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बात स्वरोजगार कीः पलायन भी नहीं करना पड़ेगा और कमाई भी खूब होगी

व्यावसायिक दृष्टिकोण से बात करें तो बटन मशरूम को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

भारत में मशरूम की मुख्य रूप से चार प्रजातियों का उत्पादन किया जाता है, जिनमें ढींगरी (Oyster Mushroom), बटन (White Button Mushrooms), दूधिया ( Milky white mushroom) और पुआल (Paddy Straw Mushrooms) का अलग-अलग इलाकों में जलवायु और तापमान के अनुसार उत्पादन हो रहा है।

व्यावसायिक दृष्टिकोण से बात करें तो बटन मशरूम को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है, बाजार में इसकी काफी खपत है। पर, पौष्टिकता के लिहाज से ढींगरी मशरूम ज्यादा प्रभावी है, इसमें प्रोटीन अधिक होता है, पर यह बटन मशरूम जितनी पॉपुलर नहीं है, लेकिन जैसे-जैसे यह लोगों के पास पहुंच रहा है, वैसे-वैसे इसकी मांग बढ़ रही है।

ढींगरी मशरूम के उत्पादन में लागत और श्रम दोनों ही कम लगते हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में मौसम और तापमान के लिहाज से ढींगरी मशरूम उत्पादन की संभावनाएं काफी हैं। यह कहना मुश्किल होगा कि कौन सी मशरूम सबसे बेहतर है, सभी मशरूम की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, किसी की मेडिशनल वैल्यू अच्छी है तो कोई पौष्टिकता के लिहाज से अच्छी होती है। किसी मशरूम का उत्पादन व्यावसायिक नजरिये से अच्छा होता है।

रुद्रप्रयाग जिले के जाखधार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में ढींगरी मशरूम का डेमो। यहां किसानों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जाता है।

रुद्रप्रयाग जिला के जाखधार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) में पादप विशेषज्ञ डॉ. अंशुल आर्य (Dr. Anshul Arya) ने ढींगरी मशरूम के व्यावसायिक महत्व पर विस्तार से चर्चा के दौरान यह जानकारियां दीं। उन्होंने बताया, मशरूम में पानी व तापमान का बहुत ध्यान रखना होता है। कमरे में सूखा बढ़ने पर दीवारों व फर्श पर पानी डाल दीजिए। तापमान ज्यादा होने पर भी यह प्रक्रिया दोहरानी होगी। मशरूम का बैग पीला पड़ने लगे तो समझ जाइए वो पानी मांग रहा है। एक या दो दिन में पानी का हल्का छिड़काव करना होगा।

पहाड़ में पलायन की समस्या पर रोक लगाने में मशरूम उत्पादन सहायक हो सकता है। जो पुराने घर खाली हैं, उनमें मशरूम उत्पादन की यूनिट लगाई जा सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र में किसानों को मशरूम उगाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिए एक कमरे में डेमो किया जाता है।

डॉ. आर्य का कहना है, पुराने घरों को मशरूम उत्पादन में इस्तेमाल कर सकते हैं। मशरूम लगाने के लिए बंद कमरा चाहिए, जिसमें सूर्य का प्रकाश नहीं चाहिए। मशरूम प्रकाश संश्लेषण नहीं करता है, इसलिए इसको अंधेरे कमरे में लगा सकते हैं। कमरे में भूसे और बीज से भरे बैग टांगने की बजाय सेल्फ लगाकर भी रख सकते हैं। इसमें धान या गेहूं का भूसा प्रयोग कर सकते है। भूसे की लंबाई लगभग दो से चार सेमी. होनी चाहिए। एक किलो बीज लगभग सौ रुपये का होता है, जो 25 किलो भूसे के लिए पर्याप्त है। बीज एक महीने से ज्यादा पुराना नहीं होना चाहिए।

देहरादून के नकरौंदा में प्रगतिशील कृषक गीता उपाध्याय ढींगरी मशरूम का उत्पादन करती हैं। इस तरह पैकेट में बनाए गए छिद्रों से बाहर निकलती है ढींगरी मशरूम। फाइल फोटो- सार्थक पांडेय

“मशरूम के बैग में एक हफ्ते में कवक जाल फैलना शुरू हो जाता है। इसमें पिन हेड्स निकलते दिखाई देंगे। पहली तुड़ाई में 20 से 25 दिन लगते हैं, जिसमें एक बैग से 800 ग्राम से डेढ़ किलो तक मशरूम मिल सकता है। यदि आपको लगता है कि समय ज्यादा लग रहा है तो बैग के पन्नी वाले आवरण को निकाल सकते हैं। पन्नियां निकालने से बैग टूटेगा नहीं। दूसरी तु़ड़ाई में 800 ग्राम तक और तीसरी तुड़ाई में सौ से 500 ग्राम तक मशरूम मिल सकता है, ” डॉ.अंशुल आर्य बताती हैं। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में ढींगरी मशरूम उत्पादन फायदेमंद है। ढींगरी को 20 से 22 डिग्री सेल्सियस तक तापमान चाहिए। अगर हम रुद्रप्रयाग जिले की बात करें तो यहां लगभग हर मौसम में इस मशरूम की तुड़ाई कर सकते हैं।

मशरूम प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। एक कटोरा मशरूम में दो ग्राम प्रोटीन मिल सकता है। इसमें फैट कम होता है। यह कार्बन का अच्छा स्रोत है। इसमें मौजूद प्रोटीन आसानी से पाचक है। इसमें पानी का मात्रा कम होती है। फाइबर का बेहतर स्रोत होता है।

मशरूम को कोरोना संक्रमण काल में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए खाया गया। इसमें रोगाणु रोधक क्षमता होती है।

मशरूम का एक बैग तैयार करने में सौ रुपये तक का खर्चा आता है, जबकि एक बैग से ढाई से तीन किलो तक उत्पादन मिलता है। एक बैग में लगभग 500 रुपये आय मिल सकती है।

मशरूम के बैग कैसे तैयार करें, देखें वीडियो-

पहाड़ के गांवों में ढींगरी मशरूम का व्यावसायिक रूप से शुरू कर सकते हैं। घर पर ही मशरूम उगाना शुरू करें तो पलायन नहीं करना पड़ेगा। इसके लिए पुराने खाली घर भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं। पुराने घरों में चूहों की समस्या उपचार करना होगा। चूहे इसके बीज खा सकते हैं, क्योंकि बीज गेहूं या धान के भूसे पर उगता है।

बाजार में मशरूम की काफी मांग है। लोग घर आकर भी फ्रेश मशरूम खरीदते हैं। आप इनके पैकेट बनाकर बेच सकते हैं। मशरूम का पाउडर बनाया जा सकता है। इसको छाया वाले स्थान पर सुखाएं, जब यह अच्छे से सूख जाए, इसका पूरा पानी निकल जाए तो इसको मिक्सर ग्राइंडर में पीसकर पाउडर बना सकते हैं। दवाइयां बनाने वाली फार्मा कंपनियां मशरूम पाउडर की डिमांड करती हैं, उनसे संपर्क किया जा सकता है।

मशरूम सामान्य तौर पर खराब नहीं होता है। यह तब तक सही होता है, जब तक कि इससे पानी न टपकने लग जाए। तोड़ने के बाद एक हफ्ते तक यह खाने योग्य है, पर यह निर्भर करता है कि आपने इसको किस तापमान और किस स्थान पर स्टोरेज किया है। मशरूम का फ्रेश इस्तेमाल ही स्वास्थ्य के लिए सही होता है। सूखने के बाद यह हानिकारक नहीं होता है, सुखाकर इसका पाउडर बनाया जाता है।

मशरूम की खोज उस समय हुई, जब लोगों ने देखा कि सूअर कुछ खोदकर खा रहे हैं। हानिकारक मशरूम का घरेलू इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसके स्कैल पूरे समय सफेद हैं तो ठीक है। यदि कलर चेंज हो जाता है तो हानिकारक है। जहरीले मशरूम चमकदार होते हैं। इनकी कैप में हल्की संरचना या स्केल दिखाई देते हैं। ये दिखने में आकर्षक लगते हैं।

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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