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देवस्थानम बोर्ड पर हरीश रावत बोले, केवल जिद से सरकारें नहीं चलतीं

देहरादून। देवस्थानम बोर्ड पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि कुछ पक्ष में तो एक बड़ी संख्या देवस्थानम बोर्ड के विरोध में खड़ी है। सरकार दो साल में राज्य को यह नहीं समझा पाई कि देवस्थानम बोर्ड बनाने से मंदिरों की व्यवस्था में क्या सुधार आएगा और इससे क्या फायदा होगा।

सोशल मीडिया पर रावत ने कहा कि केवल आय के लिए यदि पुरानी परंपरा को बदल रहे हैं तो वो न्याय संगत नहीं है। उसके पीछे चारधाम यात्रा को सुगम और सुचारू बनाने की सोच होनी चाहिए और उसमें यात्रियों का हित सर्वोपरि माना जाना चाहिए, फिर स्थानीय लोगों का हित सर्वोपरि माना जाना चाहिए।

उनका कहना है कि केवल जिद से सरकारें नहीं चलती हैं। एक प्रयोग किया आपने और यदि उस प्रयोग के नतीजे बहुत लाभकारी नहीं दिखाई दे रहे हैं तो फिर अपने ही राज्य की जनता के एक हिस्से पर अपने विचार व निर्णय को थोपना, राज्य सरकार के लिए उचित नहीं है।

रावत का कहना है कि पहले से ही मंदिर कमेटियां बनी हुई हैं, आप उनकी फंक्शनिंग को और सुधार लीजिए। आय अर्जन के लिए कुछ और तरीके निकाल करके, उन तरीकों को मंदिर कमेटी और पुरोहितगणों की संस्था के साथ मिलकर के क्रियान्वित करिए।

उन्होंने कहा कि मगर अभी तक मैं यह नहीं समझ पाया हूंँ कि देवस्थानम बोर्ड बनने से कौन सा क्रांतिकारी परिवर्तन हमारी चारधाम यात्रा में आया है?

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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