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रवि सर, आपका लगाया हुआ लीची का पेड़ अभी भी मेरे बगीचे में है

  • गजेंद्र रमोला की फेसबुक वॉल से
ॐ शांति…

रवि कालरा जी का इस तरह इस दुनिया को छोड़कर चले जाना समाज को वास्तव में बहुत बड़ी हानि हुई है। लगभग 800 बेसहारा लोगों के सहारा, इस तरह से छोड़कर चले गए। आपने 2008 में दी अर्थ सेवियर्स फाउंडेशन(The Earth Saviours Foundation) की शुरुआत की और बीमारियों से ग्रस्त लोगों को गुरुकुल में लाकर उनके उपचार की व्यवस्था की।

आपकी सेवाओं का स्वयं मैं प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ। देहरादून से गुरुकुल में आपके पास आने का कई बार मौका मिलता था। आपके घर पर भी ठहरने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रात को दो बजे भी मैंने आपको उन बेसहारा लोगों की सेवा करते स्वयं देखा है, जो यह दर्शाता था कि आप एक सच्चे कर्मयोगी थे।

फाइल फोटो- गजेंद्र रमोला की फेसबुक वॉल से
2017 में रोहित नौटियाल, पद्मश्री कल्याण सिंह रावत जी, मेरे भाई नरेंद्र रमोला गुरुकुल गए और डू नॉट हॉंक (Do not honk) प्रोगाम अटेंड किया। आपने जो सम्मान दिया उसे भूलना बहुत ही कठिन है। जब भी देहरादून से गुरुकुल में आता था, तो आप हमेशा दोपहर का खाना मेरे साथ ही खाते, आपने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया।
फाइल फोटो- गजेंद्र रमोला की फेसबुक वॉल से
रवि कालरा जी सन 2017 में मेरे घर पर आये, लीची का एक पेड़ भी लगाया। मेरी मधुमक्खी की पेटी से निकला हुआ शहद जब आपने चखा तो आपके शब्द थे “गजेंद्र जी जिंदगी में पहली बार असली शहद खाया”। तभी से जब भी शहद ख़त्म हो जाता, आप कॉल किया करते थे।
फाइल फोटो- गजेंद्र रमोला की फेसबुक वॉल से
यह आपके साथ मेरा कुछ अनुभव था, जो इस पोस्ट के माध्यम से शेयर कर रहा हूँ। रवि सर आपका लगाया हुआ लीची का पेड़ अभी भी मेरे बगीचे में सुरक्षित बढ़ रहा है, जो आजीवन आपकी याद दिलाता रहेगा। इस पेड़ की पत्तियां , टहनियाँ , छाया आपके आशार्वाद के रूप में बनी रहेंगी। परमात्मा आपको अपने श्री चरणों में स्थान दें।
फाइल फोटो- गजेंद्र रमोला की फेसबुक वॉल से
द अर्थ सेवियर्स फाउंडेशन के संस्थापक एवं बेसहारा लोगों के भगवान माने जाने वाले कर्मयोगी रवि कालरा का रविवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। रवि कालरा लंबे समय से समाजसेवा के कार्यों से जुड़े थे।
  • सॉफ्ट इंजीनियर गजेंद्र रमोला की संस्था नियो विजन देहरादून में बच्चों को निशुल्क शिक्षा देती है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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