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उत्तराखंड में आय बढ़ाने के लिए एक ही खेत में गन्ना और आलू की खेती कर रहे किसान

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव ब्लॉग
”धान की कटाई के बाद हमारे खेत खाली हो गए थे। हमने अक्तूबर में गन्ना बो दिया, जबकि यहां गन्ना फरवरी में बोया जाता है। इस तरह समय और खेत दोनों का सदुपयोग हुआ और गन्ने वाले खेत में ही आलू लगा दिया। करीब तीन माह की आलू की फसल भी लगभग तैयार होने वाली है।
आलू उखाड़ने के बाद इसी खेत में टमाटर, प्याज भी लगा सकते हैं। इस तरह एक ही खेत में गन्ने के साथ दूसरी फसल भी ले सकते हैं। गन्ना इस तरह बोया गया है कि उसमें दूसरी फसल भी लगा सकें। दूरी पर बोने से गन्ने की पैदावार अच्छी होती है। गन्ना मोटा होता है और वहीं फैक्ट्री चलने के समय तक हमें गन्ने की बेहतर उपज मिल जाएगी।”
देहरादून जिला के झबरावाला गांव में कास्तकार रणजोध सिंह ने गन्ने के बाद खेत में आलू बोया। अभी डेढ़ माह में हुआ। 90 दिन में आलू की बेहतर फसल मिलने की संभावना है। फोटो- सार्थक पांडेय
देहरादून जिला के ब्लाक डोईवाला स्थित झबरावाला गांव के किसान रणजोध सिंह अपने खेत दिखाते हुए कहते हैं, खेत में एक बार में दो-दो फसलें लेना आवश्यकता बन गया है। हमारा देश खेती पर निर्भर है। आबादी बढ़ने के साथ-साथ हमें डबल खेती की जरूरत बढ़ रही है, ताकि देश में अन्न की कमी न हो।

उन्होंने बताया, गन्ने की जो फसल बोई है, उसको अक्तूबर सोइंग कहते हैं। वैसे यहां अधिकतर गन्ना फरवरी में बोया जाता है। हमने जमीन का सदुपयोग करने के लिए अक्तबूर में गन्ना बोया। इसके साथ आलू, राजमा, फ्रेंचबीन, मटर, गोभी, तोड़िया, प्याज, धनिया, टमाटर बो सकते हैं। करीब डेढ़ माह बाद इसमें प्याज या टमाटर लगाने का विचार है।
देहरादून के झबरावाला गांव में किसान रणजोध सिंह गन्ने के साथ आलू की खेती कर रहे हैं। अभी डेढ़ माह ही आलू का अच्छा उत्पादन होता दिख रहा है। फोटो- डुगडुगी
खेत में आलू का एक पौधा दिखाते हुए न्यूज लाइव को बताते हैं कि डेढ़ माह में ही पैदावार अच्छी हो गई। अभी इसे डेढ़ माह ही हुआ है, लगभग 90 दिन में इसकी बहुत अच्छी फसल मिलने की उम्मीद है। गन्ने के साथ, दो और फसलें ले सकते हैं। दोनों बार आलू भी बो सकते हैं या कोई अन्य फसल लगा सकते हैं।
वो कहते हैं, एक साथ दो फसलें बोने का फायदा यह है कि आपके खेत का उपयोग पहले से ज्यादा हो रहा है। गन्ने की दो पंक्तियों के बीच खाली स्थान का भरपूर उपयोग हो रहा है। दूसरा, पहले हम आलू के लिए अलग से खेत जोतते थे। डीजल और श्रम महंगा हो रहा है। जुताई की लागत बच गई, वहीं एक खेती का श्रम भी बच गया। दूसरा, आलू के साथ एक ही बार में गन्ने की निराई गुड़ाई भी हो जाएगी। इससे गन्ने को ज्यादा देखरेख मिल रही है। खाद भी पहले से कम इस्तेमाल होगी।

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54 वर्षीय कास्तकार रणजोध सिंह के अनुसार, उनके पास लगभग 12 बीघा खेती है। इसमें से तीन खेत आर्गेनिक हैं। इन तीन खेतों में नहर की बजाय ट्यूबवैल से सिंचाई करते हैं। खाद के लिए वर्मी कम्पोस्ट और गोबर का इस्तेमाल करते हैं। जिस खेत में गन्ना और आलू एक साथ लगा है, वो भी आर्गेनिक खेत है।
गोबर का घोल गैस प्लांट में डालते हैं और फिर यह वर्मी पिट में चला जाता है। वर्मी पिट में मौजूद केचुएं गोबर को डिकम्पाेज करके खाद बनाते हैं, जो खेतों के लिए बहुत अच्छी होती है। कई वर्षों से उन्होंने तीन खेतों में रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया।
हालांकि वो आर्गेनिक खेती में बहुत सारी दिक्कतों का जिक्र करते हैं, पर इससे पहले हम इन किसान से खेती में और प्रयोगों पर बात करते हैं।
देहरादून के झबरावाला में सरसो भी खूब दिख रही है। फोटो- सार्थक पांडेय
उन्होंने लगभग डेढ़ बीघा में गन्ना और आलू की मल्टीपल क्रापिंग (Multiple cropping) की है। बताते हैं, किसानों को फसल चक्र (Crop rotation) का पालन करना होगा, इससे जमीन में कीड़ा नहीं लगता और खरपतवार अपने आप नष्ट हो जाते हैं।
फसल चक्र के बारे में सामान्य शब्दों में बताते हैं, किसी भी खेत में बदल-बदल कर फसल लगाना। जैसे कोई फसल गहरी जड़ की होती है और कोई ऊपरी जड़ की।

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गहरी जड़ वाली फसलों की जड़ें मिट्टी में अधिक गहराई पर जाकर पोषक तत्व प्राप्त करती हैं। ऐसे में ऊपरी परत में मौजूद अधिकांश पोषक तत्व पहले की ही तरह मौजूद रहते हैं। यदि अगले मौसम में भी गहरी जड़ वाली फसल को बोया गया तो मिट्टी में गहराई पर पोषक तत्वों की कमी के साथ-साथ फसल भी अच्छी नहीं हो पाती। इसलिए एक बार गहराई तक जड़ वाली और उसके बाद ऊपरी परत में जड़ वाली फसल को बोना चाहिए। इस तरह मिट्टी में विभिन्न स्तरों पर मौजूद पोषक तत्वों की समानता बनी रहती है।
देहरादून के डोईवाला ब्लाक स्थित झबरावाला गांव में गन्ने के साथ आलू की खेती। करीब डेढ़ माह बाद आलू उखाड़कर एक और फसल बोई जाएगी। फोटो- डुगडुगी
फसल चक्र के लाभ के बारे में बताते हैं- इससे मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है और इसके गुणों में सुधार होता है। भूमि में जीवांश पदार्थ की मात्रा बढ़ती है। भूमि में पनपने वाले रोगों का प्रभाव कम होता है। फसल चक्र अपनाने से कीटों व खरपतवारों पर भी नियंत्रण होता है।
रणजोध बताते हैं, पहले रासायनिक खाद नहीं होती थी, हमारे बुजुर्ग खेतों में सनी, ढेंचा, बरसीम, दालें, तिलहन बोते थे। फसल लेने के बाद इसको खेतों में जोत देते थे। यह हरी खाद का काम करती थी। अब समस्या यह हो गई कि खेती कम है और खाने वाले ज्यादा।
डोईवाला के झबरावाला गांव में गन्ने की पूर्व में बोई फसल काटे जाने के लिए तैयार खड़ी है। फोटो- डुगडुगी
डिमांड बढ़ गई और हम चाह रहे हैं कि इन्हीं कम होते खेतों से हमें धान भी मिल जाए, गेहूं भी मिल जाए और दालें भी। पर, खेतों को ज्यादा समय नहीं दे पा रहे हैं, इसलिए ज्यादा से ज्यादा उगाने के लिए रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है। इससे हमारी खेती खराब हो रही है। खेती किस तरफ जा रही है, इस पर ध्यान नहीं है। इसलिए हमें फसल चक्र को अपनाना जरूरी है।
देहरादून जिला के झबरावाला गांव में कास्तकार रणजोध सिंह ने हमारे साथ फसल चक्र और मल्टी क्रापिंग के बारे में विस्तार से चर्चा की। फोटो- सार्थक पांडेय
एक बार खेत में गन्ना बो दिया और उसके बाद गेहूं लगा दिया। गेहूं में बार-बार पानी लगाने से उसमें गुल्ली डंडा घास उग जाती है। कुछ खरपतवार तो गेहूं की तरह ही दिखते हैं।  इनमें से कुछ को पहचानना मुश्किल होता है, जो बड़े होने के बाद समझ में आते हैं। इन खरपतवारों को खत्म करने के लिए गेहूं में दवा का छिड़काव करते हैं, जिसका असर आखिर में हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। इससे बचने के लिए फसल चक्र  (Fasal Chakra) को अपनाना बहुत जरूरी है।
कास्तकार रणजोध सिंह फिर समझाते हैं- उथली जड़ वाली फसलों के बाद गहरी जड़ वाली फसलों को लगाना चाहिए। अधिक खाद की आवश्यकता वाली फसलों के बाद कम खाद की आवश्यकता वाली फसलें लगानी चाहिए।अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों के बाद कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें लगाएं। आपने खेत में फलियों वाली फसल लगाई है, तो उसके बाद उन फसलों को लगाएं, जिनमें फलियां न हों।
देहरादून के झबरावाला गांव में किसान रणजोध सिंह के खेत के पास लगा गोबर गैस प्लांट। गोबर गैस के साथ खाद भी मिल रही है। फोटो- डुगडुगी
उन्होंने न्यूज लाइव को बताया, क्यारियों में सब्जियां भी उगा रहे हैं, जिनमें लहसुन, मूली, धनिया, मैथी, बैंगन, फलियां, सेम की फलियां उगाई हैं। वर्मी कम्पोस्ट से खेती अच्छी हो रही है। उनकी क्यारी में सेम की एक बेल काफी दूरी तक फैल गई है और फलियों से लदी है। यह पूरी तरह आर्गेनिक है, पर इसकी पत्तियों में कीट लग गया है। इसमें रसायन का छिड़काव नहीं कर सकते। किसी जैविक उपाय की जानकारी नहीं है।
देहरादून जिला के झबरावाला में किसान बलवीर सिंह, जिन्होंने अदरक वाले खेत में ही पांच फसलें ली हैं। बलवीर सिंह जैविक खेती करते हैं। फोटो- डुगडुगी
झबरावाला में ही करीब 54 साल के किसान बलवीर सिंह भी एक ही खेत में एक बार में कई फसल उगा रहे हैं। उन्होंने फरवरी- मार्च में अदरक बोई थी। इसके साथ मूली, भिंडी की रोपाई कर दी। इन सब्जियों का सीजन खत्म हुआ तो मक्का बो दिया। अदरक की आठ-नौ माह की फसल के साथ उसी खेत में पांच फसलें ले सकते हैं। उन्होंने इसी खेत में मचान बनाकर लौकी, तौरी, कद्दू बो दिया। इसके बाद राई बो दी।
देहरादून जिला के झबरावाला में बलवीर सिंह ने अदरक के साथ पांच तरह की उपज ली है, इन दिनों उन्होंने राई बोई है। फोटो- डुगडुगी
बताते हैं, फरवरी- मार्च में जो बीज बोया था, उसको जुलाई में निकाल सकते हैं। बोए हुए बीज में अंकुर निकल जाते हैं, जिनसे नये पौधे बन जाते हैं। हमने सावधानी पूर्वक पुराना बीज निकाल लिया और बाजार में बेच दिया। अदरक की फसल की लागत मिल गई। साथ ही, इसके साथ लगाई फसलों से भी आय हुई। अब जो अदरक खेत में लगी है, वो हमारे लिए बोनस है। किसान बलबीर सिंह ने उद्यान विभाग से अदरक का बीज खरीदा था और कुछ बीज अपने पास ले लगाया था।
बलवीर सिंह के अनुसार, वो आर्गेनिक खेती करते हैं। खेतों में गोबर, वर्मी कम्पोस्ट और खुद का बनाया स्प्रे इस्तेमाल करते हैं, पर उनकी जैविक फसल के लिए बाजार नहीं है।
जैविक खेती पर बलवीर सिंह और रणजोध सिंह जैसे प्रगतिशील किसानों की क्या दिक्कतें हैं,पर अगली किस्त में बात करेंगे।

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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