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किस्से मीडिया केः जब एक ट्रेनी ने एडिटिंग के नाम पर बायलाइन हटा दी

देर रात साइड स्टोरी को लिखने से हाथ खड़े कर दिए थे इस ट्रेनी ने

अखबार पर डेस्क की नौकरी हो या रिपोर्टिंग की, आपको कुछ देर पहले तक नहीं पता होता कि कोई बड़ा टास्क मिलने वाला है। किसी भी टास्क को पूरी तन्मयता और जिम्मेदारी से पूरा करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

किसी भी बड़ी घटना के साथ साइड स्टोरी का प्रचलन है। उससे संबंधित डाटा और डिटेल्स रिपोर्टर को तलाशने पड़ते हैं। एक बात और, खबर लिखने और उसको संपादित करने में बहुत अंतर होता है।

किसी घटना की साइड स्टोरी लिखना उस खबर से संबंधित रिपोर्टर के लिए ज्यादा कठिन टास्क नहीं हो सकता, पर जब किसी डेस्क वाले को साइड स्टोरी लिखने का फरमान सुनाया जाए तो निश्चित तौर पर कुछ लिखने से पहले घटना को अच्छी तरह जानना जरूरी हो जाता है।

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देर रात को होने वाली किसी भी बड़ी घटना की साइड स्टोरी वैसे तो संबंधित रिपोर्टर को ही लिखनी चाहिए। लेकिन कभी, कभी यह काम डेस्क को भी करना पड़ सकता है।

हो सकता है, रिपोर्टर फील्ड में हों और वहां से केवल खबर के अपडेट फोन पर ही बताने की स्थिति में हों। रिपोर्टिंग में फील्ड की परिस्थिति के बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसलिए डेस्क को चाहिए फील्ड के साथियों को सहयोग करें।

2013 की आपदा के बाद की रिपोर्टिंग में हमने कई रिपोर्टर्स से फोन पर ही अधिकतर सूचनाओं को नोट किया और खबरें बनाईं। रिपोर्टर्स ने भी जोखिम उठाकर मौके पर पहुंचकर कवरेज में बहुत मेहनत की। रिपोर्टर्स से मिले कन्टेंट को आपको बहुत बारीकी से समझना पड़ता है और फिर उसको खबर की शक्ल देनी होती है।

जब भी कभी कोई रिपोर्टर जोखिम उठाकर या देर रात की कवरेज आप तक पहुंचाता है तो उसको खबर में बायलाइन (उनका नाम लिखना) दी जानी चाहिए। इससे उनका उत्साह बढ़ता है और वो बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।

ऐसे ही डेस्क पर देर रात की किसी घटना की साइड स्टोरी लिखने वाले साथी का भी अधिकार बनता है कि खबर पर उनका नाम लिखा जाए। वैसे भी डेस्क के साथियों के नाम अखबारों में कम ही प्रकाशित होते हैं। वो तो पर्दे के पीछे कार्य करने वाले लोग होते हैं।

अगर डेस्क पर आप सीनियर हैं तो रिपोर्टर से मिले कन्टेंट से बनी खबर पर उन रिपोर्टर का नाम लिखना चाहिए।

एक किस्सा बताता हूं, जब बड़े अधिकारी के खास कहलाए जाने वाले एक ट्रेनी ने साइड स्टोरी को संपादित करने के नाम पर सबसे पहले बायलाइन को हटा दिया।

जबकि पहले इन्ही ट्रेनी को साइड स्टोरी लिखने को कहा गया था, पर उन्होंने हाथ खड़े कर दिए थे। उनको यह खबर इसलिए लिखने के लिए कहा गया था, क्योंकि वो पेज वन पर तैनात थे और मुख्य खबर पेज वन पर ही जानी थी।

जिस शहर की यह खबर थी, उसका संस्करण निकल चुका था। डेस्क के सभी साथी अपनी ड्यूटी पूरी करके जा चुके थे।

हरिद्वार में एक बड़ी घटना हुई। रात को सूचना मिली और रिपोर्टर ने खबर भेज दी। संपादक ने इस खबर पर एक साइड स्टोरी जरूर लिखने के लिए कहा।

संपादक ने पेज वन की टीम को ही खबर लिखने का टास्क दिया, जो उन लोगों ने बड़ी आसानी से सिटी डेस्क के हवाले कर दिया, जबकि इस खबर को उन्हीं लोगों को लिखना चाहिए था, जिन्होंने मूल खबर को संपादित किया था।

सिटी डेस्क इंचार्ज ने मूल खबर को मंगाया और प्लान किया कि इस पर साइड स्टोरी क्या हो सकती है।

डेस्क इंचार्ज ने ही एक अधिकारी से बात की और उनसे मिले इनपुट के आधार पर तय हो गया कि खबर क्या लिखी जा सकती है। उन्होंने मुझसे कहा, क्या तुम यह खबर लिखोगे। मैंने तुरंत हां कहा।

खबर लिखने में थोड़ा मुश्किल हुई। कुछ देर में तीन कॉलम की खबर लिखकर उनके हवाले कर दी। खबर में बताया गया कि नजदीकी जिले में इस घटना को लेकर क्या कार्रवाई हो रही है।

टास्क कंपलीट और सिटी डेस्क के इंचार्ज काफी खुश हुए। उन्होंने यह खबर पेज वन के पास भेज दी, ताकि मूल खबर से अलग कोई कंटेंट न हो, चेक कर लिया जाए।

अब खबर को एडिट करने के लिए वो ट्रेनी और उनका एक साथी सबसे पहले आगे आ गए, जो उसको लिखने के नाम पर इधर-उधर चले गए थे।

संपादन किया और खबर को पेज पर लगा दिया। खबर फ्रेम में फिट होने के लिए दो लाइन काटनी पड़ रही थी। पेज पर ऐसा कोई बार होता है। ट्रेनी ने दो तीन बार खबर पड़ी, पर उसकी कोई लाइन संपादित नहीं कर पा रहे थे।

उनको तो पेज वन पर बड़े अधिकारी की कृपा से बैठाया गया था। अभी तो उनके लिए विज्ञप्तियां पढ़ने का समय था,पर हमें क्या लेना, उनके पास अधिकार थे तो उन्होंने अपने परिक्रमाधारियों का साथ दिया।

जब काफी देर बाद भी दो लाइन नहीं काटी जा सकीं तो उन्होंने खबर पर से मेरा नाम हटा दिया। नाम हटाने से खबर छोटी इसलिए भी नहीं हो सकती, क्योंकि आपको डेट लाइन तो लिखनी ही होती है।

मैं यह सब कुछ देख रहा था और मन ही मन दुखी भी हो रहा था। मैंने विरोध नहीं किया, क्योंकि मैं जानता था कि बडे़ अधिकारियों की नजर में ये ट्रेनी अपने वरिष्ठ से भी ज्ञानवान हैं।

मेरी किसी बात पर कुछ नहीं होने वाला, इसलिए मौन साधो और नौकरी करो, जैसे अन्य लोग कर रहे हैं। मैंने तो इन ट्रेनी को बड़े अधिकारी के सामने कुर्सियों पर विराजमान देखा था, जबकि उसी समय सीनियर्स को उनके सामने खड़े होकर अपनी बात रखते हुए। ये बहुत पावरफुल थे वहां।

अखबार में डेस्क पर कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति बता देगा कि खबर की दो लाइन कम करने के लिए नाम नहीं हटाया जाता और न ही कन्टेंट को हटा सकते हैं।

खबर के वाक्यों को छोटा करते हैं, वो भी बहुत सतर्कता के साथ। या भी किसी गैर जरूरी लाइन को हटा देते हैं। बाद में उनके सीनियर ने खबर को एडिट करके लगा दिया।

मैंने अपने डेस्क इंचार्ज को बताया तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, यहां ऐसा ही होता है। बहुत से मौके मिलेंगे खबरें लिखने के, तुम इसी तरह तैयार रहना।

इस वाकये से एक बात तो मेरी समझ में आ गई कि ये लोग स्वयं को आगे बढ़ते देखने के लिए दूसरों को पीछे धकेलते हैं।

दूसरे दिन इन लोगों ने संपादक को बताया होगा कि उन्होंने कितनी मेहनत से साइड स्टोरी लिखी है। संपादक ने मान भी लिया होगा, उस खबर पर किसी का नाम तो लिखा नहीं था। कोई मेरी बात उन तक क्यों पहुंचाएगा, क्योंकि यहां तो अधिकतर लोग अपने नंबर बढ़ाने के लिए बैठे थे।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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