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तक धिनाधिनः मैं कभी बूढ़ा नहीं होऊंगा

ऋषिकेश वो शहर है, जिसने मुझे पत्रकारिता करना सिखाया और आगे बढ़ने का मौका दिया। बहुत अच्छा शहर है और उतने ही अच्छे यहां के लोग। काफी समय बाद ऋषिकेश का रुख किया था। जौलीग्रांट एयरपोर्ट से ऋषिकेश नटराज चौक तक घने जंगल से गुजरती सड़क पर सफर मुझे बहुत पसंद है। सात मोड़ और सड़क पर पेड़ों की छाया, प्रकृति के काफी नजदीक जाने का मौका देती है।
यहां से चंद्रभागा नदी दिखती है। चंद्रभागा बरसाती नदी है और इन दिनों सूखी पड़ी है। यहां चंद्रभागा नदी देहरादून और टिहरी गढ़वाल जिला की सीमा को निर्धारित करती है। ऋषिकेश में चंद्रभागा नाम का घना इलाका भी है, जहां श्रीचंद्रेश्वर महादेव का मंदिर है।
मैं यहां उस ऋषिकेश की बात कर रहा हूं, जो देहरादून जिले में है और जहां पौराणिक श्री भरत मंदिर, श्री वीरभद्र मंदिर और त्रिवेणी घाट हैं। रामझूला और लक्ष्मणझूला टिहरी गढ़वाल और पौड़ी जिले में हैं। गंगा के तट पर बसा हर शहर खूबसूरत है और प्रकृति के बहुत ज्यादा करीब भी।
नटराज चौक से होते हुए हम इंदिरानगर, रेलवे स्टेशन होते हुए शांतिनगर तिराहे पहुंचे। वहां से सीधे हरिद्वार रोड औऱ फिर बैराज, एम्स के सामने से होते हुए श्री वीरभद्र महादेव मंदिर के पास पहुंचे।
तक धिनाधिन की टीम बच्चों को कहानियों के जरिये कोई न कोई संदेश देने या विशेषज्ञों के अनुभवों को उन तक पहुंचाने की कोशिश करती रही है। रविवार को हम ऋषिकेश में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के योग विभागाध्यक्ष डॉ. लक्ष्मी नारायण जोशी जी से उन विषयों पर बात करने आए थे, जिनका संबंध व्यक्तित्व विकास, व्यवहार और बदलती जीवनशैली से है, हम बच्चों और खासकर युवाओं के नजरिये से यह सब जानना चाहते थे।
योगाचार्य डॉ. जोशी लगातार 30 साल से योग सिखा रहे हैं और नाड़ी विज्ञान के विशेषज्ञ भी हैं। वर्षों से देश विदेश में नाड़ी विज्ञान के माध्यम से रोगियों का उपचार कर रहे हैं। लगभग पूरे एशिया और यूरोप के कुछ देशों में बड़ी संख्या में उनके फॉलोअर हैं। खास बात यह है कि डॉ. जोशी योग की शिक्षा और नाड़ी विज्ञान से उपचार निशुल्क करते हैं। उनका कहना है कि मैंने अपने गुरु से योग निशुल्क सीखा। गुरु ने उनसे कहा था कि योग जीवनभर निशुल्क सिखाना। मैं आज भी गुरु को दिए वचन को निभाने के लिए प्रतिबद्ध हूं।
हम ठीक 11 बजे डॉ. जोशी के आवास पर थे। डॉ. जोशी से मेरी लगभग 20 साल पुरानी मित्रता है, लेकिन उनके आवास पर आज पहली बार पहुंचा। उनसे रू-ब-रू भी वर्षों बाद हुआ। सार्थक पांडेय ने उनसे हुई वार्ता को कैमरे में रिकार्ड किया। उनके साथ कहानियों पर भी बात हुई। डॉ. जोशी ने अपने एक अनुभव को साझा करते हुए कहा कि जीवन में सफलता का कोई शॉर्ट कट नहीं होता। यदि आप सफल होना चाहते हैं तो नियमित रूप से मेहनत कीजिए और एक-एक कदम बढ़ाकर आसमां छू लीजिए। सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए राह के हर पड़ाव का अनुभव आपके पास होना चाहिए।
यदि कभी आपको ऊंचाइयों से नीचे आना पड़ा तो मुश्किलों के दौर में भी आपका सामना उन्हीं पड़ावों से होगा, जिनका अनुभव आपके पास पहले से है। क्योंकि सफलता तक पहुंचने के लिए आप पहले भी इनसे ही होकर गुजरे थे। इसलिए सफलता और असफलता, सुख और दुख, आशा और निराशा में आपके व्यक्तित्व व व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। आप स्थिर रहेंगे।
हम बच्चों के व्यवहार में बहुत सारे बदलाव देखते हैं। अपनी इच्छाओं को पूरा कराने की जिद, कुछ पाने के लिए बेचैनी, बात बात पर गुस्सा हो जाना, पढ़ाई में ध्यान नहीं लगाना, ज्यादातर समय मोबाइल पर बिताना, किसी को न सुनना, केवल अपने मन की करने के साथ ही उन पर माता पिता की अपेक्षाओं को पूरा करने का बोझ, जैसी तमाम दिक्कतों को दूर करने में योग कहां फिट बैठता है, का जवाब डॉ. जोशी अपने अनुभव से शुरू करते हुए बताते हैं कि बचपन में मैं भी बहुत जिद्दी था।
मैं सोने का चम्मच लेकर पैदा नहीं हुआ था, लेकिन मैं गरीबी में भी नहीं पला। मेरे माता पिता, भाई, पूरे परिवार ने मुझे स्नेह किया। मेरे परिवार ने स्वयं के लिए अभाव झेल लिया, लेकिन मुझे अभावों में नहीं रखा। बहुत ज्यादा प्यार ने मुझे जिद्दी बना दिया। परिवार के पास उतने संसाधन भी नहीं थे कि मेरी हर उस डिमांड को पूरा कर दिया जाता, जो मैं धनी परिवारों के बच्चों के पास देखकर करता था। हमारे औऱ ताऊजी के बच्चों के लिए कपड़े बनाने के लिए पूरा थान खरीदा जाता था। उसी थान से सबके कपड़े बनते थे। मुझे यह अच्छा नहीं लगता था।
योग और साधना क्रोध को रोकते हैं। निरंतर अभ्यास बच्चों को बेसब्र भी नहीं करेगा और पढाई में उनका एकाग्रता को बढ़ाएगा। मैं पिता से योग सीखने लगा और धीरे-धीरे मेरा रुझान उन सभी बातों से हटने लगा, जिनकी वजह से मुझे बेचैन होना पड़ता था या फिर गुस्सा दिखाना पड़ता था।
वर्षों हो गए मुझे गुस्सा नहीं आता और मेरी जीवन शैली, दिनचर्या व्यवस्थित और समयबद्ध है। अब मैं जिद्दी नहीं हूं। हमने उनकी दिनचर्या पर पूछा तो मालूम हुआ कि डॉ. जोशी रोजाना सुबह तीन बजे सोकर उठ जाते हैं। कहते हैं कि किसी के लिए भी अच्छा इंसान और निरोगी बनना बहुत जरूरी है। योग अच्छे व्यक्तित्व की इस आवश्यकता को पूरा करने सहयोग करता है। योग करने वाले और सामान्य बच्चे के व्यवहार और कार्यकुशलता में काफी अंतर देखने को मिलेगा। योग करने वाला कभी हायपर नहीं होता। बिना गुरु के योग नहीं हो सकता।
नंदी बैलों की सेवा भी उनके रूटीन में शामिल है। उन्होंने ऋषिकेश से लेकर हरिद्वार और ऋषिकेश से लक्ष्मणझूला तक घूम रहे नंदी बैलों का नामकरण किया है। मोबाइल में लिए फोटो व वीडियो दिखाते हुए डॉ. जोशी ने सभी नंदी बैलों के नाम बताए। वीरभद्र मंदिर के पास एक बैल तो पुकारते ही उनके पास पहुंच जाता है।
डॉ. जोशी वर्ष 1989 से योग सीखा रहे हैं। कहते हैं कि योग निशुल्क सिखाते हैं और सिखाते रहेंगे। शुरुआत में छात्र जीवन में उन्होंने ऋषिकेश निवासी पूरण शर्मा जी से कराटे का प्रशिक्षण लिया था। इसके बाद उन्होंने बच्चों को कराटे का प्रशिक्षण दिया। कराटे प्रशिक्षण का शुल्क लिया जाता था। उससे अपने खर्चे पूरे होते थे। ब्लैक बेल्ट हासिल डॉ. जोशी ने 2002 में कराटे को अलविदा कह दिया।
योग में आपको क्या प्रिय है, पर डॉ. जोशी कहते हैं मैं ध्यान को पसंद करता हूं। योग को आप कहां तक ले जाना चाहते हैं, के जवाब में उनका कहना है कि योग अनंत है। योग वह कल्पवृक्ष है, जो आपकी कामनाओं को पूरा करता है। किसी ने योग से धन संपदा मांगे, उसे अनंत धन संपदा मिले। किसी ने प्रसिद्धि मांगी, उसे प्रसिद्धि मिली। किसी ने निरोगी काया और दीर्घायु होने की कामना की, उसे स्वस्थ जीवन और आयु मिले। किसी ने योग के मूल तत्व आध्यात्मिकता को मांगा, उन्हें आध्यात्मिका प्राप्त हुई।
मैं कभी बूढ़ा नहीं होऊंगा। यदि बूढ़ा होऊंगा तो अनुपयोगी नहीं होऊंगा। अंतिम सांस तक योग की कोई न कोई मुद्रा सिखाने की अवस्था में रहूंगा। कोई प्राणायाम बताने की अवस्था में रहूंगा। यह मेरे जीवन का आनंद है कि मैं हमेशा सेवा करता रहूंगा।
डॉ. जोशी के साथ हमने तक धिनाधिन की कहानियों का साझा किया। उन्होंने हमें एक कहानी सुनाई, सहारे को सहारा… जिसमें एक बीज मिट्टी से कहता है,मुझे थोड़ी सी जगह दे दो। मैं भी फूल पत्तियों वाला पौधा बनकर दुनिया को देखना चाहता हूं। मैंने सुना है कि यह दुनिया बहुत खूबसूरत है। जहां पौधे उगते हैं, वह जगह तो प्रकृति के बहुत पास है। मैं भी पेड़ बनकर परोपकार करना चाहता हूं। मिट्टी ने कहा, मुझे कोई दिक्कत नहीं है। जहां मैंने इतने सारे पेड़ पौधों को पोषक तत्व दिए हैं, तुम भी ले लेना। उग जाओ, जहां मन करे।
पौधे ने मिट्टी का शुक्रिया करते हुए कहा, तुम देखना एक दिन मैं तुम्हारे भी काम आऊंगा। मिट्टी ने हंसते हुए जवाब दिया, ठीक है भाई, आ जाना मेरे काम। तुम अब उग जाओ और देख लो खूबसूरत दुनिया को। पौधा उगा और दिन प्रतिदिन बड़ा होता रहा। एक दिन पेड़ बन गया, उसकी जड़ों ने मिट्टी को कसकर जकड़ा था। पौधा खुद को बचाए रखने के लिए मिट्टी को कसकर पकड़े हुए था। उसकी जड़ें ज्यादा गहराई तक थीं।
एक दिन नदी में बाढ़ आई और कई पेड़ों को बहा ले गई। उस बाढ़ में केवल वो पेड़ और उसके आसपास खड़े छोटे पेड़ बचे रहे, क्योंकि पेड़ ने मिट्टी के अस्तित्व को बनाए रखने का वादा जो किया था। उसने बाढ़ के समय अपनी पूरी ताकत से मिट्टी को जकड़ लिया था। मिट्टी ने भी उसकी जड़ों को मजबूत करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। इस तरह एक दूसरे को दिया सहारा मुसीबत में काम आया।
हमने डॉ. जोशी और कक्षा दस की छात्रा रीमा और सरोजिनी को साहसी नन्हा पौधा, मन की ताकत बढ़ाने वाली किताबों, पेड़ घूमने क्यों नहीं जाता, हवा मांग रही अवकाश….कहानियां साझा की। हमने रीमा औऱ सरोजिनी से पूछा, पेड़ घूमने क्यों नहीं जाता। उन्होंने बताया, उसकी जड़ें मिट्टी से जकड़ी होती हैं। जब हमने पूछा कि पेड़ अगर घूमने जाता,तो उनका जवाब था, पेड़ घूमने चला गया तो हवा और आक्सीजन कौन देगा। हमने रीमा से कहा, मान लो आप हवा हैं, आपको प्रकृति से कुछ कहना हो तो क्या कहेंगी। रीमा ने कहा, मैं तो यही कहूंगी कि प्रदूषण फैलाना बंद करो।
डॉ. जोशी से योग और उनके बारे में बहुत सारी बातें हुईं। इसके बाद हम वापस लौटे अपने शहर की ओऱ। त्रिवेणी घाट गए और फिर रास्ते में मित्र धीरेंद्र रांगड़ जी से मुलाकात हुई। सात मोड़ और खाई में दिखती चंद्रभागा नदी का नजारा लेते हुए डोईवाला पहुंचे। फिर मिलेंगे, तब तक के लिए आपको खुशियों और शुभकामनाओं का तक धिनाधिन…।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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