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मारखमग्रांट के 20 साल प्रधान रहे अब्दुल रज्जाक साइकिल पर पीछे बैठकर करते थे चुनाव प्रचार

चुनाव में शराब और पैसे बांटने के सख्त खिलाफ हैं अब्दुल रज्जाक

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

उत्तर प्रदेश के समय में, आबादी के लिहाज से सबसे बड़ी ग्राम पंचायत मारखम ग्रांट के लगातार तीन बार प्रधान निर्वाचित हुए अब्दुल रज्जाक किसी भी चुनाव के दौरान पैसा और शराब बांटने सहित किसी भी अनैतिक गतिविधि का सख्त विरोध करते हैं। उनका कहना है, “मैं कसम खाकर कह सकता हूं कि अपने किसी भी चुनाव में एक बूंद भी शराब नहीं बंटवाई और न ही धनबल का इस्तेमाल किया। चुनाव चाहे लोकसभा का हो या फिर विधानसभा का, मेरे माध्यम से कभी भी वोटरों को शराब नहीं दी गई। वोट खरीदना या बेचना, दोनों ही खराब हैं, इससे जनता और क्षेत्र दोनों का नुकसान है। यह समाज के लिए अच्छी बात नहीं है। ”

 

आजादी से पहले जन्मे 81 वर्ष के अब्दुल रज्जाक राजनीतिक विज्ञान में एमए तथा एलएलबी उपाधि धारक हैं। जनप्रतिनिधि कार्यकाल में भी पढ़ने और पढ़ाने का शौक रहा। कहते हैं, मैं पहले भी शिक्षक था और आज  भी शिक्षक हूं। मुझे पढ़ना, पढ़ाना और समझाना अच्छा लगता है। 1963 में देहरादून के सीएनआई ब्वायज इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद उनको देहरादून में ही पांचवी क्लास तक के मुस्लिम नेशनल स्कूल में बतौर हेडमास्टर सेवाएं देने का अवसर मिला। उनको एक अध्यापक ने यह जिम्मेदारी सौंपी थी। इस विद्यालय को आठवीं तक की मान्यता दिलाई। पढ़ाते समय शिक्षक स्नातक कोटे से बीए, एमए किया। डीएवी पीजी कालेज से एलएलबी किया।

पूर्व ग्राम प्रधान अब्दुल रज्जाक अपने पौत्रों के साथ। फोटो- राजेश पांडेय

मारखम ग्रांट के लगभग 20 साल प्रधान रहे अब्दुल रज्जाक हमसे चुनाव और ग्रामीण विकास पर बात कर रहे थे। मारखम ग्रांट देहरादून जिला के डोईवाला ब्लाक की ग्राम पंचायत है। वो लगातार तीन बार निर्वाचित हुए। पहले, कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी सरकार के आदेश पर पांच साल से अधिक प्रधान पद पर रह सकते थे। अब, पांच साल पूरे होते ही पद से हटना पड़ता है।

बताते हैं, उनका प्रचार अभियान साइकिल और तांगे पर चलता था। उनको साइकिल चलानी नहीं आती है, इसलिए प्रचार के लिए किसी साथी की साइकिल के पीछे बैठकर गांव-गांव जाते थे। उन्होंने चुनाव में ना के बराबर खर्च किया, बल्कि जनता के सहयोग से चुनाव लड़ा। उस समय आज की तरह सुविधाएं और संसाधन भी नहीं थे।

ग्राम पंचायतों की राजनीति में सक्रिय रहे अब्दुल रज्जाक कहते हैं,  वो चुनाव प्रचार में यह बात जरूर कहते थे, शराब और पैसे लेकर वोट देने से गांव का विकास नहीं हो सकता। जो भी, लालच दिखाकर वोट हासिल करता है, वो मतदाताओं की दिक्कतों पर ध्यान नहीं देता। ऐसे लोग वोट पाने के लिए धन बल और अनैतिक कार्यों को ही आगे बढ़ाते हैं। इसलिए मतदाताओं से साफ-साफ कहते थे कि अपने मताधिकार को बेचने वाले विकास कार्यों और अपनी पीढ़ियों की तरक्की को भूल जाएं।

उनका कहना है, जनप्रतिनिधि में आत्मबल होना चाहिए, इस बात का अहसास होना चाहिए कि हम जनता की सेवा करेंगे और जनता को यह विश्वास होना चाहिए कि यह जनप्रतिनिधि उनकी सेवा करेगा।

ऐसे बदला मारखम ग्रांट ग्राम पंचायत का स्वरूप

पहले के मारखम ग्रांट की बात करें तो यह एक कोने से दूसरे कोने तक लगभग सात से आठ किमी. फैला था। उस दौर में इसमें 22 गांव थे, जिनकी वोटर संख्या दस हजार के आसपास थी। बाद में, यह संख्या लगभग दोगुनी हो गई थी। मारखम ग्रांट में उस समय डोईवाला बाजार के कुछ भाग के साथ ही, प्रेमनगर बाजार, खत्ता, खैरी-1,खैरी-2, खैरी-3, धर्मूचक, बाजावाला, नियामवाला, चांदमारी, कुड़कावाला-1, कुड़कावाला-2, छद्दमीवाला, दौड़बसी, सत्तीवाला, माधोवाला, हंसूवाला, बुल्लावाला, झबरावाला आदि गांव शामिल थे।

बाद में, डोईवाला ग्राम पंचायत और मारखम ग्रांट के कुछ भागों को मिलाकर डोईवाला टाउन एरिया बना दी गई। वर्ष 1989 में आत्माराम अग्रवाल डोईवाला टाउनएरिया के पहले अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

आज मारखम ग्रांट में बुल्लावाला, झबरावाला, वन क्षेत्र से सटा हुआ खैरी का हिस्सा, छद्दमीवाला, धर्मूचक तथा बाजावाला का कुछ हिस्सा रह गया, क्योंकि मारखमग्रांट के कई गांव डोईवाला नगर पालिका में  शामिल हो गए।

ग्राम प्रधान बनने से पहले सरपंच भी रहे रज्जाक
वर्ष 1982 में ग्राम प्रधान निर्वाचित होने से पहले अब्दुल रज्जाक तेलीवाला गांव से वार्ड सदस्य निर्वाचित हुए थे। तेलीवाला गांव में उनका आवास भी है, जो उनकी सादगी भरी जिंदगी को पेश करता है।

“1982 से पहले तक उत्तर प्रदेश में न्याय पंचायत व्यवस्था थी, जिसमें हर ग्राम पंचायत से दो या तीन सदस्य चुने जाते थे। छोटी ग्राम पंचायत से दो और बड़ी से तीन सदस्य होते थे। ये सदस्य न्याय पंचायत में पंच कहलाते थे, जिनका मुखिया सरपंच होता था। मैं न्याय पंचायत, जो मारखमग्रांट के नाम से थी, का सरपंच भी रहा। इसमें नौ ग्राम पंचायतें- मारखमग्रांट, दूधली, सिमलास ग्रांट, नागल बुलंदावाला, नागल ज्वालापुर, लच्छीवाला, डोईवाला, डैशवाला, मिस्सरवाला शामिल थीं।

ग्राम पंचायतों से चुनकर आने वाले पंच ही सरपंच को चुनते थे। सरपंच और पंचों की बैंच बनती थीं, जो न्याय पंचायत क्षेत्र के ग्रामीणों के आपसी वादों का निस्तारण भी करती थी। कई बार ऐसा भी हुआ कि एसडीएम कोर्ट से वादों को न्याय पंचायत के लिए रैफर किया गया। न्याय पंचायत जुर्माना भी लगाती थी, जिसके विरुद्ध अपील हाईकोर्ट में होती थी, ” पूर्व ग्राम प्रधान अब्दुल रज्जाक हमें न्याय पंचायतों की शक्तियों एवं उनके गठन की प्रक्रिया के बारे में बता रहे थे।

पूर्व ग्राम प्रधान अब्दुल रज्जाक। फोटो- राजेश पांडेय

वो बताते हैं, वर्ष 1982 तक ही न्याय पंचायत के तहत सरपंच व्यवस्था कार्य करती रही, उसके बाद इनके चुनाव नहीं हुए। दस्तावेजों में न्याय पंचायतों का अस्तित्व है, जैसे कि मारखमग्रांट न्याय पंचायत अभी भी है, जिसमें कई ग्राम पंचायतें शामिल हैं।

पूर्व प्रधान अब्दुल रज्जाक ने बताया, उन्हें हर वर्ग से समर्थन मिला। उस समय अल्पसंख्यक समाज के मतदाता कम थे, फिर भी वो निर्वाचित हुए। इसकी वजह, जनता के बीच उनके कार्य, जनता से जुड़ाव, विकास कार्यों की योजना बनाने में जनता की सहभागिता एवं विकास कार्यों को दलगत राजनीति से दूर रखना रहा है। उन्होंने आवासहीन ग्रामीणों को भूमि एवं आवास उपलब्ध कराने की योजनाओं पर ध्यान दिया। ग्राम पंचायत की खाली भूमि पर पौधारोपण किया। पर्यावरण के क्षेत्र में मारखमग्रांट का देहरादून जिला में पहला नंबर था। बताते हैं, आज भी सुसवा नदी के आसपास मौजूद सभी पेड़ उनके कार्यकाल में लगाए गए। कोआपरेटिव में भी बहुत कार्य किया।

राजनीति में आने से पहले शिक्षक था और आज भी हूं

बुजुर्ग राजनेता अब्दुल रज्जाक कहते हैं, ग्राम पंचायत की राजनीति में आने से पहले वो शिक्षक थे, जो आज भी हैं। 2007 में बालिकाओं के लिए आठवी कक्षा तक के निशुल्क स्कूल के संचालन की जिम्मेदारी संभाली, जो आज भी संचालित हो रहा है, जिसमें अब बालक भी पढ़ते हैं। स्कूल में छात्र-छात्रा संख्या 400 से अधिक है। वो आज भी सुबह आठ बजे स्कूल में पढ़ाने जाते हैं।

पूर्व ग्राम प्रधान अब्दुल रज्जाक के साथ सामाजिक मुद्दों के पैरोकार मोहित उनियाल। फोटो- राजेश पांडेय

गांवों को शहरों में मिलाना सही नहीं मानते अब्दुल रज्जाक

“गांवों को शहरी निकायों का हिस्सा बनाना, विकास की दृष्टि से सही नहीं है। इससे गांवों के हालात पहले से भी ज्यादा खराब हो जाएंगे, आप देहरादून नगर निगम में शामिल गांवों को ही देख लीजिए। महात्मा गांधी भारत को गांवों का देश बनाना चाहते थे, यह उनका सपना था। पर, गांवों के विकास पर ध्यान देने की बजाय उनको शहरों में शामिल किया जा रहा है। यह विकास नहीं है, बल्कि जनता के प्रतिनिधियों की संख्या भी कम हो रही है। जिन ग्राम पंचायतों में दस से पंद्रह जनप्रतिनिधि रहते थे, उसके शहरी निकाय में शामिल होने से मात्र एक प्रतिनिधि चुना जा रहा है, ” पूर्व प्रधान अब्दुल रज्जाक कहते हैं।

राजनीतिक दलों ने गांवों को कमजोर किया

उनका कहना है, गांवों को राजनीतिक दलों ने कमजोर किया। जनप्रतिनिधियों ने गांवों को कमजोर किया है। कोई भी जनप्रतिनिधि हो, वो शहर में अपना मकान बनाना चाहता है। जनप्रतिनिधि स्वयं अपने गांवों को, अपने क्षेत्र को छोड़कर देहरादून दौड़ रहे हैं। विधायक अपने पर्वतीय क्षेत्रों को छोड़कर देहरादून में मकान बना रहे हैं। इसका मैसेज यही जा रहा है कि जब विधायक अपने क्षेत्र में नहीं रहना चाहते, उनके बच्चे यहां नहीं रहना चाहते तो जनता भी क्यों रहे। गांव का विकास नहीं हो पा रहा है। ग्रामीण विकास का ढांचा ईमानदारी के साथ मजबूत किया जाता तो हालात बेहतर होते, गांवों का विकास होता।

वर्तमान में उत्तराखंड कांग्रेस में विशेष आमंत्रित सदस्य अब्दुल रज्जाक डोईवाला किसान सहकारी समिति में उपाध्यक्ष, उत्तराखंड रेशम फेडरेशन में उपाध्यक्ष तथा जिला सहकारी बैंक देहरादून के निर्वाचित निदेशक रहे। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली।

हम यहां रहते हैं-

Rajesh Pandey

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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