Integrated Watershed Management : देहरादून, 30 मई 2026: “खाद्य और पोषण सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करने के लिए जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन, मत्स्य विकास तथा पशुधन उत्पादन में परस्पर पूरकता और समन्वय स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है।” यह विचार आईसीएआर-केंद्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-CIARI), श्री विजयपुरम (अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह) के मत्स्य विज्ञान प्रभागाध्यक्ष डॉ. एम. मुरुगानंदम ने व्यक्त किए।
डॉ. मुरुगानंदम ने 29 मई 2026 को आईसीएआर-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR-IISWC), देहरादून में चल रहे 131वें बैच के अधिकारी प्रशिक्षुओं के लिए आयोजित विशेष व्याख्यान श्रृंखला को संबोधित किया। वे यहां 22 अप्रैल से 21 अगस्त 2026 तक आयोजित नियमित अधिकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम में विशेष अतिथि संकाय सदस्य के रूप में आमंत्रित थे।
Integrated Watershed Management : अपने विस्तृत व्याख्यान के दौरान डॉ. मुरुगानंदम ने समेकित जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन (Integrated Watershed Management) के सिद्धांतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को रेखांकित किया:
प्राकृतिक संसाधन और जल प्रबंधन: उन्होंने जल निकासी रेखाओं, नदियों की विभिन्न श्रेणियों, अनुपयोगी व अल्प-उपयोग वाली भूमि, जल संचयन संरचनाओं (WHSs), फार्म पॉन्ड और चारे के संकट जैसे महत्वपूर्ण घटकों पर प्रकाश डाला।
अपस्ट्रीम-डाउनस्ट्रीम संबंध: उन्होंने नदी प्रबंधन, ऊपरी व निचले भू-भागों की अंतःक्रियाओं तथा चारा प्रबंधन के अंतर्संबंधों से उत्पन्न होने वाले अवसरों की महत्ता को समझाया।
माउंटेन टू ओशन (M2O) अवधारणा: स्रोत से समुद्र तक की इस समकालीन अवधारणा और ‘रिवर कंटीन्यूअम कॉन्सेप्ट’ पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि विभिन्न मत्स्य प्रजातियाँ नदी पारिस्थितिकी तंत्र के अलग-अलग हिस्सों में निवास करती हैं। इसलिए संरक्षण योजनाओं के निर्माण में इन पहलुओं को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।
तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण: उन्होंने अपवाह (Runoff) के संकेंद्रण समय, पर्यावरणीय प्रदूषण की संभावनाओं, जल संचयन संरचनाओं के प्रभावी डिजाइन की सीमाओं, भूदृश्य संबंधी बाधाओं और जल उपयोग की संभावनाओं पर तकनीकी विश्लेषण प्रस्तुत किया।
“कृषि एवं खाद्य उत्पादन प्रणालियाँ व्यापक पर्यावरण प्रबंधन ढांचे का हिस्सा हैं। वर्तमान उर्वरक संकट को देखते हुए देश भर में संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने वाले जागरूकता अभियानों की अत्यधिक आवश्यकता है।” — डॉ. एम. मुरुगानंदम
आजीविका और संसाधन-कुशल तकनीकें
Integrated Watershed Management : व्याख्यान में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि जल संचयन क्षमता और आजीविका के अवसरों के मध्य एक सटीक संतुलन होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित किया:
समेकित मत्स्य पालन हेतु जल संचयन संरचनाओं का प्रभावी डिजाइन।
मौसमी चारे की उपलब्धता, उत्तरदायी चराई और चारागाह प्रबंधन में संतुलन।
उन्नत मत्स्य पालन तकनीकें, जल गुणवत्ता प्रबंधन और उत्पादन लागत (Inputs) का अनुकूलन।
मत्स्य एवं पशुधन आधारित ग्रामीण आजीविका के लिए संसाधन-कुशल (Resource-Efficient) तकनीकें।
प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा
इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वय आईसीएआर-आईआईएसडब्ल्यूसी (ICAR-IISWC) के एचआरडी एंड एसएस विभागाध्यक्ष डॉ. चरण सिंह के नेतृत्व में किया जा रहा है। उनकी समन्वय टीम में विरष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अभिमन्यु झाझरिया, डॉ. इंदु रावत और डॉ. मातबर सिंह शामिल हैं।
प्रतिभागी: इस 131वें बैच के प्रशिक्षण कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के लगभग 20 अधिकारी प्रशिक्षु भाग ले रहे हैं।
व्याख्यान सत्र का समापन एक बेहद जीवंत और संवादात्मक प्रश्नोत्तर सत्र (Q&A Session) के साथ हुआ, जिसमें अधिकारी प्रशिक्षुओं ने समेकित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन एवं सतत खाद्य उत्पादन प्रणालियों पर सक्रियता के साथ अपने सवाल पूछे और चर्चा की।




