Monideepa Sarma Empower Society Interview: देहरादून, 02 जनवरी, 2026ः एम्पावर सोसाइटी’ (Empower Society) देहरादून के माध्यम से संस्था की सचिव मोनीदीपा सरमा उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों और नॉर्थ-ईस्ट में आजीविका संवर्धन का एक अनूठा मॉडल पेश कर रही हैं। यह संस्था स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक शिल्प और आधुनिक कौशल के समन्वय पर केंद्रित है। पेश है newslive24x7.com की उनसे बातचीत के मुख्य अंश:
Monideepa Sarma Empower Society Interview: उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों में ‘रिंगाल’ और ‘बांस’ (Bamboo) जैसे स्थानीय संसाधनों पर विशेष कार्यों के पीछे सोच पर मोनीदीपा सरमा का कहना है, रिंगाल और बांस केवल पौधे नहीं, बल्कि हिमालयी संस्कृति की पहचान हैं। सदियों से हमारे ग्रामीण इनका उपयोग टोकरी या चटाई जैसे पारंपरिक कार्यों में करते आए हैं, लेकिन अब हम इन्हें ‘मॉडर्न आर्ट’ और ‘डिजाइनर प्रोडक्ट्स’ के रूप में विकसित कर रहे हैं। हम गांवों में इसके बाकायदा प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते हैं। हमारा उद्देश्य है कि कारीगर केवल घरेलू सामान न बनाएं, बल्कि बाजार की मांग के अनुसार लैंपशेड, मॉडर्न फर्नीचर और डेकोरेटिव आइटम तैयार करें। जब पारंपरिक शिल्प में आधुनिक फिनिशिंग और डिजाइन जुड़ता है, तो उसकी कीमत और मांग दोनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ जाती है।
Monideepa Sarma Empower Society Interview: ‘स्किल डेवलपमेंट’ और प्रशिक्षण को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के संबंध में उनका कहना है, हम केवल ट्रेनिंग देकर अपना काम खत्म नहीं करते, बल्कि कारीगरों की ‘हैंड-होल्डिंग’ (लगातार सहयोग) करते हैं। एम्पावर सोसाइटी उत्तराखंड के सीमांत जनपदों और नॉर्थ-ईस्ट के कारीगरों के बीच एक सेतु का काम करती है। हम उन्हें उन्नत औजारों का उपयोग करना सिखाते हैं और उन्हें बड़े डिजाइन विशेषज्ञों से जोड़ते हैं। हमारा मुख्य फोकस ‘क्वालिटी कंट्रोल’ पर है ताकि उनके बनाए उत्पाद किसी भी बड़े स्टोर के मानकों पर खरे उतरें। यही असली स्किल डेवलपमेंट है जो एक साधारण कारीगर को ‘आत्मनिर्भर उद्यमी’ बनाता है।
‘क्लाइमेट अवेयरनेस’ और ‘पौधारोपण’ को आजीविका योजनाओं से कैसे जोड़ा जाता है, के सवाल पर उनका कहना है, पर्यावरण और आजीविका एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हम केवल संसाधन का दोहन नहीं सिखाते, बल्कि उनके पुनरुद्धार (Regeneration) पर भी काम करते हैं। हमारी संस्था व्यापक स्तर पर सघन पौधारोपण अभियान चलाती है, जिसमें हम रिंगाल, बांस और चारा प्रजातियों के पौधे लगाने पर जोर देते हैं। हम ग्रामीणों को प्रशिक्षित करते हैं कि अगर वे आज अपनी आजीविका के लिए रिंगाल काट रहे हैं, तो उन्हें भविष्य के लिए पांच नए पौधे भी लगाने होंगे। यह एक ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ है—प्रकृति से लेना और उसे वापस देना। इससे न केवल कच्चा माल सुरक्षित रहता है, बल्कि जल स्रोतों का भी संरक्षण होता है।
उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण और ‘रिवर्स पलायन’ की दिशा में अनुभवों का जिक्र करते हुए एम्पावर सोसाइटी की सचिव मोनीदीपा का कहना है, जब महिलाओं को स्थानीय संसाधनों पर आधारित, जैसे रिंगाल या बांस से उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण मिलता है, तो घर के कार्यों के साथ-साथ आजीविका से भी जुड़ती हैं। जहां तक पलायन की बात है, यदि हम स्थानीय संसाधनों पर आधारित आजीविका उपायों को मजबूत कर दें, तो युवा शहर की ओर नहीं जाएंगे।
उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों के भविष्य के लिए संस्था के विजन पर उनका कहना है, हमारा विजन स्पष्ट है, हिमालय के संसाधन वहीं के लोगों की प्रगति का आधार बनें। हम ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ के मंत्र के साथ उत्तराखंड के उत्पादों को दुनिया के हर कोने तक पहुँचाना चाहते हैं। हम एक ऐसा आत्मनिर्भर मॉडल खड़ा करना चाहते हैं जहाँ आजीविका, पर्यावरण और स्वावलंबन एक साथ मिलकर आगे बढ़ें।













