Ganga Conservation Technology: राजेश पांडेय, देहरादून, 21 अप्रैल, 2026ः भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के वैज्ञानिक रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस विशेषज्ञ डॉ. एसके जीशान अली ने ‘रेडियो केदार’ के साथ एक विशेष संवाद में स्पष्ट किया कि कैसे रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) जैसी तकनीकें गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र को नया जीवन देने में ‘डिजिटल आंख’ की भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे आधुनिक तकनीक और स्थानीय सामुदायिक भागीदारी मिलकर गंगा के पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित कर रहे हैं।
Ganga Conservation Technology: नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत नमामि गंगे प्रोजेक्ट में कार्य कर रहे भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. जीशान अली का सफर विज्ञान के प्रति गहरी रुचि और प्रकृति के प्रति समर्पण की कहानी है। कोलकाता से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने वर्धमान विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान में एमएससी की। यहीं से उनकी रुचि ‘रिमोट सेंसिंग’ (Remote Sensing) और ‘जीआईएस’ में जगी। अपनी विशेषज्ञता को और गहरा करने के लिए देहरादून स्थित ‘भारतीय रिमोट सेंसिंग संस्थान’ (IIRS) आए। डब्ल्यूआईआई (WII) के साथ जुड़कर उन्होंने ‘अखिल भारतीय बाघ अनुमान’ (All India Tiger Estimation) जैसे प्रतिष्ठित प्रोजेक्ट्स में महत्वपूर्ण योगदान दिया और अब वे अपना पूरा अनुभव गंगा संरक्षण में लगा रहे हैं।
साक्षात्कार के दौरान डॉ. अली ने सरल शब्दों में रिमोट सेंसिंग और जीआईएस के महत्व को समझाया। उन्होंंने बताया, रिमोट सेंसिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसके माध्यम से हम किसी वस्तु या स्थान के प्रत्यक्ष संपर्क में आए बिना, दूर से ही (सैटेलाइट या ड्रोन द्वारा) उसके बारे में सटीक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। जीआईएस तकनीक प्राप्त डेटा को डिजिटल मानचित्रों में बदलने और उसका वैज्ञानिक विश्लेषण करने का माध्यम है।
गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए ‘हैबिटेट मैपिंग’
डॉ. अली के अनुसार, गंगा जैसे विशाल प्रवाह क्षेत्र (2525 किमी) की निगरानी के लिए यह तकनीक एक ‘डिजिटल आंख’ की तरह काम करती है, जो नदी के हर मोड़, गहराई और वहां की जैव विविधता पर पैनी नजर रखती है। गंगा डॉल्फिन का संरक्षण इस प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इनके संरक्षण के लिए ‘हैबिटेट मैपिंग’ की जा रही है, जिसमें पानी की गहराई, प्रवाह और मानवीय हस्तक्षेप के आधार पर ‘प्रोबेबिलिटी मैप्स’ तैयार किए जाते हैं। जहां पानी गहरा होता है और इंसानी गतिविधियां कम होती हैं, डॉल्फिन वहीं रहना पसंद करती हैं। तकनीक के माध्यम से इन क्षेत्रों को चिन्हित कर संरक्षण प्रयासों को वहां केंद्रित किया जाता है।
Ganga Conservation Technology: रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस प्रोफेशनल डॉ. जीशान अली ने नदी के व्यापक स्वरूप को समझाते हुए कहा कि नदी केवल अपने दो किनारों के बीच सीमित नहीं होती, बल्कि उसका अस्तित्व उसके आस-पास के एक विस्तृत क्षेत्र, जिसे ‘रिवरस्केप’ (Riverscape) कहते हैं, से जुड़ा होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नदी के किनारे के मैदानी इलाके (फ्लड प्लेन्स), आर्द्रभूमियां (वेटलैंड्स) भी नदी के पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग हैं। जलीय जीवों और पौधों के लिए ये क्षेत्र अनिवार्य आवास (हैबिटेट) के रूप में कार्य करते हैं, जो नदी के स्वास्थ्य और संतुलन को बनाए रखने के लिए उतने ही जरूरी हैं जितना कि नदी का मुख्य प्रवाह होता है।
डॉ. जीशान अली ने अपनी वैज्ञानिक यात्रा के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उनके लिए नदी को एक जीवंत ‘वास्तु तंत्र’ (इकोसिस्टम) के रूप में समझने की शुरुआत राजाजी नेशनल पार्क के चीला (हरिद्वार), वर्तमान में राजाजी टाइगर रिजर्व क्षेत्र से हुई थी। अपने पहले फील्ड दौरे में उन्होंने विशेषज्ञों के साथ मिलकर जमीन पर यह सीखा कि रिमोट सेंसिंग के डिजिटल डेटा को वास्तविक स्थितियों से कैसे जोड़ा जाता है। उन्होंने वहां न केवल जंगली जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में देखा, बल्कि नदी की गहराई मापने और सैंड बैंक्स (Sand Banks) का निरीक्षण करने जैसे तकनीकी कार्यों का व्यावहारिक अनुभव भी प्राप्त किया, जिससे उन्हें जीवों के ‘आवास’ (हैबिटेट) की बारीकियों को समझने में मदद मिली।
विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान का जुड़ाव होता है सहायक
Ganga Conservation Technology: उन्होंने एक महत्वपूर्ण नजरिया साझा करते हुए कहा कि संरक्षण के कार्यों में वैज्ञानिकों की पढ़ाई से कहीं अधिक मूल्यवान स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान है। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि एक वैज्ञानिक मशीन के जरिए केवल आज की स्थिति का डेटा देख सकता है, लेकिन वहां रहने वाले बुजुर्ग ही यह बता सकते हैं कि 20-30 साल पहले नदी का स्वरूप कैसा था और समय के साथ उसमें क्या बदलाव आए हैं। उनके अनुसार, जब वैज्ञानिकों का वर्तमान डेटा और स्थानीय लोगों के पास मौजूद नदी का ‘इतिहास’ एक साथ मिलते हैं, तभी ‘सिटिजन साइंस’ के माध्यम से नदी और उसके जलीय जीवों का सही मायने में संरक्षण संभव हो पाता है।
गंगा प्रहरी: तकनीक और समुदाय का अनूठा मेल
डॉ. अली ने ‘गंगा प्रहरी’ अभियान की सफलता में जीआईएस की भूमिका पर विशेष जोर दिया। गंगा प्रहरी वे स्थानीय स्वयंसेवक हैं जो जमीनी स्तर पर नदी की रक्षा करते हैं। जीआईएस के माध्यम से यह ट्रैक किया जाता है कि किस राज्य, जिले या ब्लॉक में कितने गंगा प्रहरी सक्रिय हैं और उनकी विशेषज्ञता क्या है। यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र में संरक्षण कार्य की आवश्यकता होती है, तो मानचित्र के आधार पर तुरंत पता चल जाता है कि वहां कौन से स्वयंसेवक मदद के लिए उपलब्ध हैं।
नीतिगत नियम और तकनीकी बाधाएं
इतने बड़े पैमाने पर काम करना चुनौतियों से मुक्त नहीं है। डॉ. अली ने कुछ प्रमुख बाधाओं की जानकारी देते हुए बताया, उच्च गुणवत्ता वाली सैटेलाइट तस्वीरें मुफ्त उपलब्ध नहीं होतीं और काफी महंगी होती हैं। वहीं, मुफ्त तस्वीरों में बारीकियों (Details) की कमी होती है। भारत की ‘नेशनल जियोस्पेशियल पॉलिसी’ के तहत डेटा साझा करने और मैपिंग करने के कड़े नियम हैं। उदाहरण के लिए, एक निश्चित सीमा (2.25 हेक्टेयर) से छोटे क्षेत्रों की मैपिंग में नीतिगत रुकावटें आ सकती हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में डेटा एकत्र करने के लिए ड्रोन उड़ाने हेतु राज्य और केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों से अनुमति लेनी पड़ती है।
आपदा प्रबंधन और भविष्य की तैयारी
उत्तराखंड जैसी संवेदनशील भौगोलिक स्थिति वाले राज्य में जीआईएस तकनीक जीवन रक्षक साबित हो रही है। डॉ. अली ने बताया कि वे ‘प्रेडिक्शन मॉडल्स’ (पूर्वानुमान मॉडल) तैयार करते हैं। जलवायु डेटा, मिट्टी की संरचना और मानवीय बस्तियों के विस्तार का विश्लेषण कर यह अनुमान लगाया जाता है कि यदि कोई आपदा आती है, तो कौन-से क्षेत्र सबसे पहले प्रभावित होंगे। बांधों और बैराजों के कारण नदी का प्रवाह बदलता रहता है। जीआईएस के जरिए इन परिवर्तनों को ट्रैक किया जाता है ताकि जलीय जीवों के आवास पर पड़ने वाले प्रभाव को समझा जा सके।
युवाओं के लिए करिअर के अवसर
डॉ. अली ने युवाओं को इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
जूलॉजी, बॉटनी, पर्यावरण विज्ञान, कंप्यूटर विज्ञान या भूगोल की पृष्ठभूमि वाले छात्र इस क्षेत्र में आ सकते हैं।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने जल शक्ति मंत्रालय के सहयोग से ‘फ्रेशवाटर बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन’ में एक विशेष मास्टर कोर्स शुरू किया है, जो देश में अपनी तरह का पहला कोर्स है। यहाँ छात्रों को जीआईएस, रिमोट सेंसिंग और जैव विविधता का एकीकृत प्रशिक्षण दिया जाता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग अब जीआईएस के साथ मिलकर डेटा विश्लेषण को और अधिक सटीक बना रहे हैं।
‘सिटिजन साइंस’ ही समाधान है
साक्षात्कार के अंत में डॉ. अली ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया कि केवल वैज्ञानिक ही नदी को नहीं बचा सकते। उन्होंने ‘सिटिजन साइंस’ (Citizen Science) का आह्वान किया, जहां आम नागरिक और विशेषकर युवा पीढ़ी, ऐप या अन्य माध्यमों से नदी के बारे में जानकारी साझा करें। स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिकों की आधुनिक तकनीक जब मिलती है, तभी गंगा का भविष्य सुरक्षित होता है। डॉ. जीशान अली के अनुसार, गंगा का संरक्षण केवल एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। तकनीक इस जिम्मेदारी को निभाने का एक सशक्त माध्यम है।
Frequently Asked Questions (F&Q)
Q1: What is the role of GIS in Ganga conservation? A: GIS (Geographic Information System) acts as a ‘digital eye’ that helps map aquatic habitats, track the location of volunteers (Ganga Praharis), and analyze environmental data to protect the river’s ecosystem.
Q2: Why does Dr. Zeeshan Ali emphasize ‘Riverscapes’ over just the river banks? A: A river does not just flow between two banks; its ecosystem includes floodplains and wetlands. Protecting the entire ‘riverscape’ is essential for maintaining the health of aquatic life and preventing disasters.
Q3: How does local community knowledge help scientific research? A: While scientists gather current digital data, local elders provide the historical context of the river. Combining these perspectives through ‘Citizen Science’ creates a more effective conservation strategy.
Q4: Can students pursue a career in this field? A: Yes. Students with backgrounds in Zoology, Botany, or Environmental Science can pursue specialized courses like the Master’s in Freshwater Biodiversity Conservation offered by WII.
Q5: What are the main challenges in using high-end technology for river monitoring? A: Key challenges include the high cost of high-resolution satellite imagery, strict geospatial data policies, and complex permit requirements for using drones in sensitive areas.



