अखबारों में डेस्क और रिपोर्टिंग वालों के बीच बहसबाजी होती रहती है। हालांकि अखबारों में डेस्क को सर्वोपरि माना जाता है, पर कई बार ऐसा नहीं होता। क्योंकि यह कुल…
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यह कॉलम जिंदगी के हर उस आयाम को छूने की कोशिश है, जिनसे आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और वैचारिक रूप से भी समृद्धता हासिल होती है। इसमें ग्रामीण भारत, खासकर उत्तराखंड के विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले गांवों तक पहुंचने का प्रयास किया गया है।
एक युवा बहुत सारे सपने लेकर पत्रकारिता में आता है। उससे पूछो, तुम पत्रकारिता में क्यों आए, जवाब मिलेगा। मैं बदलाव करना चाहता हूं। मैं मुद्दों को आवाज़ देना चाहता…
Read More »आज चार साल बाद भी कुछ लोग मुझसे पूछते हैं, तुमने पत्रकारिता क्यों छोड़ी। मेरा जवाब सिर्फ एक लाइन में होता है, अखबार छोड़ा है, पत्रकारिता नहीं। पत्रकारिता तो शरीर…
Read More »भानियावाला से ऋषिकेश या हरिद्वार की ओर बढ़ने के साथ-साथ कई किलोमीटर तक आप टिहरी विस्थापित क्षेत्र से होकर सफर कर रहे होते हैं। यहीं है सुनार गांव, जो बेहद…
Read More »राजेश पांडेय कमरा निर्जीव है और मैं सजीव, क्योंकि विज्ञान ऐसा कहता है। माफ करना! मैं यहां विज्ञान को नहीं मानता, अपने कमरे के मामले में तो बिल्कुल भी नहीं।…
Read More »1997 में मेरठ वाले अखबार देहरादून से प्रकाशित होने लगे। अब तो देर रात तक की कवरेज सुबह के अखबार में दिखने लगी। हालांकि काफी समय तक डेस्क मेरठ में…
Read More »टेक्नोलॉजी के बिना जर्नलिज्म नहीं हो सकती। टेक्नोल़ॉजी ने दूसरे दिन का इंतजार कराने वाली जर्नलिज्म को रियल टाइम रिपोर्टिंग (आरटीआर) तक पहुंचा दिया,जिसमें केवल क्लिक की देर है। अगर…
Read More »लगभग निर्जीव हो चुका हूं। अब तो शरीर ने भी मेरा साथ छोड़ दिया। मेरे दबे कुचले शरीर में रक्त की कल्पना नहीं की जा सकती। अब मैं इस पर…
Read More »उस रात, मैं धरती से बाहर आया था। हां भाई हां, उसे धरती से बाहर आना नहीं कहते, अंकुरित होना बोलते हैं, अब ठीक कहा न मैंने। वो उजाले वाली…
Read More »शब्दों में गजब की ताकत है, भले ही वो किसी काे तिरस्कृत करने के लिए या फिर पुरस्कृत करने के लिए हों। यह उस पर निर्भर करता है, जो सुन…
Read More »राजेश पांडेय मैं अपने बेटे के साथ दशहरा मेला देखने गया। बाइक कहां खड़ी करेंगे, इस सवाल का जवाब नहीं मिला तो दो किमी. पैदल ही चलने का फैसला किया।…
Read More »पड़ोस का कल्लन अब बड़ा आदमी हो गया। मुझे याद है पांचवीं के पेपरों में नकल करते पकड़ा गया था। भाई ने तभी से कसम खा ली थी कि जब…
Read More »पांचवी क्लास की पिटाई अब तक नहीं भूला। कभी राइटिंग खराब होने के नाम पर तो कभी होमवर्क पूरा नहीं करने के नाम पर, अक्सर पिटता। मेरे स्कूल में शहतूत…
Read More »मैं आज 17 मई, 2018 दोपहर अपने दोस्त के साथ देहरादून ट्रांसपोर्टनगर से आईएसबीटी होते हुए रिस्पना पुल की ओर जा रहा था। आईएसबीटी पर पानी की बोतल खरीदने के…
Read More »आपसे एक घटना शेयर करना चाहता हूं, जो मुझे उस समय अचानक याद आ गई, जब मैंने उस युवा को चौक बाजार में अपना व्यवसाय करते हुए देखा। वह जब भी…
Read More »करीब एक साल पहले मैं कुछ बच्चों को पढ़ाता था। इनमें क्लास छह का एक बच्चा ऐसा भी था, जो हमेशा कोई न कोई बहाना बनाता और महीने में दस…
Read More »इन दिनों कुछ लोग मुझे देश की आर्थिक स्थिति गड़बड़ाने, नोटबंदी से नुकसान होने, लोगों की नौकरियां छीने जाने, महंगाई बढ़ने, रोजमर्रा की वस्तुओं के रेट जीएसटी की वजह से…
Read More »शहर के एक खाली मैदान में मजमा लगा था। भीड़ बढ़ती देखकर मजमे वाले को खूब मजा आ रहा है। जैसे-जैसे लोगों को मैदान में आता देखता, उसका जोश और…
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