Rishikesh road tree cutting: राजेश पांडेय, देहरादूनः पेड़ राजनीति नहीं करते और न ही पेड़ों के वोट होते हैं। पेड़ न तो किसी लॉबिंग का हिस्सा हैं और न ही उन्हें किसी तरह के सम्मान या पद की कोई आस है। वो तो खड़े रहते हैं एक जगह पर, संभाले रहते हैं अपने भीतर और आसपास की जैवविविधता को।
पेड़ों की दुनिया सबसे अलग है, वो इंसानों से बहुत अलग हैं। उनको न तो किसी के साथ छल करना आता है और न ही अपने स्वार्थों को पूरा करना। पेड़ थोड़ा नहीं बहुत जिद्दी होते हैं, उनकी जिद्द यही है कि प्राण निकल जाएं, धरती से जड़ सहित जुदा हो जाएं, पर परोपकार करना नहीं छोड़ेंगे। धरती पर उनकी नियुक्ति कहें या स्थापना की वजह सिर्फ और सिर्फ परोपकार ही है। पर, जिनके लिए वो जीवनभर जमीन से जुड़कर खड़े रहने का त्याग कर रहे हैं, क्या वो उनकी फिक्र करते हैं। इंसानों को जहां रफ्तार दिखती है या फिर अपनी तरक्की…,उनके सामने एक ही सवाल होता है, कि इन पेड़ों को कैसे हटाएं।
Rishikesh road tree cutting:पेड़ों को हटाने का प्रपंच हमेशा से रचा जाता रहा है, उन पर घर से लेकर मॉल, बिल्डिंग बनाने और सड़कों को चौड़ा करने के लिए हमेशा कुल्हाड़ियां और आरे चले हैं। बाग-जंगल क्या हैं इंसानों की तरक्की के सामने। इंसानों के वोट होते हैं और वोट राजनीतिक दलों की धड़कन हैं, इसलिए पेड़ों का कटना तय होता है, क्योंकि सरकार वोटों से ही तो बनती है।
सड़क के लिए पेड़ों को काटने का ताजा मामला ऋषिकेश रोड पर सात मोड़ का है। नाम से ही पता चलता है कि यहां सड़क मुड़ी हुई है, एक नहीं पूरे सात बार।
यहां तीन हजार से ज्यादा पेड़ों को काटा जाना है, वो इसलिए क्योंकि मुड़ी हुई सड़क पर आरोप है कि वो दुर्घटनाओं की वजह है और यहां इंसानों की स्पीड कम हो जाती है। सरकार को बार बार मुड़ने वाली यह सड़क बिल्कुल भी पसंद नहीं थी। सरकार को अच्छा नहीं लग रहा कि उसके सामने कोई आड़ा-तिरछा मुड़ा हुआ हो। वो तो किसी को भी सीधा कर सकती है, चाहे रोड ही क्यों न हो। अब तो इसको सीधा करने की वजह भी मिल गई। तो शुरू हो गई सड़क को सीधा करने की कार्यवाही।
Rishikesh road tree cutting:सड़क को सीधा करने में बाधा बन रहे हैं वो निर्दोष पेड़, जो सड़क के किनारे खड़े होकर आते जाते लोगों को देखते हैं। बस फिर क्या था सड़क से दोस्ती करने वाले पेड़ों को काटने का फरमान सुना दिया गया। पेड़ बेचारे क्या करें, वो कुछ कर भी नहीं सकते, सिर्फ और सिर्फ ऑक्सीजन और स्वच्छ हवा पानी देने के।
इस भागदौड़ वाली जिंदगी में… न तो किसी को ऑक्सीजन चाहिए और न ही साफ हवा पानी…., सभी को चाहिए रफ्तार…जी हां…विकास की रफ्तार। सरकार कहती है, उतने पेड़ लगाएंगे, जितने काट दिए। दिनरात वो पेड़ लगाने में ही तो जुटी है, कभी मां के नाम पर एक पेड़ तो कभी पर्यावरण के नाम पर एक पेड़। थोड़े बहुत कट भी गए तो क्या फर्क पड़ता है। यह तो वो बात हो गई… न खाता, न बही, सरकार ने जो कहा, वही सही।
वर्षों से सड़क किनारे खड़े पेड़ों पर आते जाते इंसानों की नजर हमेशा पड़ती रही है। जब नजर में आ ही गए हैं तो कटने के लिए भी इनको तैयार रहना होगा, इस बात का नोटिस पेड़ों को पहले ही दिया जा चुका था। उन पर लगा दिए गए थे लाल-पीले निशान।
अब पेड़ों को लेकर इंसान दो भागों में बंट गए, एक वो जो सरकार के पक्ष में हैं और दूसरे वो जो पेड़ों के साथ खड़े हैं। वो पेड़ों को रक्षा सूत्र बांध चुके हैं और उनसे लिपटकर दुख जता चुके हैं। पर, इस कतार में खड़े लोगों की संख्या कम है, जबकि पेड़ के विरोधियों की संख्या अधिक है…इतनी अधिक कि आप गिनती नहीं कर पाओगे… हो सकता है कि वो संख्याबल में जंगल में खड़े पेड़ों से भी ज्यादा हों। इसलिए, पेड़ों के हमदर्दों से सरकार को भी कोई हमदर्दी नहीं है।
सरकार तो सर्वशक्तिमान होती है, सर्वज्ञाता होती है, जो पहले से ही सबकुछ जानती है। सरकार को पता है कि इन पेड़ों को काटने से वोटों की गिनती कम नहीं होने वाली, क्योंकि वो विकास कर रही है और उसके विकास का रास्ता पहाड़ों को काटकर, पेड़ों को हटाकर ही तय होता है।
पेड़ तो लोकतंत्र की सरकारों से पहले ही धरती पर आ गए थे, इसलिए वो भी जानते हैं कि कुछ नहीं होने वाला। सरकार ने जो तय कर लिया, वही होगा…, क्योंकि सरकार का तंत्र लोक पर भारी पड़ता है।



