देहरादून, 11 अक्तूबर, 2026ः एम्पावर सोसाइटी ने देहरादून में एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को केंद्र में रखते हुए ‘पीपल, प्लैनेट और प्रॉफिट’ (थ्री बॉटम लाइन अप्रोच) मॉडल पर आधारित एक महत्वाकांक्षी परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाना और प्रकृति की वहन क्षमता (कैरिंग कैपेसिटी) के अनुरूप संतुलित विकास सुनिश्चित करना है।

एम्पावर सोसाइटी की सचिव मोनीदीपा सरमा ने कार्यशाला की जानकारी देते हुए बताया कि संस्था पिछले एक वर्ष से इस मॉडल पर निरंतर मंथन कर रही थी। अब सभी हितधारकों, विशेषज्ञों और डोनर एजेंसियों की सहमति से इसका क्रियान्वयन तय समय-सारिणी (टाइम कैलेंडर) के अनुसार शुरू किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि परियोजना की प्राथमिक रूपरेखा, पीआरए (PRA) प्रक्रिया और माइक्रो-प्लानिंग अक्टूबर माह में पूरी कर ली जाएगी तथा नवंबर माह से इसे धरातल पर लॉन्च किया जाएगा।
चमोली के गांवों से 6 माह का पायलट प्रोजेक्ट
परियोजना की शुरुआत छह माह के पायलट फेज के साथ होगी। इसके लिए चमोली जिले के बूँगा, रूईसन और सोल घाटी (सोल डुंगरी बेल्ट) के आस-पास के गांवों का चयन किया गया है। इस पायलट चरण में 400 से 500 परिवारों को लक्षित कर तीन प्रमुख स्तंभों पर काम किया जाएगा:
वॉश (WASH) एवं अपशिष्ट प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट): सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और ठोस व तरल अपशिष्ट प्रबंधन को मजबूत करना।
वृक्षारोपण एवं पुनरुद्धार (Plantation & Regeneration): पारिस्थितिकी संतुलन के लिए सेरीकल्चर (रेशम कीट पालन) व स्थानीय प्रजातियों का पौधारोपण और हरित आवरण का विस्तार।
ग्रामीण व पारंपरिक आजीविका संवर्धन: इको-टूरिज्म, पारंपरिक हस्तशिल्प, नेचुरल फाइबर्स और मत्स्य पालन (फिशरीज) के जरिए स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी आमदनी के स्रोत विकसित करना।
दीर्घकालिक योजना के तहत इस परियोजना को 7 वर्षों तक संचालित करने का लक्ष्य है, जिसमें प्रति वर्ष न्यूनतम 500 परिवारों को आर्थिक व पर्यावरणीय दृष्टि से सशक्त बनाया जाएगा। 
कैम्ब्रिज स्कॉलर एवं वैज्ञानिक डॉ. कल्याण शर्मा ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा, आधुनिक विकास में आजीविका और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। “हमारी पृथ्वी एक ही है और उसकी प्राकृतिक वहन क्षमता सीमित है। केवल आर्थिक लाभ की बात करने से भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। हमें वैज्ञानिक पद्धति और स्थानीय समझ को जोड़कर ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिससे ग्रामीणों की आय बढ़े और पृथ्वी के संसाधन भी सुरक्षित रहें। कैम्ब्रिज और अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय समुदाय को जोड़कर हम इस दिशा में एक अनुकरणीय उदाहरण स्थापित करेंगे।”
साउथ ईस्ट एशिया एंड नॉर्थ ईस्ट अलायंस व फाइव मरमेड्स के अध्यक्ष डॉ. त्रिदीप चक्रवर्ती ने कहा, “उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में अपार प्राकृतिक संपदा और सामुदायिक क्षमता है। सोल घाटी, कपकोट, बागेश्वर, झूनी और बेमरू फार्म के दौरों के दौरान हमने स्थानीय लोगों का उत्साह देखा है। हमारा फोकस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक इनपुट से जोड़कर इको-टूरिज्म, हस्तशिल्प और प्राकृतिक रेशों को लाभकारी व्यवसाय बनाना है। यह परियोजना स्थानीय महिलाओं और युवाओं को न केवल स्वरोजगार से जोड़ेगी, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती देगी।”
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों और फील्ड कार्यकर्ताओं के स्वास्थ्य व सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया। अपने पांच दिवसीय देहरादून प्रवास के दौरान मेडिकल इमरजेंसी विशेषज्ञ डॉ. अशिमव देब शर्मा ने एम्पावर सोसाइटी के प्रतिभागियों को त्वचा संबंधी रोगों (स्किन रिलेटेड एलमेंट्स), एलर्जी और संक्रमण से जुड़ी सावधानियों पर विशेष व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। उन्होंने बताया कि पर्वतीय अंचलों में सेरीकल्चर, कृषि और प्राकृतिक रेशों के संवर्धन के दौरान श्रमिकों व ग्रामीणों को विभिन्न पौधों, कीटों और पर्यावरणीय कारकों के सीधे संपर्क में आना पड़ता है। ऐसे में कार्यस्थल पर व्यक्तिगत स्वच्छता, सुरक्षित पानी के उपयोग और त्वचा संक्रमण के शुरुआती लक्षणों की पहचान कर तुरंत प्राथमिक उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। यह प्रशिक्षण मास्टर ट्रेनर्स के माध्यम से गांवों के हर परिवार तक पहुंचाया जाएगा।
स्थानीय नेतृत्व और त्रिस्तरीय प्रशिक्षण (TOT) मॉडल
कार्यशाला में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि बाहरी एजेंसियों पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय युवाओं और महिलाओं को ही नेतृत्व सौंपा जाएगा। इसके लिए ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स (TOT), ट्रेनर्स और मास्टर ट्रेनर्स का त्रिस्तरीय ढांचा तैयार किया जा रहा है। वैज्ञानिक, तकनीकी और स्वास्थ्य संबंधी विषयों को सरल, सुरुचिपूर्ण व स्थानीय भाषा में तैयार कर जन-जन तक पहुँचाया जाएगा, ताकि हर घर तक जागरूकता पहुंचे। कार्यशाला में विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले तुलिका, हरेंद्र नेगी, शांतनु गर्ग, विकास चौधरी, राजेश लाल, प्रिया नेगी,भूपति लाल, शमीम अहमद, सार्थक आदि उपस्थित रहे। बैठक के अंत में सभी प्रतिभागियों ने सर्वसम्मति से परियोजना के रोडमैप को अंतिम रूप दिया और नवंबर माह से चमोली जिले के चिन्हित गांवों में धरातलीय कार्य शुरू करने का संकल्प लिया।





