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धारकोट में ग्रामीणों ने मनाया पर्यावरण का पर्व हरेला, लगभग सौ फलदार पौधे रोपे

देहरादून। हरेला पर्व पर रायपुर ब्लाक की धारकोट ग्राम पंचायत में स्थानीय ग्रामीणों ने फलदार पौधे रोपे। ग्राम प्रधान हंसो देवी के निर्देशन में युवाओं, महिलाओं और बच्चों ने लगभग सौ पौधे लगाए और आसपास उगी घास एवं झाड़ियों का कटान किया। इस दौरान राजकीय इंटर कालेज, राजकीय प्राथमिक एवं जूनियर हाइस्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने भी सहयोग किया।

 

धारकोट में ग्रामीणों, जिनमें मां सुरकुंडा महिला समूह से जुड़ी महिलाएं, स्थानीय निवासी शामिल हैं, ने कृषि उत्पाद संग्रहण एवं फल प्रसंस्करण केंद्र के पास खाली भूमि तथा आसपास झाड़ियों का कटान किया। ग्रामीणों ने इस दौरान आम, अनार, आंवला, अमरूद के पौधे रोपे।

प्रधान हंसो देवी ने बताया कि धारकोट के निवासी पर्यावरण संरक्षण के लिए हमेशा जागरूक रहे हैं। पूर्व में लगाए गए पौधों की देखरेख करने के साथ ही और पौधे लगा जा रहे हैं। हम सभी पौधों को रोपने और उनकी देखरेख की जिम्मेदारी उठा रहे हैं।

डोईवाला से दृष्टिकोण समिति के अध्यक्ष मोहित उनियाल भी पौधारोपण के लिए धारकोट पहुंचे। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण और हरियाली से समृद्धि की ओर बढ़ा जा सकता है, यह तभी संभव है, जब प्रकृति के उन सभी नियमों का अक्षरशः पालन करें, जो उसने हमारे अस्तित्व के लिए बनाए हैं। उन्होंने पर्यावरण को बचाने के लिए आवश्यकताओं को कम करने पर जोर दिया।

इस मौके पर समूह की अध्यक्ष विनीता देवी, शिक्षक अनिरुद्ध सिंह, गोविंद सिंह रावत, सामाजिक कार्यकर्ता भरत सिंह सोलंकी, राजेश सिंह, सौरभ, परमेश सिंह, योगेश कुकरेती, माया देवी, सुमित्रा देवी, मीना देवी, सीमा देवी, नीला देवी, उषा देवी, सुशीला देवी, सरिता देवी, ज्योति आदि ने पौधारोपण में सहयोग किया।

Key words: Harela, Save Environment, Tree Plantation, Dharkot, Uttarakhand, Government Schools in Dharkot, SHG Dharkot

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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