Children School and Creativity: देहरादून, 27 जून, 2026ः दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने अंकुर मंच के सहयोग से ‘बच्चे, स्कूल एवं रचनात्मकता’ विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया और बच्चों की रचनात्मक गतिविधियों पर केंद्रित अंकुर पत्रिका का लोकार्पण किया। गोष्ठी में संपादक, प्रकाशक और बाल साहित्य के अध्येता प्रबोध उनियाल ने कहा कि रचनाशील समाज कभी संतुष्ट नहीं होता। वह तो सदैव बेहतरी के लिए विचारशील और सक्रिय बना रहता है। ऐसा समाज यथार्थ का अध्ययन करते हुए भविष्य को और प्रगतिशील बनाने का निरंतर प्रयास करता रहता है। बच्चे, शिक्षक, स्कूल और रचनात्मकता ही किसी स्वस्थ समाज के चार सशक्त स्तम्भ हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूल में रचनात्मकता के अवसर बढ़ाए जाएं।
‘बच्चों का नज़रिया’ के पूर्व संपादक एवं काव्यांश प्रकाशन के स्वामी प्रबोध उनियाल ने बतौर मुख्य वक्ता कहा, यह समय मिलकर सोचने और समझने का है। नई पीढ़ी की आंखों में बेहतर कल के लिए नए और कई महत्वाकांक्षी सपने हैं। उनके सपनों को साकार करने के लिए हमें बड़े अवरोधक नहीं, सहायक की तरह उनका साथ देना होगा। आज मैदान घर के आंगन में सिमट गए हैं। पढ़ाई, ट्यूशन, कोचिंग के बीच बालमन गुमसुम और उदास हो गया है। बच्चों की पीठ भारी-भरकम बस्ते से लदी है। प्रतिस्पर्धा के साथ अनिश्चितता बच्चों को व्यथित कर रही है। पाठ्यक्रम का बोझ उन्हें परेशान करता है। ये भयावह स्थिति है। ऐसे में अभिभावकों, शिक्षकों, लेखकों को इस दौर के बच्चों में अच्छे विचार, कल्पना और नवसृजन के लिए रचनात्मकता के अवसर देने होंगे।
Children School and Creativity: अंकुर के अध्यक्ष एवं शिक्षक मोहन चौहान ने कहा कि हम शिक्षकों का मानना है कि रचनात्मकता ही है, जो हमें अन्य जीवों से अलग करती है। रचनात्मकता साहित्य,कला, संगीत तक सीमित नहीं है। यह कौशल है। छात्रों में लीक से हटकर सोचने और उनकी समस्याओं,उलझनों को सुलझाने का हुनर भी है। रचनात्मकता से ही जटिलता सरलता में बदली जा सकती है। हमारा मानना है कि अभिभावकों, छात्रों और शिक्षकों की त्रिवेणी स्वच्छ और निर्मल समाज स्थापित कर सकती है। प्रत्येक छात्र रचनात्मकता के सहारे स्वतंत्र सोच का निर्माण करते हुए मौलिक कार्यों की ओर बढ़ सकता है।
असिस्टेंट प्रोफेसर एवं कवियित्री रेखा चमोली ने कहा, बुनियादी कक्षाओं में नौनिहालों को लिखने की यात्रा कराने से पहले बोलने,सुनने और पढ़ने का अधिक ले अधिक अवसर देना बेहद जरूरी है। ऐसा जिन विद्यालयों में होता रहा है, वहां के विद्यार्थी स्वस्थ और सकारात्मक योगदान देते हैं।
संचालन कर रहे शिक्षक प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’ ने कहा, किसी भी देश की प्रगति के लिए पढ़ा-लिखा समाज अहम भूमिका निभाता है। लेकिन, यह भी सच है कि एक सुंदर, विकसित सभी के लिए सुलभ सुविधाओं से युक्त समाज को बनाने में रचनाशीलता सबसे जरूरी तत्व है। पत्रिका की छात्र संपादक रहीं प्रियांशी ने कहा, अंकुर पत्रिका रचना सामग्री का पुलिंदा मात्र नहीं है। यह शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों की साथ-साथ की गई यात्रा है। लेखन कौशल को बनाने और संवारने में शिक्षकों की पुरजोर कोशिश का कोई मोल नहीं है।
साहित्यकार एवं शिक्षक मनोहर चमोली ‘मनु’ ने कहा, अंकुर पत्रिका के चौथे अंक में राजकीय इंटर कॉलेज खरसाड़ा के 173 विद्यार्थियों ने रचनाएं लिखीं। अंकुर से जुड़े शिक्षक विद्यालयों में बाल लेखन कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। उन्हें विभिन्न विधाओं से परिचित कराते हैं। हस्तलिखित पत्रिका के साथ यदि संभव होता है तो विद्यालयी स्तर पर पत्रिका के प्रकाशन में सहयोग करते हैं। यह विद्यार्थियों की कल्पना, संवेदना और अभिव्यक्ति का अभिलेखीकरण तो होता ही है, साथ ही नई पीढ़ी पढ़ने-लिखने की ओर उन्मुख होती है। शिक्षक एवं चाय पे चर्चा के स्तंभकार सतीश जोशी ने कहा कि रचनात्मक लेखन छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के मध्य एक खास कड़ी का काम करता है। समुदाय में पढ़ने-लिखने का महत्व हर काल में रहा है। यह अब और भी जरूरी हो गया है।
Children School and Creativity: दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने केंद्र के उद्देश्यों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज बच्चों में मौलिक लेखन की आदत विकसित करना चुनौतीपूर्ण तो है, पर इसे करना होगा। चर्चा से पूर्व अंकुर पत्रिका का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण अवसर पर अंकुर टीम के साथ-साथ दून के साहित्यकार मुकेश नौटियाल, राजेन्द्र पुरोहित,राकेश पोखरियाल, जन कवि अतुल शर्मा, रंजना शर्मा, रेखा शर्मा, डॉ. ललिता प्रसाद, धर्मेन्द्र आर्य, सीमा चौहान, विजय लक्ष्मी सेमल्टी, सुरेंद्र दत्त सेमल्टी, अशर्फी ठाकुर, इंद्रेश नौटियाल, विजय भट्ट, गीता, प्रवीन भट्ट, सुनीता मोहन, कीर्ति भंडारी, सुन्दर सिंह बिष्ट उपस्थित रहे।



