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बड़ा रोचक है रोटी का सफर और इसकी कहानियां

कहते हैं कि कपड़ा रोटी मिलती रहे तो जिन्दगी चलती रहेगी। अक्सर लोग अपने भोजन में रोटियों की संख्या तय कर देते हैं। कोई कहता है कि मैं तो चार रोटी खाता हूं, कोई तीन या दो। 
रोटी केवल गेहूं की ही नहीं बनती, इसमें चना, बाजरा और मंडुआ भी मिला सकते है, जिससे स्वाद भी बढ़ता है और इसको सेहत के लिए भी अच्छा बताया जाता है। कुल मिलाकर मैं तो यही कहना चाहूंगा कि खाने के बिना जीवन नहीं है और रोटी तो खाने की जान होती है। 
… तो आज हम आपके साथ रोटी पर बात करने वाले हैं। हम आपके लिए रोटी के बारे में ढेर सारी जानकारियां लेकर हाजिर हुए हैं। हम रोटी का इतिहास (History of Roti) जानेंगे और साथ ही जानेंगे इसके बारे में बहुत सारे इंटरेस्टिंग फैक्ट। तो हमारे साथ चलिएगा रोटी के सफर (Journey of Roti) पर…।
दक्षिण एशिया में भोजन (Foods from South Asia) की बात करें और इसमें रोटी शामिल न हो, ऐसा नहीं हो सकता। भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, पूर्वी अफ्रीका में रोटी तो हर घर में पकाई जाती है। वैसे, आमतौर पर रोटी बनाने के लिए गेहूं का आटा इस्तेमाल किया जाता है, पर इसमें मक्का, जौ, चना, बाजरा, मंडुआ को भी शामिल किया जा सकता है। 

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रोटी को फुल्का, चपाती और टिकड़े या टिक्कड़ भी कहा जाता है। परांठा, नान, मिस्सी रोटी, लच्छा परांठा, मीठी रोटी, रोट, रूमाली रोटी, तन्दूरी रोटी, डबल रोटी… ये सब भी रोटी के ही तो रूप हैं। 
अभी तक हम आपको वही सबकुछ बता रहे थे, जो आप जानते हैं। अब हम आपसे बात करेंगे रोटी के इतिहास की। यह कहां से आई, को लेकर बहुत सारी कहानियां हैं। 
रोटी कब से खाई जा रही है, के बारे में बताना तो कठिन है, पर इसके बारे में कुछ जानकारियां हम आपसे साझा कर सकते हैं।
कहा जाता है कि रोटी का जन्म लगभग पांच हजार साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता में हुआ था। यह इसलिए कहा गया, क्योंकि गेहूं की खेती के साक्ष्य सबसे पहले सिंधु, मिस्र, और मेसोपोटामिया सभ्यताओं में ही मिलते हैं। गेहूं का एक पेस्ट बनाकर उसको गर्म पत्थर पर पकाकर रोटी बनाई जाती थी। 
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि इसकी शुरुआत पूर्वी अफ्रीका में हुई थी, जिसके बाद इसे भारत लाया गया था। यह भी कहा जाता है कि अरबों ने रोटी को व्यापार मार्गों से पूरे दक्षिण एशिया में फैलाया था।   
यह बात तो सही है कि भारत में रोटी (Roti in India) प्राचीन काल से ही हमारे खाने में शामिल है। मोहनजोदाड़ो की खुदाई में भी 5000 वर्ष पुराने कार्बन युक्त गेहूं मिले हैं। इससे पता चलता है कि इस समय भी उसका उपयोग होता होगा। 
प्राचीन ग्रंथों का हवाला देते हुए बताया जाता है कि हड़प्पा संस्कृति में भी भारत में चपाती या रोटी का अस्तित्व था, जहाँ कृषि एक प्रमुख व्यवसाय था और लोग जानते थे कि गेहूँ, बाजरा और सब्जियाँ कैसे उगाई जाएँ। 
रोटी शब्द संस्कृत के रोटिका से बना है। रोटिका यानी अनाज के आटे से तवे पर सेंकी गईं गोल-गोल पतली, चपटी टिकिया।
सोलहवीं शताब्दी में भाव-मिश्र द्वारा लिखित एक चिकित्सा पाठ भवप्रकाश में रोटिका शब्द लिखा गया है , जिसका अर्थ है तरी के साथ खाने के लिए चपटी रोटी।

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प्राचीन वैष्णव लेख, जिसमें भगवान जगन्नाथ जी के बारे में कहा गया है कि 15 वीं शताब्दी में भगवान गोपाल जी के समक्ष चपातियां अर्पित की जाती थीं, जिन्हें रसोई में खीर और मीठे चावल से अधिक आवश्यक माना जाता था। 
एक और जानकारी मिली है, जिसमें कहा गया है कि रोटी का सबसे प्राचीन प्रमाण मिस्र देश में मिलता है। मिस्र में एक महिला की 3500 वर्ष पुरानी कब्र में एक टोकरी मिली थी। इस टोकरी में गेहूं के आटे की गोल ,चौकोर , पशु पक्षियों के आकार की और गेंद जैसी कई तरह की रोटियां रखी हुई थीं।
बताया जाता है कि मिस्र में प्राचीन समय में रोटी का वही स्थान था, जो आजकल सिक्कों का है। उस समय राज्य में वेतन के रूप में रोटियां दी जाती थीं। उस समय आज की तरह रोटी बनाने की कला विकसित नहीं हुई थी। गेहूं को भिगोकर पीसा जाता था और फिर उस पीठी से अलग- अलग आकार की रोटियां बनाई जाती थीं। बाद में आटे की रोटियां भी बनाई जाने लगीं। 
बताया जाता है कि पुराने समय में, यूरोप के देशों में दुकानों को रोटियां बनाने का अधिकार दिया जाता था। सभी लोग इनसे ही रोटियां खरीदनी पड़ती थीं।वहां कई प्रकार की रोटियां बनाई जाती थीं। फ्रांस के बादशाह की रसोई में बीस प्रकार की रोटियां बनाने की जानकारी है | ये रोटियां खमीर से बनीं डबल रोटियों जैसी ही होती थीं।   
कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में रोटी सम्राट अकबर की पसंदीदा थी। इसका जिक्र आइन-ए-अकबरी में भी मिलता है जिसकी रचना अकबर के ही एक नवरत्न दरबारी अबुल फजल इब्न मूबारक ने की थी।

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चपाती 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों के बीच भी बहुत लोकप्रिय हो गई थी। यहां तक कि सैनिकों के डाइनिंग हॉल में भी रोटियां परोसी जाने लगीं और देखते ही देखते अमेरिका और ब्रिटेन में भी अन्य व्यंजनों की तरह रोटी का भी प्रवेश हो गया था।
वहीं ऐसे ही रोटी के बारे में एक और कहानी है कि इसे यात्रियों के खाने के लिए बनाया गया था जो कि कटोरी के आकार की होती थी, ताकि इसमें सब्जी को रखकर आसानी से खाया जा सके। इससे बर्तन की जरूरत नहीं पड़ती थी।
क्या आप जानते हैं कि चपाती शब्द कहां से आया। संस्कृत के शब्द चर्पट, जिसका मतलब होता है- चपेड़ व थप्पड़। आपको बता दें कि चर्पट से ही बने चर्पटी शब्द का अर्थ होता है चपाती।

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यहां ध्यान देने वाली बात है कि चपाती बनाने के लिए आटे की लोई को हथेली पर थाप-थाप कर रोटी बनाई जाती है और इसको चपाती नाम दिया गया है, क्योंकि आटे की लोई को चपत लगाकर चपटा बनाया गया है। संस्कृत से ही यह शब्द फारसी में चला गया, वहां चपत को चपात कहा जाने लगा, जिसका मतलब थप्पड़ से है। 
तो यह थी रोटी के बारे में कुछ सुनी सुनाई और पढ़ी पढ़ाईं बातें….और भी बहुत सारी जानकारियां आपके साथ साझा करते रहेंगे। अब हमें इजाजत दीजिए। 

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Working Experience –25 Years of experience in Mass Media and content writing in Hindi.     Literary work- Two books in Hindi. One of them is Jungle mei Tak Dhinaa Dhin, which is a compilation  of 18 stories based on wildlife. Another one is Zindagi ka Tak Dhinaa Dhin. This book is with 7 Stories. These Stories presents the Human lifestyle and the entire system, where we live. Both books are copyright from copyright office Government of India. I am also working on the other two books and short stories. Blog writing and real-time coverage is my passion.    Initiative- Initiate a storytelling platform Tak Dhinaa Dhin. We are working in slums and Government schools. Our aim is to motivate children to write stories. We believe that imagination is must to reach near reality. We are motivating children on our digital platform also. Dugdugi is an other initiative for Creative Kids and Youth. Conducting a pathshaala for Slum's Children. Qualification- B.Sc. (Physics, Chemistry, Math), Bachlor of Journalism and LLB  Core competence- Content writing, Reporting and Editing.

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