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पौधे सूखकर मुरझा जाएं तो कैसे करें बचाव

उकठा रोग के कारण मिर्च , शिमला मिर्च, टमाटर, बैंगन ,कद्दू वर्गीय सब्जियों की पत्तियां अचानक मुरझा कर झुक जाती हैं

डॉ. राजेंद्र कुकसाल
लेखक कृषि एवं औद्योनिकी विशेषज्ञ हैं
9456590999

उकठा रोग (Wilt) के कारण मिर्च , शिमला मिर्च, टमाटर, बैंगन ,कद्दू वर्गीय सब्जियां (कद्दू, लौकी) आदि में पौधों की पत्तियां अचानक मुरझाकर झुक जाती हैं तथा धीरे धीरे पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं और अन्त में पूरा पौधा पीला पड़कर मर जाता है। यदि समय रहते उपचार नहीं किया गया तो पूरी फसल सूख कर नष्ट हो जाती है।

उकठा रोग फंफूद , बैक्टीरिया ,नीमैटोड के कारण होता है। इस रोग को फ्यूजेरियम विल्ट या बैक्टीरियल विल्ट के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग मृदा एवं बीज जनित है।
मौसम में अचानक होने वाला बदलाव भी इस रोग का प्रमुख कारण है।

रोग से बचाव एवं उपचार-

1.भूमि का मृदा परीक्षण कराएं, यदि भूमि का pH मान 6 से कम है तो अन्तिम जुताई के समय एक नाली खेत में 3 से 4 किलो ग्राम बिना बुझा चूना मिट्टी में मिला दें।

2.खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करनी चाहिए, जिससे हानिकारक फफूंद तेज धूप से नष्ट हो जाए। सोलेराइजेसन कर भी भूमि को उपचारित किया जा सकता है।

3.खेत में जल निकासी का उचित प्रबंध होना चाहिए।

4.फसल चक्र अपनाएं।

5. तापमान बढ़ने (मई – जून) व वातावरण में नमी अधिक होने पर यह रोग अधिक पनपता है। बीज बुवाई के समय में परिवर्तन कर भी उकठा रोग से फसल को बचाया जा सकता है।

6. खेत की तैयारी के समय ट्रायकोडर्मा से मृदा उपचार करें। फफूंदी जनित बीमारियों की रोकथाम के लिए एक किलोग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर को 25 किलोग्राम कम्पोस्ट (गोबर की सड़ी खाद) में मिलाकर एक सप्ताह तक छायादार स्थान पर रखकर उसे गीले बोरे से ढंकें, ताकि ट्राइकोडर्मा के बीजाणु अंकुरित हो जाएं। इस कम्पोस्ट को एक एकड़( 20 नाली) खेत में फैलाकर मिट्टी में मिला दें। साथ ही, एक नाली में 40 किलोग्राम की दर से नीम की खली का भी प्रयोग करें।

7. खडी फसल में उकठा रोग आने पर रोग ग्रसित पौधों को उखाड़ कर नष्ट करें।

8. कार्बान्डाजिम (वेबस्टीन) एक चम्मच दवा तीन लीटर पानी में या कॉपर आक्सीक्लोराइड (ब्लाइटाक्स) एक चम्मच दवा दो लीटर पानी में घोल बनाकर खड़ी फसल के पौधों की जड़ों को तर करें। पांच दिनों के अन्तराल पर फिर किसी एक दवा का प्रयोग करें। एक ही दवा बार बार न प्रयोग करें।

समय समय पर स्ट्रेप्टोसाइकिलिन की एक ग्राम मात्रा 3 लीटर पानी में घोल बनाकर पौधों की जड़ों को तर कर उपचारित करें।

9. बोर्डो मिक्चर घोल से रोग ग्रसित पौधों की जड़ों को तर कर उपचारित करें।

बोर्डों मिक्चर कृषक स्वयं बना सकते हैं, जिसे बनाने की विधि इस प्रकार है-

80 ग्राम नीला थोथा (कॉपर सल्फेट) जिसे परचून / पन्सारी की दुकान से आसानी से खरीदा जा सकता है तथा 80 ग्राम अनबुझा चूना की निर्धारित मात्रा अलग-अलग पांच-पांच लीटर पानी में घोलें। इन दोनों घोलों को एक साथ उड़ेलते हुए तीसरे बर्तन में मिश्रित करें। यही मिश्रण बोर्डो मिश्रण है।

मिश्रण को बनाने के लिए कांच , मिट्टी अथवा प्लास्टिक के बर्तनों का ही प्रयोग करें, धातु से बने बर्तन का प्रयोग न करें, ताकि नीला थोथा में विद्यमान तांबा धातु के साथ बर्तन की धातु की कोई प्रतिक्रिया न हो।

बोर्डो मिश्रण बनाने के बाद इसकी अम्लता का परीक्षण करना आवश्यक है, क्योंकि अम्लीय मिश्रण में तांबा धातु के स्वतंत्र कण पौधों के लिए घातक होते हैं।

अम्लता के परीक्षण के लिए मिश्रण में एक साफ और तेजधार वाला चाकू समतल अवस्था में कुछ समय के लिए डुबाएं और फिर धीरे से बाहर निकाल कर देखें। यदि चाकू की धार के ऊपर लाल भूरे रंग की कोई तह जमी दिखाई दे तो समझें कि मिश्रण अम्लीय हैं। इसलिए  इसमें और चूना मिलाकर इसे सही करें। बोर्डो मिश्रण हमेशा ताजा स्थिति में ही प्रयोग करें।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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