भारत में पशुओं से मिलने वाले दूध को बाजार से नहीं हटा पाएगा Lab Grown Milk

Rajesh Pandey
बाजार में पारंपरिक रूप से पशुओं से मिलने वाला दूध बिक्री करते एक किसान।

Lab Grown Milk:  देहरादून, 27 नवंबर, 2025: इजरायल की एक कंपनी ने तो लैब में दूध बनाना शुरू भी कर दिया है, और भारत में भी कुछ कंपनियाँ बिना गाय के दूध बनाने की तैयारी में हैं। इन कंपनियों का दावा है कि यह फ़ैक्टरी वाला दूध हमारे ग्रह, इंसानों, जानवरों और जलवायु सबके लिए बेहतर है। वे तो यहाँ तक कहते हैं, “हम पुरानी डेयरी और खाने-पीने की इंडस्ट्री को बदल रहे हैं। हम बायो-इंजीनियरिंग करके और यीस्ट या बैक्टीरिया का इस्तेमाल करके (इसे ‘प्रेसिजन फर्मेंटेशन’ कहते हैं) भारत का पहला ऐसा दूध प्रोटीन और डेयरी प्रोडक्ट बना रहे हैं जिसमें कोई जानवर शामिल नहीं है। हमारा A2 दूध प्रोटीन तो दुनिया में पहला होगा।” कंपनियां लाख फायदे गिनाएं, पर क्या यह भारत में कृषि एवं पशुपालन की इकोनॉमी को बढ़ाएगा, शायद नहीं…।

अब बड़ा सवाल यह है: क्या यह लैब में बना दूध भारत के बाज़ार से हमारी गाय-भैंस का दूध हटा पाएगा? खासकर हमारे देश में, जहाँ गाँव-देहात की पूरी अर्थव्यवस्था पशुपालन पर टिकी है? शायद यह इतना आसान नहीं होगा, यह संभव भी नहीं हो पाएगा।

तो, आइए पहले समझते हैं कि यह लैब में बना दूध आखिर है क्या?

लैब में बना गाय-मुक्त दूध क्या है?

यह खाने की साइंस में एक नई खोज है। यह उन लोगों के लिए बेहतरीन विकल्प होगा, जिन्हें दूध का स्वाद पसंद है, लेकिन जो नैतिक कारणों से या पर्यावरण की चिंता की वजह से जानवरों से बने उत्पाद नहीं लेना चाहते।

Lab Grown Milk बनता कैसे है?

  1. वैज्ञानिक दूध के खास प्रोटीन (जैसे व्हे और केसीन) का DNA कोड लेते हैं।

  2. इस कोड को यीस्ट या बैक्टीरिया जैसे छोटे जीवों (माइक्रोब्स) के अंदर डाल देते हैं।

  3. फिर इन जीवों को बड़े-बड़े टैंकों (बायोरिएक्टर) में चीनी खिलाई जाती है।

  4. ये जीव, प्रेसिजन फर्मेंटेशन नाम की प्रक्रिया से, बिल्कुल वही डेयरी प्रोटीन बनाते हैं जो गाय बनाती है।

नतीजा क्या होता है?

इस प्रोटीन को पानी, पौधों से मिले फैट और पोषक तत्वों के साथ मिलाकर एक तरल चीज़ बनाई जाती है। इसका स्वाद, बनावट और पोषण असली दूध जैसा होता है, लेकिन इसमें लैक्टोज नहीं होता और यह पूरी तरह से पशु-मुक्त होता है।

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पशुओं से मिलने वाला पारंपरिक दूध

पारंपरिक दूध तो वही है जो हम सदियों से गायों, भैंसों या अन्य जानवरों से लेते आ रहे हैं। जानवरों को पालना, उन्हें खिलाना और दूध निकालना। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और गाँव की अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। यह एक संपूर्ण आहार है, आसानी से हर जगह मिल जाता है, सस्ता है, और लाखों किसानों के लिए सीधी कमाई का ज़रिया है।

Lab Grown Milk भारत में क्यों नहीं हावी हो सकता?

भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा दूध उत्पादन करता है, जो पूरे विश्व के उत्पादन का करीब एक चौथाई है। पिछले 11 सालों में, भारत का डेयरी सेक्टर 70% बढ़ा है। यह हमारी अर्थव्यवस्था में लगभग 5% का योगदान देता है और 8 करोड़ से ज़्यादा किसानों को सीधा रोज़गार देता है। महिला किसान तो इसमें ख़ास भूमिका निभाती हैं। इसलिए, लैब वाला दूध कितना भी अच्छा क्यों न लगे, इसके सामने कुछ बड़ी चुनौतियाँ हैं जो इसे पारंपरिक दूध की जगह लेने से रोकती हैं:

बहुत ज़्यादा लागत और उत्पादन की मुश्किल

  • इतना ज़्यादा उत्पादन: भारत में दूध की खपत अरबों लीटर में है। अगर लैब वाले दूध को इसकी बराबरी करनी है, तो हज़ारों नई, महंगी बायोरिएक्टर फ़ैक्टरियाँ बनानी पड़ेंगी। यह काम एक-दो साल का नहीं, बल्कि दशकों का है।

  • महंगा उत्पादन: अभी लैब में प्रोटीन बनाने की प्रक्रिया गाय का दूध निकालने से कहीं ज़्यादा महंगी है। जब तक इसकी कीमत बहुत कम नहीं हो जाती, यह दूध एक प्रीमियम (महँगा) प्रोडक्ट ही रहेगा, जिसे आम भारतीय खरीद नहीं पाएगा।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर

  • रोज़ी-रोटी का सवाल: लाखों छोटे किसान और मज़दूर अपनी कमाई के लिए सीधे तौर पर डेयरी पर निर्भर हैं। फ़सल खराब होने पर डेयरी फार्मिंग ही उनका सहारा बनती है। जानवर खेती के लिए ज़रूरी गोबर की खाद देते हैं और कई जगह आज भी बैल खेत जोतने या सामान ढोने के काम आते हैं। लैब में बना दूध ये सब फ़ायदे नहीं दे सकता।

सरकारी नियम और लोगों की स्वीकार्यता

  • मंज़ूरी मिलना: यह एक नया तरह का फूड है, इसलिए इसे बेचने से पहले सरकारी एजेंसियों (जैसे FSSAI) से लंबी और सख्त मंज़ूरी लेनी पड़ेगी। बहुत से लोग, खासकर हमारे देश में, ‘लैब में बने’ या ‘इंजीनियर्ड’ उत्पादों पर जल्दी भरोसा नहीं करते। इस सोच को बदलना एक धीमी प्रक्रिया होगी।

  • पारंपरिक दूध में कई तरह के प्राकृतिक पोषक तत्व, विटामिन और अन्य उपयोगी चीज़ें होती हैं। लैब में बना दूध सिर्फ मुख्य प्रोटीन और फैट पर ध्यान देता है। शायद यह असली दूध के पूरे पोषण और प्राकृतिक संतुलन की बराबरी कभी न कर पाए।

लैब में बना गाय-मुक्त दूध पारंपरिक दूध को हटाएगा नहीं, बल्कि उसके साथ चल सकता है। भविष्य में, यह उन लोगों के लिए एक अच्छा, नैतिक और लैक्टोज-मुक्त विकल्प बनेगा जो इसे खरीद सकते हैं। लेकिन, इसकी ज़्यादा लागत, डेयरी बाज़ार के विशाल आकार और भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसकी ज़रूरी भूमिका के कारण, पारंपरिक दूध ही आने वाले कई दशकों तक हमारा मुख्य दूध का स्रोत बना रहेगा।

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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