीन’ (Wildlife Mockup Scene) तैयार किया था। यहां अधिकारियों को वास्तविक वन्यजीव अपराध स्थल की तरह जांच करनी होती है। यह अभ्यास उन्हें जमीनी स्तर पर अवैध शिकार (Poaching) और वन्यजीवों के अवैध व्यापार जैसे गंभीर मामलों को सुलझाने का प्रशिक्षण देता है। इस मॉकअप सीन के माध्यम से वे साक्ष्यों को ढूंढना और उनका विश्लेषण करना सीखते हैं। साथ ही, उन्हें ‘स्पीशीज आइडेंटिफिकेशन’ (प्रजाति पहचान) का प्रशिक्षण भी दिया जाता है, ताकि यह पहचान सकें कि अपराध किस जीव के खिलाफ हुआ है।
“यदि हम पशु चिकित्सकों (Veterinarians) की बात करें, तो उन्हें ‘स्नेक हैंडलिंग’ (सांपों को सुरक्षित पकड़ना) का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रशिक्षण के लिए हम उन्हें हिमाचल प्रदेश स्थित ‘रेणुका जी जू’ लेकर गए थे। इसके अतिरिक्त, पशु चिकित्सकों को मगरमच्छों (Crocodiles) के रेस्क्यू और उन्हें सुरक्षित रूप से पकड़ने (Capture) की तकनीकों का अभ्यास कराने के लिए गोरखपुर जू ले जाया गया। इसी प्रकार, हमने NCC और NSS कैडेट्स के लिए भी विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। उन्हें ‘फॉरेस्ट फायर मैनेजमेंट’ में प्रशिक्षित किया गया है, ताकि यदि वे ऐसी किसी आपात स्थिति में हों, तो वे स्थिति को प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर सकें। इन कार्यक्रमों के माध्यम से हम विभिन्न वर्गों को उनके कार्यक्षेत्र के अनुसार महत्वपूर्ण स्किल ट्रेनिंग प्रदान करते हैं“, सिमरन अग्रवाल बताती हैं।
प्रोजेक्ट एसोसिएट सिमरन अग्रवाल के पास अनुभवों का एक अनमोल खजाना है, जिसमें बच्चों की मासूमियत और उनके जज्बे की कई कहानियां दर्ज हैं। कफनौल (उत्तरकाशी) के किस्से को याद करती हैं। कफनौल में भारी बारिश के कारण स्कूल बंद हो गया और टीम को लगा कि ट्रेनिंग रद्द करनी पड़ेगी। लेकिन बाल गंगा प्रहरियों के उत्साह ने सबको चौंका दिया। वे बच्चे अपनी स्कूल यूनिफॉर्म पहनकर खुद आगे आए और कहा, “दीदी, हम तो ट्रेनिंग के लिए आएंगे, चाहे स्कूल बंद हो”। 15 मिनट के भीतर गांव के बच्चे अपने साथियों को लेकर वहां एकत्र हो गए।
स्किल डेवलपमेंट से जुड़े एक सवाल पर कंजरवेशन ट्रेनिंग एक्सपर्ट सिमरन अग्रवाल बताती हैं, “प्रशिक्षण के जरिए केवल गंगा संरक्षण पर ही काम नहीं किया जा रहा, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के रास्ते भी खुल रहे हैं। ‘टोटो टर्टल मोटो’ जैसे इंटरेक्टिव गेम्स और नेचर ट्रेल्स के माध्यम से बच्चों को जलीय जीवों के भोजन और व्यवहार की जानकारी दी जाती है। इससे बच्चे भविष्य में वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट या लोकल गाइड्स के रूप में अपनी आजीविका से जुड़ सकते हैं। साथ ही, मछुआरों और नाविकों (गंगा प्रहरियों) की नावों पर डॉल्फिन और ऑटर के चित्र बनवाकर उन्हें पर्यटकों को जागरूक करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।”
सिमरन अग्रवाल ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि संरक्षण केवल सरकार या किसी संस्थान की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति का निजी प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा, युवा खुद फील्ड पर निकलें और प्रकृति के साथ जुड़कर इस जिम्मेदारी को महसूस करें।




