मुझे मिट्टी में रंग दिखते हैं…

Rajesh Pandey
मिट्टी और गोमूत्र से कमाल की चित्रकारी करते हैं गोपेश्वर के आयुष

परिस्थितियां आपसे कुछ ऐसा करा देती हैं, जिस पर एक दिन आप खुद से कह उठते हैं, वाह ! विश्वास नहीं होता, क्या वास्तव में यह मैंने किया है। जब आप दूसरों से कुछ अलग इनोवेटिव करते हैं तो सब आप की ओऱ देखते हैं। वो जानना चाहते हैं कि आपने यह कैसे कर दिया। मुझे दीवार पर पड़ी बारिश की छीटों ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया और मैंने उसी दिन तय कर लिया कि अब तो मेरे कैनवॉश पर सिर्फ मिट्टी के रंग होंगे।

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मिट्टी और गोमूत्र से कमाल की चित्रकारी करते हैं गोपेश्वर के आयुषहां, मैं उसी मिट्टी की बात कर रहा हूं, जिसने हमें जीवन ही नहीं दिया, बल्कि जीना सिखाया है। मिट्टी में इतने रंग हैं कि बस पूछो मत। मैंने तो इनमें से कुछ रंगों को पहचान लिया, क्योंकि मेरी आर्ट को इनकी जरूरत थी। नेचर ने अपने लिए आपका खजाना खोल दिया है, इसके लिए आपको किसी को कुछ नहीं चुकाना, बस नेचर में बसी विविधता का ख्याल रखना है। उससे हमें उतना ही लेना है, जितनी हमें जरूरत है।तक धिनाधिन की टीम शुक्रवार सुबह आसिमा विहार में थी, जहां 18 वर्षीय आयुष बिष्ट से मुलाकात का समय लिया था। पहाड़ी पैडलर्स (साइकिल की सवारी करने वाले युवाओं का दल) के संस्थापक गजेंद्र रमोला ने हमें आय़ुष के बारे में बताया था कि वह गोपेश्वर से देहरादून फाइन आर्ट का डिप्लोमा करने के लिए अपने भाई के साथ आए हैं। आयुष कैनवॉश पर रंगों की बजाय मिट्टी से चित्र बनाते हैं।रमोला जी, लक्खीबाग में नियो विजन संस्था के माध्यम से स्कूल जाने और स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की पाठशाला का संचालन करते हैं। आयुष इन बच्चों मिट्टी से आर्ट बनाने का अनुभव दिला रहे हैं।आयुष बताते हैं कि कुछ आर्टिस्टहैं, जो मिट्टी से आर्ट बनाते हैं। मिट्टी से ही तो जीवन है और मिट्टी उनकी आर्ट को भी जीवंत कर देती है। अलग-अलग मिट्टी से 24 तरह के शेड बना लेते हैं। आयुष ने बताया कि जब कभी भी गोपेश्वर जाते हैं तो रास्ते में उनको पहाड़ की मिट्टी काफी आकर्षित करती हैं।वो बस या टैक्सी से घर जाते हैं, इसलिए रास्ते में रूक कर अपनी जरूरत के अनुसार मिट्टी की पहचान नहीं कर पाते, लेकिन जब भी वो कभी अपने वाहन से जाएंगे तो रास्ते भर में रूक रूक कर मिट्टी से मुलाकात करेंगे। कहते हैं कि मुझे मिट्टी में रंग दिखते हैं। तब मुझे मिलेंगे एक से बढ़कर एक शेड, जो आर्ट को एक अलग ही लेवल तक ले जाएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।आयुष ने अपना आर्ट वर्क दिखाते हुए बताया कि उनको ओल्ड फेस बनाना ज्यादा पसंद हैं, इन पर काफी वर्क होता है और आपको अपनी कला दिखाने का बेहतर अवसर मिलता है। हमने उनसे आर्ट वर्क पर पिंक और कुछ कुछ से रेड शेड पर जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि यह गोमूत्र है। गोमूत्र से बने शेड भी मिट्टी की तरह नेचुरल व स्थाई होते हैं। यह तो जितना पुराना होता जाएगा, उतना इसमें निखार आएगा। वहीं गोमूत्र जितना अधिक पुराना होगा, उससे बनने वाले चित्र में उतना ही अधिक निखार होगा। धूपबत्ती की राख भी कलर की तरह इस्तेमाल करते हैं।आयुष कहते हैं कि क्लास 5 से आर्ट बना रहे हैं। उनके भाई पीयूष फोटोग्राफी करते हैं। वो वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के अनुभव ले रहे हैं। बताते हैं कि माता पिता ने उन दोनों पर करिअर चुनने के लिए कभी कोई दबाव नहीं बनाया। उन्होंने तो एकेडमिक से ज्यादा आर्ट कंपीटिशन में बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। बताते हैं कि स्कूल लेवल के कंपीटिशन में मैं फर्स्ट औऱ भाई सेकेंड आता थे। हमारी पहचान आर्ट कंपीटिशन के विजेताओं के रूप में हो गई।हमने तय कर लिया कि हमें भविष्य में क्या करना है। पापा ने अपनी तनख्वाह से हम माह कुछ न कुछ बचत करके हमें एक लैपटॉप,कैमरा और जरूरत का सामान खरीदकर दिया। पापा ने हमें नहीं बताया था कि हमारे लिए कुछ पैसों की सेविंग कर रहे हैं। एक दिन उन्होंने हमें पैसे दिए और कहा, अपनी जरूरत की चीजें खरीद लो। माता पिता से हमेशा सहयोग मिला और आज दोनों भाई आसिम विहार में कमरा लेकर अपने सपनों को पूरा करने के लिए जी जान से जुटे हैं।तक धिनाधिन की ओर से आयुष और पीयूष को बहुत सारी शुभकामनाएं। उनके सपनों को बहुत जल्द पंख लगेंगे इसी सुखद कामना के साथ, अगली बार फिर मिलते हैं किसी और पड़ाव पर।

हां, मैं उसी मिट्टी की बात कर रहा हूं, जिसने हमें जीवन ही नहीं दिया, बल्कि जीना सिखाया है। मिट्टी में इतने रंग हैं कि बस पूछो मत। मैंने तो इनमें से कुछ रंगों को पहचान लिया, क्योंकि मेरी आर्ट को इनकी जरूरत थी। नेचर ने अपने लिए आपका खजाना खोल दिया है, इसके लिए आपको किसी को कुछ नहीं चुकाना, बस नेचर में बसी विविधता का ख्याल रखना है। उससे हमें उतना ही लेना है, जितनी हमें जरूरत है।
तक धिनाधिन की टीम शुक्रवार सुबह आसिमा विहार में थी, जहां 18 वर्षीय आयुष बिष्ट से मुलाकात का समय लिया था। पहाड़ी पैडलर्स (साइकिल की सवारी करने वाले युवाओं का दल) के संस्थापक गजेंद्र रमोला ने हमें आय़ुष के बारे में बताया था कि वह गोपेश्वर से देहरादून फाइन आर्ट का डिप्लोमा करने के लिए अपने भाई के साथ आए हैं। आयुष कैनवॉश पर रंगों की बजाय मिट्टी से चित्र बनाते हैं।
रमोला जी, लक्खीबाग में नियो विजन संस्था के माध्यम से स्कूल जाने और स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की पाठशाला का संचालन करते हैं। आयुष इन बच्चों मिट्टी से आर्ट बनाने का अनुभव दिला रहे हैं।
आयुष बताते हैं कि कुछ आर्टिस्टहैं, जो मिट्टी से आर्ट बनाते हैं। मिट्टी से ही तो जीवन है और मिट्टी उनकी आर्ट को भी जीवंत कर देती है। अलग-अलग मिट्टी से 24 तरह के शेड बना लेते हैं। आयुष ने बताया कि जब कभी भी गोपेश्वर जाते हैं तो रास्ते में उनको पहाड़ की मिट्टी काफी आकर्षित करती हैं।
वो बस या टैक्सी से घर जाते हैं, इसलिए रास्ते में रूक कर अपनी जरूरत के अनुसार मिट्टी की पहचान नहीं कर पाते, लेकिन जब भी वो कभी अपने वाहन से जाएंगे तो रास्ते भर में रूक रूक कर मिट्टी से मुलाकात करेंगे। कहते हैं कि मुझे मिट्टी में रंग दिखते हैं। तब मुझे मिलेंगे एक से बढ़कर एक शेड, जो आर्ट को एक अलग ही लेवल तक ले जाएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
आयुष ने अपना आर्ट वर्क दिखाते हुए बताया कि उनको ओल्ड फेस बनाना ज्यादा पसंद हैं, इन पर काफी वर्क होता है और आपको अपनी कला दिखाने का बेहतर अवसर मिलता है। हमने उनसे आर्ट वर्क पर पिंक और कुछ कुछ से रेड शेड पर जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि यह गोमूत्र है। गोमूत्र से बने शेड भी मिट्टी की तरह नेचुरल व स्थाई होते हैं। यह तो जितना पुराना होता जाएगा, उतना इसमें निखार आएगा। वहीं गोमूत्र जितना अधिक पुराना होगा, उससे बनने वाले चित्र में उतना ही अधिक निखार होगा। धूपबत्ती की राख भी कलर की तरह इस्तेमाल करते हैं।
आयुष कहते हैं कि क्लास 5 से आर्ट बना रहे हैं। उनके भाई पीयूष फोटोग्राफी करते हैं। वो वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के अनुभव ले रहे हैं। बताते हैं कि माता पिता ने उन दोनों पर करिअर चुनने के लिए कभी कोई दबाव नहीं बनाया। उन्होंने तो एकेडमिक से ज्यादा आर्ट कंपीटिशन में बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करते रहे। बताते हैं कि स्कूल लेवल के कंपीटिशन में मैं फर्स्ट औऱ भाई सेकेंड आता थे। हमारी पहचान आर्ट कंपीटिशन के विजेताओं के रूप में हो गई।
हमने तय कर लिया कि हमें भविष्य में क्या करना है। पापा ने अपनी तनख्वाह से हम माह कुछ न कुछ बचत करके हमें एक लैपटॉप,कैमरा और जरूरत का सामान खरीदकर दिया। पापा ने हमें नहीं बताया था कि हमारे लिए कुछ पैसों की सेविंग कर रहे हैं। एक दिन उन्होंने हमें पैसे दिए और कहा, अपनी जरूरत की चीजें खरीद लो। माता पिता से हमेशा सहयोग मिला और आज दोनों भाई आसिम विहार में कमरा लेकर अपने सपनों को पूरा करने के लिए जी जान से जुटे हैं।
तक धिनाधिन की ओर से आयुष और पीयूष को बहुत सारी शुभकामनाएं। उनके सपनों को बहुत जल्द पंख लगेंगे इसी सुखद कामना के साथ, अगली बार फिर मिलते हैं किसी और पड़ाव पर।
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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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