देहरादून । राजेश पांडेय
Classroom teaching and career mentorship: स्कूल का कमरा सिर्फ चार दीवारों और बेंचों की जगह नहीं होता, यहाँ अलग-अलग पृष्ठभूमि के बच्चे, उनके सपने और उनकी खूबियाँ एक साथ बढ़ती हैं। अक्सर कोर्स खत्म करने और ज्यादा नंबर लाने के चक्कर में पढ़ाई सिर्फ रटने तक सिमट जाती है। दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) एन.के. चड्ढा से रेडियो केदार पर हुई बातचीत से यह साफ समझ आता है कि क्लास में पढ़ाई का तरीका, शिक्षक और बच्चे का रिश्ता और करियर की समझ कैसे बच्चों की जिंदगी बदल सकते हैं।
शिक्षक ही पहले करियर गाइड
अक्सर लोग सोचते हैं कि करियर की सलाह केवल 12वीं के बाद या किसी बड़े काउंसलर के पास जाकर ही ली जा सकती है। काउंसलर की अपनी जगह है, लेकिन रोज साथ रहने वाले शिक्षक ही बच्चे की ताकत और कमजोरियों को सबसे बेहतर समझते हैं। जब शिक्षक बच्चे की जरूरत पर ध्यान देते हैं, तो बच्चे का डर खत्म होता है और वह अपनी परेशानियां खुलकर साझा करने लगता है।
रटने से आजादी: जो सीखें, उसे काम में लाएं
Classroom teaching and career mentorship: किताब का पाठ तब उबाऊ हो जाता है जब हम सिर्फ रटाते हैं और यह नहीं बताते कि असल जिंदगी में उसका क्या काम है। जब बच्चों को अपने तरीके से सोचने और जवाब देने की छूट मिलती है, तो उनका दिमाग खुलता है।
- खुलकर बोलना: बच्चे बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी बात कह सकें।
- सोच में लचीलापन: एक ही बात पर अटके रहने के बजाय अलग-अलग नजरियों से सोचना।
- नया सोचना: लीक से हटकर सोचने पर बच्चे को टोकने के बजाय बढ़ावा देना।
- ज्ञान को जोड़ना: एक विषय में सीखी बात को दूसरी जगह इस्तेमाल करना।
क्लास में बच्चों को सवाल पूछने की पूरी छूट होनी चाहिए। सवाल चाहे जैसा भी हो, पूछने की हिम्मत से ही बच्चे का झिझकना बंद होता है।
सीट बदलना: कोई बच्चा ‘बैकबेंचर’ न रहे
Classroom teaching and career mentorship: अक्सर कुछ बच्चे पीछे की सीट पकड़ लेते हैं और वहीं बैठे रहते हैं, जिससे उनकी झिझक कभी नहीं टूटती। इसका आसान हल यह है कि हर कुछ दिनों में बच्चों की बैठने की जगह बदली जाए। जब हर बच्चा कभी आगे, कभी बीच में और अलग-अलग साथियों के साथ बैठेगा, तो कोई भी खुद को अलग-थलग नहीं समझेगा और आपस में घुलना-मिलना आसान होगा।
शिक्षक और छात्र का रिश्ता: अपनेपन की जरूरत
अच्छा शिक्षक वही है जो बच्चे से दूरी बनाकर न रखे। जब शिक्षक यह जताता है कि वह सिर्फ परीक्षा लेने वाला नहीं बल्कि साथ देने वाला बड़ा है, तो बच्चे का भरोसा बढ़ता है। आज के समय में जब घर पर माता-पिता दोनों व्यस्त रहते हैं, तब शिक्षक का थोड़ा सा वक्त और प्यार बच्चे के लिए बहुत बड़ा संबल बन जाता है।
होमवर्क का बोझ कम, सोचने का वक्त ज्यादा
बहुत ज्यादा और बिना मतलब का होमवर्क बच्चों पर सिर्फ तनाव डालता है। होमवर्क सीमित और काम का होना चाहिए। बच्चों के पास शाम को खेलने, कुछ नया करने और खुद से सोचने का समय जरूर बचना चाहिए। यही खाली समय उन्हें कुछ नया सीखने और समझने का मौका देता है।
मनोविज्ञान में करियर: सिर्फ डॉक्टर या अस्पताल तक सीमित नहीं
12वीं के बाद मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) की पढ़ाई केवल क्लिनिक तक सीमित नहीं है, इसके रास्ते बहुत बड़े हैं:
- कंपनियों में एचआर: बड़ी कंपनियों में सही लोगों को नौकरी पर रखना और काम का माहौल अच्छा रखना।
- सेना और रिसर्च: डीआरडीओ (DRDO) जैसी संस्थाओं में जवानों और अफसरों के चयन और मानसिक मजबूती में मदद करना।
- खेलों में मानसिक तैयारी: क्रिकेट, हॉकी या अन्य खेलों में खिलाड़ियों का तनाव दूर कर उन्हें खेल पर ध्यान लगाने में मदद करना।
- सड़क सुरक्षा: लोग गाड़ी चलाते समय कैसा बर्ताव करते हैं, इस पर शोध करके सड़कों को सुरक्षित बनाना।
असली पढ़ाई वही है जो किताबों को असल जिंदगी से जोड़े। जब क्लास में डर की जगह अपनापन होगा, तभी बच्चे बिना किसी दबाव के आगे बढ़ सकेंगे और एक मजबूत इंसान बन पाएंगे।




