AIIMS Rishikesh Anemia Treatment: ऋषिकेश, 10 जनवरी 2026: यदि कोई व्यक्ति एनीमिया (रक्तल्पता) से ग्रसित है और उसे बार-बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है, तो यह रिपोर्ट उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। एम्स ऋषिकेश के चिकित्सकों ने एक विशेष रोगी के उपचार के दौरान यह पुष्ट किया है कि एनीमिया के प्रत्येक मामले में रक्त चढ़ाना (Blood Transfusion) अनिवार्य नहीं होता। एनीमिया से पीड़ित रोगी को खून चढ़ाने से पूर्व उसकी गहन जांच और बीमारी के मूल कारण का पता लगाना उपचार के लिए अत्यंत आवश्यक है।
हालांकि, अधिकतर एनीमिया के मामलों में रक्त चढ़ाना जरूरी होता है, किंतु ‘ऑटोइम्यून एनीमिया’ में सही पहचान और लक्षित दवाएं ही प्रभावी इलाज साबित होती हैं। एम्स ऋषिकेश के विशेषज्ञों ने इस तथ्य को चिकित्सकीय प्रमाणों के साथ सिद्ध किया है।
AIIMS Rishikesh Anemia Treatment: गौरतलब है कि एनीमिया वह स्थिति है, जिसमें शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं (हीमोग्लोबिन) कम हो जाती हैं, जिससे अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इसके परिणामस्वरूप रोगी को थकान, कमजोरी, चक्कर आना और सांस फूलने जैसी समस्याएं होती हैं। सामान्यतः यह आयरन, फोलिक एसिड या विटामिन B12 की कमी और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण होता है, जिसका सर्वाधिक खतरा बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों में देखा जाता है।
AIIMS Rishikesh Anemia Treatment: पिछले महीने उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद की एक 55 वर्षीय महिला को गंभीर कमजोरी, चक्कर, थकान, पेट के दाहिनी ओर दर्द, उल्टी और पीली आंखों व पेशाब की शिकायत के साथ एम्स की इमरजेंसी में भर्ती किया गया था। महिला ने बताया कि छह माह पूर्व भी उसे ऐसी ही समस्या हुई थी, जिसके लिए उसने कई यूनिट रक्त चढ़वाया, किंतु कोई स्थायी लाभ नहीं हुआ।
भर्ती के समय उनका हीमोग्लोबिन मात्र 4.4 ग्राम प्रति डेसीलीटर रह गया था। जनरल मेडिसिन विभाग के चिकित्सकों ने बीमारी की जटिलता को देखते हुए गहन जांच का निर्णय लिया। रक्त जांच से पता चला कि रोगी ‘मैक्रोसाइटिक हाइपर-प्रोलिफेरेटिव एनीमिया’ से ग्रसित है। इस स्थिति में शरीर नई लाल रक्त कोशिकाएं तो बना रहा था, लेकिन वे उतनी ही तेजी से नष्ट भी हो रही थीं। जांच में ‘रेटिकुलोसाइट काउंट’ 30 प्रतिशत और बढ़ा हुआ ‘एलडीएच स्तर’ मिला, जो लाल रक्त कोशिकाओं के निरंतर टूटने (हेमोलाइसिस) का स्पष्ट संकेत था। इन परिणामों ने पुष्टि की कि यह ‘ऑटोइम्यून हेमोलिटिक एनीमिया’ का मामला है।
एम्स का उपचार
चिकित्सकों की टीम ने विस्तृत ‘इम्यूनो-हेमेटोलॉजिकल’ जांच के बाद पाया कि रोगी ‘वॉर्म ऑटोइम्यून हेमोलिटिक एनीमिया’ (AIHA) और फोलेट की गंभीर कमी से जूझ रही थी। बीमारी की सटीक पहचान होने पर चिकित्सकों ने तत्काल रक्त चढ़ाने के बजाय ‘कारण-आधारित’ (Cause-based) उपचार को प्राथमिकता दी। स्टेरॉयड, फोलेट और अन्य सहायक दवाओं के माध्यम से उपचार शुरू किया गया और अनावश्यक रक्त आधान से रोगी का बचाव किया गया। इस सटीक दृष्टिकोण का परिणाम यह रहा कि बिना अतिरिक्त रक्त चढ़ाए रोगी का हीमोग्लोबिन 4.4 से बढ़कर 8.2 हो गया और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गईं।
यह सफल उपचार जनरल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. रविकांत के मार्गदर्शन में डॉ. पी.के. पंडा, डॉ. दरब सिंह, डॉ. अक्षिता और डॉ. गगन दलाल सहित ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की अध्यक्ष प्रो. गीता नेगी, डॉ. आशीष जैन व डॉ. दलजीत कौर की टीम ने किया।
“एनीमिया मुख्यतः चार प्रकार का होता है, लेकिन प्रत्येक स्थिति में रक्त चढ़ाना आवश्यक नहीं है। सटीक और समय पर की गई पहचान ही सुरक्षित इलाज का आधार है। यह केस ‘पहले पहचान, फिर इलाज’ के सिद्धांत के महत्व को दर्शाता है।” – डॉ. पी.के. पंडा, जनरल मेडिसिन विभाग, एम्स।
“ऑटोइम्यून हेमोलिटिक एनीमिया (AIHA) के मामलों में रक्त चढ़ाने का निर्णय लेने से पूर्व रोगी का विस्तृत ‘इम्यूनो-हेमेटोलॉजिकल’ मूल्यांकन करना अनिवार्य है।” – प्रो. गीता नेगी, विभागाध्यक्ष, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन, एम्स।




