Super seeds vs Indigenous seeds: आधुनिक कृषि की दुविधाः ‘सुपर सीड्स’ बनाम हमारे पारंपरिक स्वदेशी बीज

Rajesh Pandey
'टिहरी गढ़वाल के कोल गांव के निवासी श्याम किशोर बिजल्वाण ने धान का लगभग सौ साल से चल रहा बीज दिखाया। फोटो- राजेश पांडेय

Super seeds vs Indigenous seeds: देहरादून, 04 अगस्त, 2025: किसान, एक तरफ आधुनिक विज्ञान की देन बायोटेक्नोलॉजी से बने ‘सुपर सीड्स’ को देखते हैं, जिनसे अधिक पैदावार की बात होती है, तो दूसरी तरफ, अपनी पीढ़ियों से संरक्षित स्वदेशी बीजों की विरासत को भी बचाए रखना चाहते हैं। यह सिर्फ बीज चुनने का मामला नहीं है, बल्कि हमारे स्वास्थ्य, पर्यावरण और कृषि के भविष्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल है।

क्या हैं ये ‘सुपर सीड्स’?

ये वो बीज हैं जिन्हें वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में विकसित करते हैं। इन्हें जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके खास गुणों के लिए तैयार किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ बीजों को सूखे और बाढ़ जैसी विषम परिस्थितियों का सामना करने के लिए, तो कुछ को कीटों और बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी बनाया जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य अधिकतम पैदावार सुनिश्चित करना और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करना है।

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सदियों की विरासत: स्वदेशी बीज

इसके विपरीत, स्वदेशी बीज हमारे किसानों की सदियों की मेहनत का परिणाम हैं। ये बीज किसी खास क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और पानी के लिए पूरी तरह अनुकूलित होते हैं। इन्हें स्थानीय किसान हर साल अपनी फसल से बचाकर रखते हैं, जिससे उन्हें बाहरी बीज कंपनियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। ये बीज न केवल फसल को प्राकृतिक रूप से मजबूत बनाते हैं, बल्कि इनमें आनुवंशिक विविधता भी अधिक होती है, जो किसी भी प्राकृतिक आपदा या बीमारी के खिलाफ एक सुरक्षा कवच का काम करती है।

सेहत की दृष्टि से दोनों में क्या अंतर है?

जब बात सेहत की आती है, तो दोनों के अपने-अपने पहलू हैं।

  • स्वदेशी बीजों का स्वास्थ्य लाभ: कई विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वदेशी बीजों से उपजी फसलें ज्यादा पौष्टिक होती हैं। ये फसलें प्राकृतिक रूप से उगाई जाती हैं, जिससे उनमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के हानिकारक अवशेष कम होते हैं। इनकी आनुवंशिक विविधता के कारण ये कई तरह के विटामिन और मिनरल से भरपूर होते हैं, जो हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद हैं।
  • ‘सुपर सीड्स’ का स्वास्थ्य लाभ: बायोटेक्नोलॉजी से बनी फसलों का एक बड़ा फायदा यह है कि वैज्ञानिक उनमें विशिष्ट पोषण तत्व जोड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए, ‘गोल्डन राइस’ को विटामिन-ए की कमी दूर करने के लिए बनाया गया था, जो कई विकासशील देशों में एक बड़ी समस्या है। इसके अलावा, कीट-प्रतिरोधी बीज जैसे बीटी कपास के इस्तेमाल से कीटनाशकों का छिड़काव कम होता है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को लाभ होता है।

निष्कर्ष: भविष्य की राह

यह कहना गलत होगा कि एक ‘सही’ है और दूसरा ‘गलत’। दोनों ही बीजों के अपने-अपने फायदे हैं। जहाँ स्वदेशी बीज हमें प्राकृतिक, पौष्टिक और टिकाऊ कृषि का रास्ता दिखाते हैं, वहीं ‘सुपर सीड्स’ बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और विशिष्ट पोषण संबंधी समस्याओं को हल करने में मदद करते हैं।

कृषि के भविष्य के लिए सबसे अच्छा रास्ता दोनों का संतुलित उपयोग है। हमें स्वदेशी बीजों की विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ, बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग उन चुनौतियों को हल करने के लिए करना चाहिए जिन्हें पारंपरिक तरीके से दूर करना मुश्किल है।

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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