देहरादून, 29 अगस्त, 2026 । राजेश पांडेय
Sindhwal village migration:“करीब 65 साल के प्रताप सिंह का बचपन सिंधवाल गांव में ही बीता। कहते हैं, हमारा गांव सबसे सुंदर है, हमें तो यहीं अच्छा लगता है। कई परिवार यहां से पलायन कर गए, कुछ ही यहां रह रहे हैं, जो एक दूसरे के भरोसे हैं। पशुओं के लिए चारा लाने, उनको चराने में किसी तरह दिन तो बीत जाता है, पर शाम होते ही बेचैनी बढ़ जाती है। घर में बिजली है, पर बाहर लाइट नहीं होने से घुप अंधेरा छा जाता है। यहां जंगली जानवरों का भी खतरा रहता है। कई बार बघेरा यहां घूमता दिख जाता है। जब भी दिखता है तो शोर मचाकर एक दूसरे को सतर्क कर देते हैं।”
बेहद चौंकाने वाले ये हालात उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से लगभग 30 किमी. दूर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाली सिंधवाल ग्राम पंचायत के हैं। परिस्थितियां भले ही विषम हों, पर सिंधवाल ग्राम पंचायत बेहद सुंदर नजारे पेश करती है। इसके साथ ही, यह बात भी स्पष्ट है कि सरकार का सिस्टम इन गांवों की ओर ध्यान नहीं दे रहा। लगभग चार साल बाद हम एक बार फिर सिंधवाल गांव की यात्रा पर थे। मौके पर हालात पहले से ज्यादा खराब ही दिखाई दिए। बिधालना के पुल से सिंधवाल गांव तक लगभग डेढ़ से दो किमी. रास्ता बदहाल है। यहां 10 से 15 परिवार रहते थे। वर्तमान में यह संख्या तीन तक सिमट गई है। इससे ऊपर कोलधार गांव में रहने वाले परिवारों के भी शहर की ओर रुख करने की जानकारी मिली। यहां आसपास ठोठन, पलियाडांडा, रिवाण, सूर्यधार, बडवाली, कोलधार गांव हैं। इन गांवों से पलायन की कहानी पर्वतीय जिलों के दूरस्थ गांवों जैसी ही है। वर्षों से सिंधवाल गांव के निवासी सड़क की मांग कर रहे थे, वो नहीं मिली तो उन्होंने पलायन करने का फैसला लिया।
Sindhwal village migration: सिंधवाल गांव में एक प्राइमरी स्कूल है, जहां बच्चों की संख्या दहाई का अंक भी पार नहीं कर रही है। यहां पांचवी क्लास पास करते ही बच्चों को लगभग डेढ़ से दो किमी. दूर दूसरे हिस्से में स्थित हाईस्कूल में जाना होता है या फिर थानो स्थित इंटर कॉलेज में। थानो यहां से लगभग तीन से चार किमी. की दूरी पर है। बुखार की दवा भी थानो में ही मिलती है।
सिटीजन जर्नलिस्ट मुकेश पंत के साथ 26 अगस्त, 2026 को सिंधवाल गांव तक पहुंचने तक घने बादल छा गए थे। गांव में प्रवेश से पहले ही तेज बारिश और फिर कुछ देर में बूंदाबांदी से सामना हुआ। यहां का तापमान थानो क्षेत्र से कम ही होगा, ऐसा हमने महसूस किया। बारिश में ही किसी तरह अमित सिंधवाल के घर पहुंच गए। उनके छोटे भाई आशीष उस वक्त घर में थे, उनसे हमारी पहली मुलाकात थी, पर उन्होंने हमें बारिश से बचने के लिए घर में बुलाकर बैठाया और कुछ देर में गर्मागर्म चाय पिलाई। आंगन से लेकर खेतों और दूर तक दिखते पहाड़ों पर बारिश को देखने के साथ चाय की चुस्कियां…इससे ज्यादा आनंद की बात क्या हो सकती है। इस परिवार से मेरी मुलाकात चार साल बाद हो रही थी। उस समय हम आशीष के बड़े भाई अमित की पत्नी किरण, जो उपप्रधान भी रही हैं, के साथ पशुओं के चारे का भारी गट्ठर लेकर उनके घर तक आए थे। उस समय हम पर्वतीय गांवों में पशुपालन कर रहीं महिलाओं की चारा पत्ती इकट्ठा करने के दौरान कठिन मेहनत और उनके संघर्ष की कवरेज के लिए आए थे।
Sindhwal village migration:अमित बताते हैं, उनके पास एक गाय और एक भैंस है। अब चारा लेने के लिए किरण को लगभग डेढ़ किमी. दूर कोलधार तक नहीं जाना पड़ता। उन्होंने घर के पास ही चारे का इंतजाम किया है। नैपियर (हाथी घास) लगाई है, इससे काफी चारा मिल जाता है। हाथी घास पशुओं को पसंद भी है। मिट्टी को बांधने वाली इस घास के कुछ नुकसान भी हैं, इसकी जड़ों की नीचे चूहे अपने बिल बना रहे हैं। आसपास के जंगलों से आने वाले बंदरों, सुअरों के साथ चूहे भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।
बताते हैं, गाय और भैंस कुल मिलाकर दोनों टाइम छह लीटर दूध देते हैं। इसमें से दो लीटर पास के ही एक गांव में शाम के वक्त देने जाते हैं। दूध का दाम 50 रुपये लीटर है। बाकी दूध घर में इस्तेमाल करते हैं।
Sindhwal village migration:सिंधवाल गांव तक जाने के लिए प्रदेश सरकार ने बिधालना नदी पर पुल बनाया। यह ग्रामीणों के साथ उन लोगों के लिए भी राहत की बात रही, जिन्होंने कठिन भौगोलिक परिस्थितियां होने के बावजूद गांव में जमीन खरीदकर आलीशान भवन बनाए हैं। ये आलीशान निर्माण स्थानीय ग्रामीणों के नहीं हैं। सिंधवाल गांव में वर्षों से रह रहे परिवारों के पलायन के बीच उन लोगों की चर्चा भी हो रही है, जो यहां बड़ी बिल्डिंग्स बना रहे हैं और जमीनों पर पैसा इन्वेस्ट कर रहे हैं। यह बात सोचने पर तो मजबूर करती है कि जिन दुर्गम पर्वतीय इलाकों में बुनियादी सुविधाएं तक मौजूद नहीं हैं, वहां इन्वेस्टमेंट की वजह आखिर क्या हो सकती है। सरकार की होमस्टे की योजना से रोजगार का लाभ स्थानीय ग्रामीणों को क्यों नहीं मिल पाया। क्या सरकारी तंत्र ग्रामीणों को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित नहीं कर पाया। एक और बात, पुल बनाने के बाद भी सड़क को गांव तक नहीं पहुंचाना समझ से परे है। हालांकि, ग्रामीण बताते हैं कि पुल से गांव तक सड़क निर्माण की तैयारी हो रही है, क्योंकि सर्वे के लिए अधिकारी यहां आए थे।
सिंधवाल और उसके आसपास के गांवों तक सड़क के साथ रोजगार और शिक्षा- स्वास्थ्य भी बड़े मुद्दे हैं, जिन पर बात नहीं होती। यहां रहने वाले अधिकतर युवा देहरादून और जौलीग्रांट व अन्य इलाकों के निजी संस्थानों में सेवाएं देते हैं। दिन रात की शिफ्ट में काम करते हैं। ऊबड़ खाबड़ खतरनाक रास्तों पर नौकरी के लिए दिन रात बाइक से चलना जोखिम से भरा है। गांवों से पलायन की प्रमुख वजह रोजगार ही है।

सिंधवाल गांव में तीन परिवार हैं, जिनमें अमित सिंधवाल और आशीष सिंधवाल दोनों भाई अपने परिवारों और मां शकुंतला देवी के साथ रहते हैं। दोनों भाई प्राइवेट जॉब करने देहरादून और जौलीग्रांट जाते हैं। आशीष बताते हैं, उनकी शिफ्ट बदलती रहती है। रास्ता काफी जोखिम वाला है, पर क्या करें नौकरी करनी है तो यह रिस्क उठाना पड़ेगा।
करीब 40 वर्षीय अमित सिंधवाल बताते हैं, “उनको अपने बेटे अंश, जो कि क्लास 6 का छात्र है, को करीब दो किमी. दूर स्थित हाईस्कूल में छोड़ने जाना पड़ता है। वो इसलिए, क्योंकि रास्ता खराब है और जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। बच्चे को स्कूल छोड़ना और वहां से लाना रोजाना का काम है। अगर हम बाहर किराये पर कमरा लेकर रहेंगे तो काफी खर्चा वहन करना पड़ेगा, इसलिए खतरा मोल लेकर इसी रास्ते पर आते जाते हैं।”

अमित के घर से करीब 100 मीटर दूरी पर बुजुर्ग प्रताप सिंह और सुशीला देवी का घर है। प्रताप सिंह कहते हैं, “हमारा गांव सबसे सुंदर है, हमें तो यहीं अच्छा लगता है। दिल्ली में जॉब करने वाला बेटा समय समय पर आता रहता है। बेटियों की शादी कर दी। यहां रहने वाले दोनों परिवार एक दूसरे के भरोसे हैं। उनके साथ क्लास 9 में पढ़ने वाला नाती शौर्य रहता है, जो थानो इंटर कॉलेज में पढ़ने के लिए रोजाना छह से आठ किमी. पैदल चलता है। शौर्य बताते हैं कि कभी कभार यहां से बाइक पर लिफ्ट भी मिल जाती है, वैसे अक्सर पैदल ही चलते हैं।”
“हम यहां से कहीं नहीं जा सकते, क्योंकि हमारे पास शहर में कोई जमीन नहीं है। न वहां कोई साधन है और न ही यहां कोई साधन है। गांव तक सड़क नहीं होने से हमें काफी परेशानियां उठानी पड़ती हैं। बरसात में हाल बहुत खराब हो जाते हैं। प्रताप सिंह कहते हैं।”

वापस लौटते हुए हमें बाइक से सिंधवाल ग्राम पंचायत के हाईस्कूल के पास रहने वाले युवा दिनेश सोलंकी मिले। दिनेश जौलीग्रांट में प्राइवेट नौकरी करते हैं। रोजाना दोनों तरफ करीब 12 किमी. ऊबड़ खाबड़ जोखिमवाले रास्ते से होकर आते- जाते हैं। बताते हैं, “यहां जंगली जानवरों का भी खतरा है। करीब डेढ़ महीने पहले गांव के आसपास भालू देखा गया था। इससे पहले चार भालू एक साथ देखे गए। जब उनसे पूछा कि पलायन हो रहा है, क्या आप भी पलायन कर जाएंगे। उनका जवाब था, यदि सुविधाएं नहीं होंगी तो उनको भी पलायन करना पड़ेगा। न तो यहां रोजगार के साधन हैं और न ही सुरक्षा के उपाय। इन रास्तों पर हर समय जोखिम बना रहता है, ऐसी स्थिति में कोई यहां क्यों रहेगा।”
सिंधवाल ग्राम पंचायत के प्रधान प्रतिनिधि प्रदीप सिंधवाल कहते हैं, “सिंधवाल गांव के हाईस्कूल तक पीएमजीएसवाई से करीब छह किमी. सड़क का पहला सर्वे हो रहा है। वहीं, सनगांव- सिंधवाल गांव- नाहींकलां तक नौ किमी. रोड स्वीकृत है, इसकी प्रक्रिया चल रही है। ग्राम पंचायत की भौगोलिक स्थिति काफी विषम है। लगभग 15 किमी. सड़कों का निर्माण होना है। काफी भागदौड़ के बाद ग्राम पंचायत में दो किमी. पक्के रास्ते का निर्माण स्वीकृत कराया है। उनका स्पष्ट कहना है कि गांव में सड़क के साथ रोजगार और शिक्षा बड़े मुद्दे हैं, जिन पर गंभीरता से काम होना चाहिए। युवाओं के पास रोजगार नहीं है, इसलिए उनको गांव छोड़ना पड़ रहा है।”



