पौंटी गांव तो रवांई का चेरापूंजी है

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पलायन एक चिंतन’ टीम के साथ रवांई के ‘सरबड़ियाड़’ क्षेत्र की यात्रा (13-16 जुलाई 2016)

Arun Kuksaal
डॉ. अरुण कुकसाल

पौंटी गांव आने को है। एक सज्जन ने कहा कि पौंटी गांव इस इलाके का चेरापूंजी है। इसके आस-पास खूब बारिश होती है। मतलब यह है कि ‘ये बारिश बंद नहीं होगी’। मेरे यह कहने पर दो कदम आगे चल रहे आर्य जी अचानक रुके और फिर किनारे के पत्थर पर बैठ ही गये। ऊपर आसमान को देखकर ‘लगता तो ऐसा ही है’ कहकर एक लम्बी ऊफ भरी सांस उन्होंने छोड़ी। आर्य जी को देखकर अल्मोड़ा में बाजार से डीएम आफिस की चढ़ाई चढ़ते वे लोग याद आ गये जो आधी चढ़ाई के बाद अपनी थकान को कम करने के बहाने नंदा देवी मंदिर की तरफ दोनों हाथ जोड़कर थोड़ी देर खड़े होने का सुख ले लेते हैं। पीडी आर्य कानूनगो हैं। उनके क्षेत्र में 45 गांव हैं और मदद के लिए 4 पटवारी तैनात हैं। अब क्या करें वो ? साल में दो-तीन बार बड़ियार की ओर आना-जाना रहता है, उनका। मैं भी उनके पास बैठ जाता हूं।

वे बड़े धीमे से कहते हैं कि ‘एलआईयू की यह रिपार्ट थी कि सांसद प्रदीप टम्टा जी सरबड़ियाड़ की ओर न जाएं। एक जो आज-कल में भारी बारिश की चेतावनी और दूसरी तरफ इस इलाके में ये पेड़ काटने वाला मामला भी हुआ। पर साहब बड़े हिम्मती हैं सांसद जी। ऐसे विधायक-सांसद ही होने चाहिए। तभी कुछ हो सकता है इस पहाड़ का। आर्य जी रवांई के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं। वे बताते हैं कि ‘रवांई का दो-तिहाई हिस्सा वनों और चारागाहों से ढंका है। शेष एक तिहाई में सघन खेती और बागवानी होती है। गेहूं, मार्सा (चौलाई), फाफर, आलू, जौ, झंगोरा, मडुवा, उड़द, राजमा, भट्ट, गहथ, मटर, टमाटर, बथुआ, सेब और अखरोट यहां की प्रमुख पैदावार हैं।

साठ के दशक तक यहां बाहर से बिल्कुल भी अन्न नहीं आता था। अन्न के अलावा ऊनी कपडे में भी ये लोग पूरी तरह आत्मनिर्भर थे। तब इस क्षेत्र से ऊन और अन्न का खूब व्यापार होता था। कभी यहां शहद, जौ और जडी-़बूटियों की शराब बनाई जाती थी, जो आज भी थोड़ा बहुत प्रचलन में है। भेड़ पालन बहुतायत में है। मोनाल, घुरड़, सुअर, काकड़, बारहसिंगा, सफेद और भूरा भालू आदि ऊपरी इलाकों में बहुत पाए जाते हैं। यह इलाका उत्सवों का है। तकरीबन हर तीसरे दिन यहां कोई न कोई उत्सव होता है’।

‘हम पंहुच गये है पौंटी गांव’, एक आवाज गूंजी। सर उठाकर यह देखना चाहा कि कितनी दूर से आयी है, यह आवाज। पर जब पांच कदम आगे चल रहा आदमी ही न दिख रहा हो तो ऊंची धार से आयी आवाज अदृश्य आकाशवाणी ही हुयी हमारे लिए। सुबह से हो रही बारिश अब थोड़ा आराम करने चली गयी है। पर है बड़ी चालाक, कुहरे को अपनी जगह फैला गयी है, हमारे आस-पास। मेहरबानी ये हुयी कि पौंटी गांव पहुंचते ही कोहरा छंट गया है। गांव के एक हिस्से को चढ़ते हुए आगे बड़े तो दूसरी तोक में जाने के लिए सीढ़ी दर सीढ़ी उतरना पड़ा। गांव के मध्य में स्थित भद्रकालीे मंदिर की भव्यता को देखा तो किसकी थकान, सब गायब। पहले मंदिर देखते हैं। परिसर के एक हिस्से को ऊंचाई देकर दो मंजिला भद्रकाली मंदिर है।Slide3

मंदिर के मुख्य द्वार के पास के पास के पत्थर पर संवत् 1010 खुदा है। हे ! बाबा,1 हजार 63 साल पुराना। गांव के एक बुजुर्ग परफैक्ट गाइड़ की तरह बता रहे हैं कि ‘रवांई के 12 गांवों की इष्टदेवी भद्रकाली हैं। भद्रकाली की उत्पत्ति भद्राई डांडा में मानी जाती है। जहां भद्रकाली का प्राचीन मंदिर है। मां भद्रकाली का मेला प्रतिवर्ष दुर्गा अष्टमी को होता है। इस दिन 12 गांवों में देवी की जात्रा जाती है। भद्रकाली एक वर्ष पौंटी और एक वर्ष मोल्डा गांव में बारी-बारी से रहती है। देवी-देवताओं में भद्रकाली का यहां सर्वोच्च सम्मान है। सभी पारिवारिक एवं सामाजिक शुभकार्य मां भद्रकाली से पूछकर ही निश्चित किए जाते हैं’।

एक घर के दलान में गांव के लोगों के साथ बातचीत शुरू होती है। बताया जा रहा है कि पौंटी ग्राम सभा में तीन गांव (छानिका, गोल और पौंटी) शामिल हैं। पौंटी ग्राम सभा में लगभग 100 परिवार हैं। सड़क, स्कूल, अस्पताल न होने का रोष सबकी जुबान पर है। गांव में कहने को तो प्राइमरी स्कूल के साथ जूनियर हाईस्कूल भी है। पर हाल सुन लो, जूनियर हाई स्कूल में केवल 2 बच्चों के एडमिशन हुए हैं। अध्यापक न होने की वजह से विद्यालय महीनों से बंद है।

प्राइमरी के एक शिक्षक हैं, जिनके कभी-कभार ही आते हैं। कौन पूछे ? सड़क आ रही है, सुनते-सुनते 8 साल हो गये। अब हमारे रहते तो आने के लक्षण लगते नहीं सड़क के। ये भी सुना है कि अब सड़क हमारे गांव के पास नहीं आ रही है। हम इसका विरोध करेंगे। और साब, यही हालात रहे तो सारी बड़ियाड़ पट्टी अगले चुनाव का बहिष्कार करेगी। क्या करना है वोट देकर। रोज सुनते हैं ये हो रहा है, वो हो रहा है पर कहां हो रहा है और किसके लिए हो रहा है ? हम नहीं जानते। यहां तो भगवान भरोसे हैं। वैसे, भगवान भी आजकल देहरादून में ही रमते हैं। यहां क्यों आएंगें वो ?

कल के पेड़ काटने वाले किस्से में पौंटी गांव के प्रधान जी को भी लपेटा गया है। प्रधान जी आप भी कुछ बोलो। एक जगह से आवाज आयी। बैठक की बातों को अब तक तल्लीनता से केवल सुनभर रहे प्रधान जी शिल्पकार वर्ग से हैं। ‘मैं क्या बोलूं ? आप लोग बता ही रहें हैं, सब कुछ। अब बताने को है ही क्या ? साहब लोग देख ही रहे हैं। अभी तो बरसात शुरू हुयी है। तब ये बुरा हाल है रास्तों के। चौमासे में तो हम लोग कहीं आने-जाने हिम्मत भी नहीं कर पाते हैं। जंगली जानवर फसल चौपट कर रहे हैं। दवाई और इलाज की व्यवस्था का तो सोचना ही क्या है। मोबाइल टावर इधर हो जाता तो हम जीने-मरने की खबर तो दे पाते सरकार को। बिजली किस जमाने में आयेगी यहां, कोई उम्मीद भी नहीं है। पर सोलर लाइट की व्यवस्था होनी ही चाहिए। बच्चे अपने आप ही कुछ पढ़ तो लेंगे।’

पौंटी गांव से एक फौज और एक पुलिस की नौकरी पर हैं। 10 बच्चे बड़कोट डिग्री कालेज में हैं, जिसमें 3 बालिकाएं हैं। बातचीत तभी रुक पायी जब किसी सज्जन ने यह कहा कि भोजन बन चुका है। पहाड़ी लाल भात और राजमा की दाल के साथ चौलाई की सब्जी। क्या कहने ? खाते-खाते ये भी पता लगा कि गांव के अधिकतर महिला-पुरुष आजकल भेड़-बकरियों के साथ बुग्यालों में हैं या फिर पुरोला के पास रामासिरांई की ओर रह रहे हैं। घर और खेतीबाड़ी की देखभाल के लिए चुनिन्दा लोग ही गांव में हैं। ‘आपको और भात दूं’ कहते हुये एक ग्रामीण भाई से यह भी सुना जाता है कि ‘चौमासे में क्यूं रहेगा कोई यहां। हर चीज की किल्लत जो हुयी’। अभी तो आज का आधा रास्ता ही तय हो पाया है। आगे का मुकाम डिंगाड़ी अभी दूर है। खाने के तुरंत बाद रतन सबको आगे चलने को कहते ही हैं कि बारिश ने भी बोला मैं भी साथ-साथ चलती हूं, आपके। अब क्या करें ? चलना तो है ही। बारिश के रुकने का इंतजार किये बिना आगे बढ़ने लगे। फिर वही मुड़े-तुड़े रास्तों में किच-पिच, फच्च-फच्च की आवाज ही साथ चल रही है। पीठ पर विराजमान भीगे बैग भारी और बेडोल हो गये हैं। रास्ता चढ़ाई का, कहीं-कहीं तो डेढ़ बालिस्त (करीब एक फीट) से भी कम। उस पर जौंकें रास्ते के दायें-बायें लपलपा रही हैं। राजजात 2014 में ज्यूंरागली को पार करने की याद ताजा हो गयी। पर उसमें तो 12 साल बाद चलते हैं, ये तो रोज का रास्ता हुआ। अरे सर, तभी तो हम कह रहे हैं कि सड़क जल्दी लाओ हमारे गांव में। बिशन हाथ पकड़कर रास्ते में आये नाले से पार कराते कहता है। यहां कमाने-धमाने की दिक्कत नहीं है। सब कुछ हुआ। बस बच्चों के पढ़ने और बीमारी में इलाज मिल जाए तो कौन जाना चाहेगा यहां से। ‘ठीक कहा तुमने मैने सुना था, ‘जो आया रवांई वो बना घर जवांई’। कारण यह रहा होगा कि किसी तरह बाहर से यहां पहुंच कर फिर वापस जाने की झंझट में कौन पड़े ‘फुंड फुक्का यहीं शादी करके बस जाता हूं,’ सोचा होगा उन्होने। ‘हां हो सकता है’ कहकर बिशन भी इस मजाक से मुस्कराभर दिया।

देर शाम डिंगारी गांव पहुंचे। घर का युवा कैलाश सुबह से हमारे साथ ही है। ‘सबसे पहले  पैरों से जौंक निकालो अभियान’ शुरू हुआ। ताज्जुब तो ये रहा, महेश की अंगूठी के अंदर भी जौंक दुबकी हुयी थी। रतन जानकारी देते हैं कि ‘जौंक पहले डंक से जगह को सुन्न कर देते है। फिर मजे से कोल्डड्रिंक की तरह खून चूसने लगती है। आदमी हो या पशु देखे ना तो पता चल ही नहीं पाता। ये भी एक बात है कि जौंक का काटना फोड़े/फुंसी , बुखार/सिरदर्द को कम करने के लिए फायदेमंद रहता है’। इस पर विजय का कहना है कि ‘फिर तो यहां से डिब्बों और शीशियों में जौंको को भरकर देहरादून ले जाकर बेचा जा सकता है’। वो शहर तो वैसे ही दूसरी तरह की जौंकों से भर चुका है। इनका असर वहां होगा नहीं। वैसे चीन में जौंकों से इलाज की परम्परा तो है’। बात पर बात आगे बढ़ती जा रही है। रात भी होने को हुयी तो ख्याल आया कि गांव में किसी भी घर में शौचालय नहीं है। स्कूल में दो शौचालय हैं। स्कूल है गांव की ऊपरी धार पर जो यहां से रात के हिसाब से दूर ही है। चलो, चलते हैं की तर्ज पर सभी चलने को हुए। मैं होशियार, रास्ते में ही एक गदेरे के पास ही निपट आया था। और मन ही मन तय कर लिया कि रात का खाना गोल कर दूंगा। रात को इस अनजाने में बाहर बरसात और बाघ दोनों खतरनाक से बढ़कर खौफनाक हैं।

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