By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Reading: बचपन की बातेंः पानी का मोल और कुएं पर मेला 
Share
Notification Show More
Font ResizerAa
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
Font ResizerAa
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
  • Advertise
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
- Advertisement -
Ad imageAd image
NEWSLIVE24x7 > Blog > Blog Live > बचपन की बातेंः पानी का मोल और कुएं पर मेला 
Blog Liveenvironment

बचपन की बातेंः पानी का मोल और कुएं पर मेला 

Rajesh Pandey
Last updated: November 4, 2022 10:38 am
Rajesh Pandey
4 years ago
Share
देहरादून जिला स्थित डोईवाला में प्रेमनगर बाजार स्थित श्रीशिव मंदिर के पास स्थित कुआं, जो बदहाल हो चुका है। फोटो- सार्थक पांडेय
SHARE
राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

पहले हर घर में नल नहीं था, तब पानी बहुत कीमती होता था। बहुत ध्यान से पानी का इस्तेमाल होता था। एक बाल्टी में ही नहाने का टास्क पूरा करना होता था। कपड़े धोने के लिए काफी संख्या में लोग आसपास की नहरों पर चले जाते थे।

ये नहरें बहुत साफ होती थीं और इनमें कपड़े धो सकते थे। अब तो इनकी हालत देखकर दुख होता है। कुछ नहरें तो बंद सी ही हो गईं। मुझे अच्छी तरह याद है कि डोईवाला में चीनी मिल तिराहे के पास एक नहर थी, जिस पर घराट भी चलती थी।

मौका मिलते ही हम बच्चे उसमें कूद जाते थे और फिर मनभर कर नहाते थे। घर आकर बहाने बनाते और डांट खाने को मिलती। आज जब भी उस नहर को देखता हूं तो मन दुखी हो जाता है।

जब तक हमने पानी के मूल्य को जाना, तब तक हमारे आसपास खेतों को सींचने वाले नहरें स्वच्छ रहीं। बहता पानी कभी नष्ट नहीं होता, जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है, उसका इस्तेमाल होता रहता है। तभी तो हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि बहते जल को स्वच्छ रखना चाहिए। उसमें गंदगी नहीं फेंकनी चाहिए, क्योंकि उसे आपसे भी आगे किन्हीं और लोगों को इस्तेमाल करना है।

पहले घर दूर-दूर बने होते थे और उनके बीच में होते थे हरेभरे खेत। इन खेतों को दूर किसी नदी से निकलीं नहरें सींचती थीं। अब तो गांव से कस्बा और कस्बे से शहर बन गए इलाकों में खेत ही नहीं रहे, तो नहरों का क्या काम। पर, जैसे जैसे घरों की संख्या बढ़ती गई, ये नहरें अब नदी से पानी नहीं लातीं। इनका काम बदल गया है, ये अब घरों के दूषित पानी को ढोती हैं।

ये नालियां बन गई हैं। कुल मिलाकर यह कहें कि साफ पानी वाली नहरों की मौत हो गईं और उनकी जगह गंदगी ढोने वाली नालियां रेंगने लगीं। ये नालियां आगे बढ़कर किसी नदी में मिल रही हैं। हमारे शहर देहरादून में रिस्पना, बिंदाल और सुसवा जैसी साफ नदियों के साथ भी तो ऐसा ही हुआ है।

जब मैं छोटा था, यही कोई 10-12 साल का, तब कुछ ही घरों में नल थे। लोग अपने पड़ोसियों के घरों में लगे नलों से पानी भरते थे। बड़ी संख्या में लोग कुओं से भी पानी भरते थे।

मेरे घर के पास शिव मंदिर परिसर में एक कुआं है। अब तो वर्षों से इस कुएं पर पानी नहीं भरा जाता। इसे जाली से ढंक दिया गया है और इसके आसपास काफी घास उग आई है। पानी लेने के लिए कभी यहां भीड़ लगाने वाले लोगों ने अब इस पुराने कुएं को लगभग भुला दिया है।

मुझे याद है कि रस्सी से बंधी बाल्टी को मुंडेर पर लगी चरखी के सहारे गहरे कुएं में डाला जाता था। थोड़ी देर में पानी से भरी बाल्टी को ऊपर खींचा जाता। हिलती डुलती पानी छलकाती बाल्टी कुएं से बाहर आ जाती।

कई बार तो ऐसा भी हो जाता कि बाल्टी रस्सी से छूटकर कुएं में ही रह जाती। बड़ा दुख होता था कि पानी के चक्कर में बाल्टी से भी हाथ धोना पड़ा।

हमने इस कुएं का पानी खूब पीया। उस समय लोग कुएं से पानी भरने में एक दूसरे की मदद भी करते थे। कुछ लोग तो कुएं से थोड़ा दूर कपड़े धोते हुए दिख जाते थे। मेला सा लगा होता था यहां।

सुबह हो या शाम हो या फिर दोपहर, कुएं ने पानी लेने से कभी मना नहीं किया। कुएं के पास छोटे बच्चों का आना मना था। वर्ष में एक बार इसकी सफाई होती थी।

मोटी- मोटी रस्सियों के सहारे कुछ लोग कुएं में उतरते थे और फिर उसमें जमा कीचड़ को बड़ी बड़ी बाल्टियों से ऊपर खींचा जाता था। इसी कीचड़ में छूटी हुई बाल्टियां भी बाहर आ जाती थीं।

लोग कीचड़ में अपनी-अपनी बाल्टियों को ढूंढते थे। कुएं की सफाई सभी लोगों की सहभागिता से होती थी। कुएं में जल के स्रोत बंद न हो जाएं, इसलिए इनकी सफाई बहुत जरूरी होती है।

क्या आपको पता है कि देहरादून के पास एक गांव है, जिसका नाम कुआंवाला है। यह नाम शायद इसलिए पड़ा, क्योंकि यहां मुख्य मार्ग पर ही एक बड़ा सा कुआं था।

कई साल पहले कुएं को बंद कर दिया गया, क्योंकि मुख्य मार्ग को फोर लेन करना था। अब तो सिर्फ नाम ही रह गया,  कुआंवाला को कुआं तो कब का अलविदा कह चुका है।

हां, तो मैं बात कर रहा था, अपने घर के पास वाले कुएं की। जब भी कभी मौका मिल जाता, तो नजर बचाकर, हम बच्चे ऊंची मुंडेर से कुएं में झांकते और तेज आवाज में कुछ न कुछ चिल्लाते थे।

कुआं भी कहां चुप रहता, वो हमारी आवाज को वापस कर देता। ऐसा लगता कि  कुआं हमारी बात का जवाब दे रहा है। हम अपना नाम लेते तो जवाब में  कुआं भी हमारा नाम लेता। इसको विज्ञान में प्रतिध्वनि (इको) कहते हैं। मैं तो बच्चों से कहूंगा कि अगर आपको कहीं  कुआं दिखता भी है तो उसके पास नहीं जाना और न ही उसमें झांकना। कुएं को दूर से ही देखना।

कुआं हो या जल का कोई अन्य स्रोत, उनकी देखरेख करनी चाहिए। जल तो स्रोत से ही मिलता है। आपके घर नलों में आने वाला पानी भी धरती के भीतर से निकाला जाता है। धरती में जल का भंडार है, यह तभी तक सुरक्षित रहेगा, जब तक हम पानी का संरक्षण करते रहेंगे। हम वर्षा का पानी इकट्ठा करके दैनिक कार्यों में उसका इस्तेमाल कर सकते हैं।नदियों सहित जल के किसी भी स्रोत को गंदा न करें। फिर मिलते हैं…

You Might Also Like

Video: बडेरना गांव की इन बेटियों की मुहिम को सलाम
डोईवाला के इंजीनियर और उनके भाई ने इस हुनर से जीता लोगों का दिल
भारत से विलुप्त हो चुके चीतों को कुनो नेशनल पार्क में छोड़ा
देखिए, घमंडपुर की 130 साल पुरानी बावड़ी
प्रकृति खोज क्विज का क्वालीफाइंग राउंड 25 सितंबर से
TAGGED:How much is a well of water?Images for water wellWhat is the meaning of water well?Where do well get water from?
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Email Copy Link Print
ByRajesh Pandey
Follow:
newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
Previous Article कक्षा छह से ही कौशल विकास पर फोकस करने की आवश्यकताः मुख्य सचिव
Next Article प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री केदारनाथ धाम के लिए रोप वे का शिलान्यास किया
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

https://newslive24x7.com/wp-content/uploads/2026/04/CM-Dhami-4-Year-Journey-2026-2-Min-1.mp4

Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun
Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun Doiwala, PIN- 248140
9760097344
© 2026 News Live 24x7| Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?