चमोली, 2 सितंबर, 2026ः उत्तराखंड के चमोली जिले के दसोली विकासखंड अंतर्गत ग्राम मठ झडेता (बेडूमाथल) में पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका संवर्धन की दिशा में एक अहम पहल की गई। ‘एम्पावर सोसाइटी’ (Empower Society) के तत्वावधान में अगस्त माह में अंतिम सप्ताह में आयोजित पांच दिवसीय सघन अभियान के दौरान चार हेक्टेयर चयनित भूमि पर रिंगाल के 2,000 उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का वैज्ञानिक पद्धति से सफल रोपण किया गया। इस रोपण कार्य में गोल रिंगाल, मलिंगा रिंगाल और भटपुत्रा जैसी प्रमुख स्थानीय प्रजातियों के राइजोम से तैयार पौधों को शामिल किया गया है।
इस पूरे अभियान की सबसे उल्लेखनीय विशेषता स्थानीय कारीगरों की सक्रिय भागीदारी रही, जिसमें 75 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं की रही। अभियान में 30 महिला और 10 पुरुष कारीगरों समेत कुल 40 लोगों ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई। स्थानीय स्तर पर रिंगाल उत्पादन को बढ़ावा मिलने से भविष्य में हस्तशिल्पियों को दूर-दराज के जंगलों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और उन्हें अपने गांव के समीप ही गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल सुलभ हो सकेगा।
एम्पावर सोसाइटी की सचिव मोनीदीपा सरमा ने बताया, काश्तकारों को पौधों की सुरक्षा और उचित रखरखाव के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से प्रति पौध 240 रुपये की प्रोत्साहन राशि तय की गई है। कुल 4 लाख 80 हजार रुपये की इस परियोजना के तहत राशि का भुगतान तीन पारदर्शी किस्तों में सीधे काश्तकारों को किया जा रहा है। रोपण कार्य पूरा होते ही 50 प्रतिशत (2,40,000 रुपये) की पहली किस्त जारी कर दी गई है, जबकि एक वर्ष बाद 30 प्रतिशत और तीन वर्ष पूरे होने पर शेष 20 प्रतिशत राशि पौधों की वृद्धि और न्यूनतम 60 से 65 प्रतिशत जीवितता दर (Survival Rate) के भौतिक सत्यापन के आधार पर दी जाएगी।
परियोजना में पारदर्शिता और वैज्ञानिक निगरानी सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग किया गया है। रोपण क्षेत्र का जीपीएस (GPS) टैग युक्त डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने के साथ-साथ अत्याधुनिक ड्रोन कैमरों के माध्यम से फोटो और वीडियो दस्तावेजीकरण किया गया। इसके साथ ही वित्तीय वर्ष 2021-22, 2022-23 और 2024-25 में किए गए पूर्व रिंगाल रोपण क्षेत्रों का भी ड्रोन सर्वेक्षण कर मूल्यांकन किया गया।
एम्पावर सोसाइटी के तकनीकी प्रमुख (हैंडीक्राफ्ट एवं हैंडलूम) राजेश लाल के अनुसार, यह कार्यक्रम केवल पौधरोपण तक सीमित न होकर एक स्थायी ‘वैल्यू चेन’ मॉडल पर आधारित है। लगभग चार वर्षों में यह फसल परिपक्व होकर टोकरियों, डलिया, लैंप शेड और आधुनिक व पारंपरिक सजावटी उत्पादों के निर्माण के लिए तैयार हो जाएगी। इससे जहां एक ओर काश्तकारों को कच्चे माल की बिक्री से नियमित आय होगी, वहीं दूसरी ओर स्थानीय कारीगरों को उत्पाद निर्माण और विपणन से दीर्घकालिक स्वरोजगार प्राप्त होगा।



