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KARGIL VIJAY DIWAS: 23 साल की उम्र में शहीद हो गए थे डांडी के कैलाश भट्ट

"कैलाश को स्कूल यूनिफार्म नहीं होने पर क्लास से बाहर कर दिया था"

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

“बड़े भाई कैलाश कक्षा आठ में पढ़ते थे और मैं उस समय कक्षा छह का छात्र था। यूनिफार्म नहीं होने की वजह से कैलाश को क्लास से बाहर कर दिया गया। ऐसा देखकर मुझे और दूसरे भाई को बहुत ग्लानि हुई। मैंने कहा, अब मुझे नहीं पढ़ना। पर, कैलाश भाई ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने, हमें भी हौसला दिलाया और कहा, पढ़ाई तो पूरी करनी है। एक दिन, मैं घर के लिए क्या, देश के लिए कुछ करुंगा। उन्होंने आठवीं पास की और भोगपुर स्थित स्कूल में एडमिशन लिया। ”

देहरादून जिला के डांडी गांव निवासी आचार्य संदीप कुमार भट्ट, कारगिल दिवस से पहले रेडियो ऋषिकेश के साथ , अपने बड़े भाई शहीद कैलाश कुमार भट्ट से जुड़ीं यादों को साझा कर रहे थे।

26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस है। यह दिन उन वीर योद्धाओं को नमन करने का दिन है, उनको याद करने का दिन, जो देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान करके हमेशा के लिए अमर हो गए।  इन्हीं वीर योद्धाओं में से एक वीर शहीद कैलाश कुमार भट्ट भी हैं, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए मात्र 23 साल की आयु में प्राणों को न्योछावर कर दिया। देहरादून जिला के डांडी गांव के निवासी कैलाश कुमार भट्ट, जुलाई 1997 में भारतीय सेना का हिस्सा बने और सात जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहादत को प्राप्त हो गए।

कैलाश भट्ट के साथ, उनके भाई राधेश्याम भट्ट भी कारगिल युद्ध में दुश्मनों को खदेड़ रहे थे। राधेश्याम भट्ट सर्च टीम का हिस्सा थे, जिनका काम आतंकियों को तलाश करके मौत के घाट उतारना था।

कारगिल युद्ध में शहीद कैलाश कुमार भट्ट के भाई आचार्य संदीप कुमार भट्ट। फोटो- रेडियो ऋषिकेश के सौजन्य से

आचार्य संदीप कुमार भट्ट बताते हैं, हम सामान्य परिवार में जन्में थे। हम पांच भाई और तीन बहनें हैं। माता- पिता कृषि से हम भाई बहनों की परवरिश कर रहे थे। बड़ी कठिनाइयां थीं। एक बार की बात है, स्कूल की यूनिफार्म नहीं होने के कारण शिक्षक ने कैलाश को क्लास से बाहर कर दिया था। कैलाश कक्षा आठ में पढ़ते थे और मैं और दूसरा भाई छठीं- सातवीं कक्षा में थे। यह देखकर मुझे बहुत बुरा लगा, पर कैलाश ने हमें समझाया पढ़ाई बहुत जरूरी है। उस दिन की उनकी बात मुझे अच्छी तरह से याद है, उन्होंने कहा था, “मैं घर के लिए क्या, देश के लिए कुछ करुंगा।”

शहीद कैलाश कुमार भट्ट से जुड़ी यादों को साझा करते हुए उनके भाई आचार्य संदीप भट्ट की आंखें नम हो जाती हैं। वो बताते हैं, आठवीं के बाद भाई ने भोगपुर में श्री गुरुराम राय इंटर कॉलेज में दाखिला ले लिया। बहुत मेहनत करते थे कैलाश। वो सेना में शामिल होने के लिए सुबह जल्दी उठकर दौड़ लगाते। खेतों में जाकर माता-पिता को सहयोग करते।

कारगिल युद्ध में शहीद कैलाश कुमार भट्ट (फाइल फोटो)। यह फोटो शहीद कैलाश कुमार भट्ट के भाई आचार्य संदीप कुमार भट्ट ने उपलब्ध कराया है।

“हाईस्कूल पास करके लैंसडौन में चल रही भर्ती में चले गए। रात करीब दो बजे घर लौटे तो बहुत उदास थे। बताया, वो मेडिकल में अनफिट हो गए, पर उनको एक मौका मिला है रुड़की जाकर फिर से मेडिकल कराने का। वहां मेडिकल में फिट हो गए तो सेना में भर्ती हो जाएंगे। दूसरे दिन कैलाश रुड़की गए। वहां मेडिकल में फिट घोषित कर दिए गए। रुड़की से लौटकर वो बहुत खुश थे। कह रहे थे, अब मां-पिता और किसी को कोई कष्ट नहीं होगा। इसके बाद कैलाश ट्रेनिंग के लिए चले गए,” आचार्य संदीप कुमार भट्ट बताते हैं।

“उनके बाद छोटे भाई राधेश्याम भी सेना में भर्ती हो गए। परिवार में खुशियां आने लगीं। सभी बहुत खुश थे, माता-पिता, सभी भाई औऱ बहनें। मैं, संस्कृत विद्यालय में पढ़ाई के लिए काशी चला गया। कुछ समय बाद, कैलाश भाई छुट्टी पर घर आए। मुझे फोन करके उन्होंने कहा, तुम भी घर आ जाओ। मैंने कहा, मैं तो अभी घर से आया हूं। मेरी पढ़ाई चल रही है। हम भाइयों में यह बात तय हुई कि, हम सभी एक साथ दीवाली मनाएंगे।”

” पर, कुछ दिन में ही कैलाश की छुट्टियां कैंसिल हो गईं। कारगिल युद्ध शुरू होने पर उनको वापस लौटना पड़ा। मैं रोजाना न्यूज सुनता। भगवान काशी विश्वनाथ जी से सभी फौजी भाइयों के स्वस्थ और सुरक्षित रहने की प्रार्थना करता। सात जुलाई 1999 को दुश्मनों का बहादुरी से सामना करते हुए कैलाश शहीद हो गए।”

“शहादत से दो दिन पहले ही उनका पत्र मिला था, जिसमें उन्होंने लिखा था, मेरी राधेश्याम भाई से मुलाकात हुई है। मैं द्रास में जा रहा हूं। राधेश्याम भी वहां जाएंगे। मैंने राधेश्याम को समझा दिया, ज्यादा हड़बड़ी नहीं करना। सबके साथ रहना।”

“पत्र मिलने के बाद, मुझे काफी संतोष मिला कि सभी ठीक हैं, स्वस्थ हैं। पहले तो उनकी कोई सूचना नहीं मिल पा रही थी। पत्र मिलने पर काफी राहत मिली।”

“पर, दो दिन बाद मेरे पास फोन आया, तुम तुरन्त घर चले आओ। मेरा मन किसी अनहोनी से भर गया। किसी तरह मैं ट्रेन से सुबह घर पहुंच गया। भाई का पार्थिव शरीर घर पहुंचा, जहां शहीद के सम्मान और अंतिम दर्शनों के लिए विशाल जनसमूह पहुंचा था। जिसको भी शहादत का समाचार मिला, वो उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने आया। सभी ने नम आंखों से शहीद कैलाश को अंतिम विदाई दी।”

“मेरा भाई कैलाश हमेशा के लिए अमर हो गया। मां कहती हैं, कैलाश मेरा लाल तो है ही, वो मुझसे पहले पूरे देश का लाल है। मेरा बेटा देश की सुरक्षा के लिए योद्धाओं की तरह शहीद हो गया, ” कहते हुए आचार्य संदीप कुमार भट्ट की आंखें नम हो जाती हैं।

संदीप कहते हैं, गीता में लिखा है- जो इस संसार में आया है, उसका जाना निश्चित है, लेकिन कोई देश की रक्षा करते हुए जाए, यह गर्व की बात है। बताते हैं, पूरे ब्रह्मांड को भेदने की शक्ति केवल दो लोगों के पास ही है। इनमें एक तपस्वी और दूसरा वीर योद्धा की तरह लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होने वाले शहीद होते हैं।

बताते हैं, “शहीद कैलाश का पार्थिव शरीर लेकर आए, सैन्य अधिकारी रमेश भट्ट ने बताया, हम पहाड़ी पर कब्जा करने जा रहे थे, वहां हमें कोई आतंकवादी नहीं मिला। हम आगे बढ़े, तो हमारे ऊपर तीन ओर से फायरिंग होने लगी। पहली गोली कैलाश की जांघ पर लगी। कैलाश ने कहा, अब मैं पीछे नहीं हटूंगा। वो लगातार आतंकियों से मोर्चा ले रहे थे। इसके बाद, उन पर और गोलियां लगीं। दो पेट में, एक सीने में, अंत में एक गोली उनके सिर में लगी। कैलाश शहीद हो गए। इस तरह उन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।”

Rajesh Pandey

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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