पहाड़ी छेमी की बात ही अलग है ..

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पोषक और गुणकारी है छेमी .

उत्तराखण्ड के बहुमूल्य उत्पादों की श्रंखला में एक और महत्वपूर्ण उत्पाद जिसको शायद ही कोई ना जानता हो। उत्तराखण्ड की पारम्परिक सब्जी पहाड़ी छेमी जिसको प्रदेश भर में सामान्यतः छेमी के नाम से ही जाना जाता है। छेमी का वैज्ञानिक नाम Dolichos lablab जिसका Fabaceae

डॉ. राजेंद्र डोभाल, महानिदेशक -UCOST उत्तराखण्ड.

कुल के अन्तर्गत वानस्पतिक अध्ययन किया जाता है। छेमी को अनेकों वैज्ञानिक नाम से भी जाना जाता है जो कि इसके ही प्रायः हैं। इतिहासकारों के अनुसार छेमी को सबसे प्राचीन (लगभग 300 वर्ष पूर्ण) उगाई जाने वाली सब्जी के रूप में भी जाना जाता है। इसका अस्तित्व लगभग आठवीं शताब्दी से माना जाता है। पूरे विश्व भर में छेमी की लगभग 60 प्रजातियां उगायी जाती हैं जो कि सबसे अधिक एशिया तथा अफ्रीका में उगायी जाती है।

भारत के अलावा छेमी को मलेशिया , इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, चीन, ईराक, केनिया, सूडान, इथोपिया, नाईजीरिया, मध्य तथा पूर्वी अमेरिका आदि देशो में भी उगाया जाता है। छेमी में प्रोटीन की अच्छी मात्रा होने के कारण इसे एशिया तथा अफ्रीका देशो में सब्जी के रूप में उपयोग हेतु उगाया जाता है। इसके अलावा अमेरिका तथा अन्य विकसित देशो में इसे केवल घरेलू सजावट के लिये ही उगाया जाता है। छेमी को अन्य भाषाओ में अलग-अलग नाम से जाना जाता है जैसे कि लबलाव-अरेबी, राजाशिम्बि – बंगाली, बैन डाउ – चाइनीज, डोलिचोस लबलाव-अंग्रेजी, डोलिक्यूडी इजिप्ट-फ्रेंच, एजिस्टचे फसेल -जर्मन, लोबिजा – रसियन, राज सिमी – नेपाली तथा फिजी मामे – जापानीज आदि।

समुद्र तल से 2000 मीटर तक की ऊँचाई तक उगाई जाने वाली छेमी की फसल को भारत के कर्नाटका, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु आदि राज्यों में बहुतायत मात्रा में उगाया जाता है। इसके अलावा भारत के अन्य राज्यों में इसको घरेलू सब्जी उपयोग के लिये ही उगाया जाता है।

उत्तराखण्ड में छेमी का उत्पादन सीमित मात्रा में किया जाता है तथा इसे स्थानीय सब्जी के रूप में बहुतायत पसंद किया जाता है। उत्तराखण्ड के

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पर्वतीय क्षेत्रों में छेमी का उत्पादन घरेलू स्तर पर ही कर क्षेत्र के स्थानीय बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है। हरी सब्जी के रूप में उपयोग की जाने वाली छेमी के रासायनिक विश्लेषण के आधार पर इसमें सुगर, एल्कोहल, फीनोल्स, स्टेरोइड्स, इसेंसियल ऑयल्स, एल्केलॉइड्स, टेनिन्स, फलेवोनॉइड्स, सेपोनिन्स, काउमेरिन्स, टर्पिनोइड्स, ग्लाइकोसाइड्स तथा एथनानोइड्स आदि सामान्यतः पाये जाते हैं।

वर्श 2000 में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार छेमी से एक डोलिचिन (dolichin) नामक रसायन आयसोलेट किया गया जिसे फूसारियम ऑक्सिसपोरम, राइजोक्टोनिया सोलानी तथा कोपरिनस कॉमेट्स नामक कवक (Fungi) के सापेक्ष प्रभावी पाया गया। इसके अलावा छेमी में प्रोटीन 2.95 ग्राम, वसा 0.27 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट्स 9.2 ग्राम तथा विटामिन्स की अच्छी मात्रा पायी जाती है जैसे विटामिन बी1- 0.056 मिग्रा0, बी2- 0.088 मिग्रा, बी3- 0.48 मिग्रा0, बी9- 47 माइक्रो ग्राम एवं विटामिन सी- 5.1 मिग्रा0 प्रति 100 ग्राम तक पाये

पोषक और गुणकारी है छेमी .

जाते हैं। छेमी को प्राकृतिक मिनरल्स का भी अच्छा स्रोत माना जाता है। शायद इसी वजह से यह सबसे प्राचीन उगायी जाने वाली सब्जी के रूप में है। इसमें Ca – 41 Mg., Fe – 0.76 Mg., Mg – 42 Mg., Mn – 0.21 Mg., P – 49 Mg., K – 262 Mg. एवं Zn – 0.38 Mg. तक पाया जाता है। यह पोटेशियम का एक अच्छा प्राकृति स्रोत है।

परम्परागत उपयोग को देखते हुये यह अनुमान लगाया जा सकता है कि छेमी को पहले से ही स्वास्थ्यप्रद का एक विकल्प भी माना जाता रहा है। विभिन्न शोध पत्रों के अनुसार छेमी पर हुये शोध में इसे डाइबेटिक, आयरन डिफीसिएंसी, एनीमिया, हाइपर लिपिडिमिक, माइक्रोबियल इन्फेक्शन आदि हेतु प्रभावी पाया गया है। पोष्टिक आहार के अलावा छेमी के तन तथा पत्तियां को पशुचारे में भी खूब उपयोग किया जाता है। इसके अलावा छेमी की फसल का विशेष एग्रीकल्चर महत्व भी है। यह भूमि की उर्वरक्ता बढ़ाने के साथ-साथ अच्छी नाइट्रोजन फिक्शेसन करने में भी मदद् करता है।

भारत के अलावा पूर्व अफ्रीका में छेमी को भोजन में उपयोग हेतु अच्छा उत्पादित किया जाता है। भारत में लगभग 90 प्रतिशत उत्पादन कर्नाटक द्वारा लगभग 18000 टन उत्पादन 85000 हेक्टेयर भूमि पर किया जाता है।

उपरोक्त सभी विशेषताओं को देखते हुये उत्तराखण्ड में छेमी के सीमित उत्पादन को बढावा देने के साथ-साथ इसमें प्रोटीन तथा पोटेशियम के अच्छे प्राकृतिक स्रोत को देखते हुये व्यवसायिक तथा स्वास्थ्य लाभ हेतु उत्पादन किया जा सकता है जो राज्य में आर्थिकी का अच्छा स्रोत बन सकता है।

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