राजेश पांडेय । ऋषिकेश
Jhilmil Gufa Manikoot Parvat: पौड़ी गढ़वाल में श्री नीलकंठ महादेव मंदिर मणिकूट पर्वत पर है। मणिकूट पर्वत के बारे में कहा जाता है कि यहां के घने वनों में ऋषि तपस्या में लीन हैं। इस तपोभूमि पर कदली वन क्षेत्र में झिलमिल गुफा है, जो श्री नीलकंठ महादेव मंदिर से लगभग चार किमी.आगे है। इस क्षेत्र में मां भुवनेश्वरी का मंदिर है, जिसे माता पार्वती के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। नीलकंठ मंदिर आने वाले श्रद्धालु झिलमिल गुफा के दर्शन करने भी जाते हैं, जहां से करीब चार सौ मीटर आगे श्री गणेश गुफा स्थित है।

Jhilmil Gufa Manikoot Parvat: झिलमिल गुफा के बारे में मान्यता है कि यह गुफा सृष्टि की रचना के समय प्राकृतिक रूप से बनी है। यहां भक्त ध्रुव ने पांच वर्ष की आयु में घोर तपस्या करके भगवान विष्णु के दर्शन पाए। सतयुग में यहां सप्त ऋषियों ने तपस्या करके भगवान शिव के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद पाया। झिलमिला गुरुजी ने भी यहां तपस्या की थी। गुरु गोरखनाथ जी ने भी यहां तपस्या की और 66 हजार मंत्र सिद्ध किए। मिलमिल बाबा जी ने भी यहां तप किया था।
गुफा से ऊपर मुक्तिनाथ मंदिर का निर्माण किया गया है। इस मंदिर की बनावट श्रीकेदारनाथ मंदिर की तरह है।
कोठार ग्राम पंचायत में झिलमिल गुफा तक पहुंचने के लिए पौड़ी गढ़वाल जिला स्थित लक्ष्मणझूला से नीलकंठ महादेव तक लगभग 22 किमी. का सड़क मार्ग है। वहीं पैदल यात्रा मार्ग लगभग 14 किमी. है, जो राजाजी पार्क की गौहरी रेंज से होकर है। पैदल यात्रा जानकीसेतु से आगे स्वर्गाश्रम क्षेत्र से शुरू होती है। जंगली जानवरों वाला वन क्षेत्र जोखिम वाला है। कांवड़ यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहीं से होकर जाते हैं। सड़क मार्ग की हालत भी बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। तीखे मोड़ हैं, जहां अनुभवी ड्राइवर की गाड़ी चलाएं तो बेहतर है।
Jhilmil Gufa Manikoot Parvat: श्री गरुड़ मंदिर के सामने से होकर ऊंचाई पर चलते हुए बाईं ओर गंगा में रंग बिरंगी राफ्ट्स देखने का आनंद उठा सकते हैं। थोड़ी ही देर में गंगा का विहंगम नजारा हट जाता है और दिखती है सहायक नदी हेंवल, जिसके एक किनारे विशाल पहाड़ और दूसरी तरफ राफ्टिंग कैंप साइट्स की भरमार है, जो सड़क से नीचे घाटी में दिखाई देती है। नदी किनारे खेतीबाड़ी का काफी एरिया कैंपिंग साइट्स में बदल चुका है। रास्ते में राफ्टिंग के बुकिंग काउंटर बड़ी संख्या में दिखते हैं। रास्ता बहुत अच्छा नहीं है, वीकेंड में इलाका जाम हो जाता है। वैसे, एम्स के सामने चीला बैराज से होते हुए स्वर्गाश्रम- लक्ष्मणझूला पहुंचना जोखिमभरा है। तीखे मोड़ों पर तेजी से चलती गाड़ियां कई बार बाल-बाल बचती हैं। इस रास्ते में कई साइट्स ऐसी हैं, जो लक्ष्मणझूला से लेकर जानकीसेतु होते हुए बैराज तक गंगा दर्शन कराती हैं। यहां से आप चंद्रभागा को भी देख सकते हैं।

श्री पूर्णानंद घाट के पास जानकीसेतु और मुनिकी रेती, ढालवाला-तपोवन मार्ग, शीशमझाड़ी, भजनगढ़, चंद्रेश्वरनगर, ढालवाला तक का इलाका यहां से दिखाई देता है। वाकई बेहद शानदार और सुकून देने वाला दृश्य पेश आता है। पर, ये साइट्स बारिश के बाद साफ वातावरण में देखेंगे तो और भी शानदार होगा। वैसे, इन साइट्स पर बड़ी गाड़ी रोकना मुमकिन नहीं हो पाता, क्योंकि ट्रैफिक प्रेशर के अनुसार सड़क की स्थिति अच्छी नहीं है। बाइक पर भी बहुत संभलकर चलने की जरूरत है।
सामाजिक एवं पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के पैरोकार मोहित उनियाल और पूरी ग्राम यात्रा को कैमरे से डॉक्यूमेंट कर रहे सार्थक पांडेय के साथ यह यात्रा शानदार और रोमांचक रही। लक्ष्मणझूला से तोली ग्राम पंचायत में श्रीनीलकंठ महादेव मंदिर तक कई गांव हैं। यमकेश्वर ब्लॉक का यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य का धनी है। श्रीनीलकंठ महादेव मंदिर से आगे झिलमिल गुफा और मां पार्वती का मंदिर है। झिलमिल गुफा से लगभग सौ-डेढ़ सौ मीटर पहले तक चौपहिया पहुंचता है, पर पूरा रास्ता कच्चा और ऊबड़ खाबड़ है। हमने करीब एक किमी. पहले गाड़ी रोक दी, क्योंकि रास्ता धंसा हुआ था। आगे बढ़ना खतरे से खाली नहीं था।

अब सवाल उठता है, क्या इन शांत वादियों में पर्यटकों की हलचल होनी चाहिए या नहीं? यह सवाल अक्सर उन यात्राओं के दौरान उठता है, जहां शांति और सुकून है, जो प्राकृतिक रूप से बेहद समृद्ध और जैवविविधता के गढ़ हैं। एक पक्ष कहता है, इन स्थानों तक आने के रास्ते बेहतर होने चाहिए। यहां आबादी के लिए सड़क भी चाहिए, क्योंकि उनको प्रतिदिन गांव से बाहर आना जाना होता है। कब तक ग्रामीण लंबी दूरी वाले कच्चे पक्के, ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चलते रहेंगे। सड़क होगी तो प्राकृतिक सौंदर्य वाले गांवों में पर्यटक- यात्री पहुंचेंगे।

होमस्टे से स्वरोजगार, स्थानीय उत्पादों, जिनमें अनाज, दालें और अन्य खाद्य सामग्रियों के साथ हस्तशिल्प उत्पादों, जिनमें कपड़े, रेशों से बनी वस्तुएं भी शामिल हैं, की बिक्री को प्रोत्साहन मिलेगा। पर, इसके साथ ही पर्यटकों एवं यात्रियों के साथ कुछ शर्ते एवं नियमों का होना जरूरी है। वो यहां किसी भी प्रकार की गंदगी नहीं फैलाएं। इस्तेमाल किए गए सामान की पॉलिथीन सहित कूड़ा कचरा अपने साथ ले जाएं। शोर न मचाएं, प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहें। झिलमिल गुफा और श्रीगणेश गुफा के बीच होमस्टे चला रहे यशपाल सिंह बिष्ट भी इसी पक्ष में हैं कि पर्यटकों की संख्या बढ़नी चाहिए। उनका व्यवसाय इसी से बढ़ेगा। आजीविका तो सभी को चाहिए।
लेकिन, दूसरा पक्ष स्पष्ट करता है कि पर्यटक एवं यात्रियों के आने से शोर एवं भीड़ स्वाभाविक है। इससे इस क्षेत्र की नैसर्गिकता और जैवविविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। गंदगी फैलेगी। सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं, स्थानीय निकाय यात्रियों को जागरूक करने के लिए बड़े अभियान चलाते हैं, क्या उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों एवं नदियों के आसपास कचरा छोड़ने वालों की संख्या कम हुई है। क्या शोर कम हुआ है। क्या पर्यटन स्थलों के पास शोरगुल कम हुआ है। जब तक व्यवहार में बदलाव नहीं आएगा, तब तक प्रकृति और उसके पर्यावरण को नुकसान पहुंचता रहेगा।

पिछले रविवार 25 अक्तूबर को रविवार था, इसलिए झिलमिल गुफा तक अन्य दिनों की तुलना में लोग अधिक थे। परन्तु, अन्य दिनों में कम ही लोग पहुंचते हैं। कांवड़ मेले के दिनों में श्रीनीलकंठ मंदिर आने वाले यात्री यहां आते हैं। फाल्गुन माह की महाशिवरात्रि में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। झिलमिल गुफा के पास मेले के लिए दुकानें लगती हैं। भोजनालय खुलते हैं। इन दिनों यात्रियों की संख्या बहुत कम है, इसलिए ये दुकानें और भोजनालय खाली हैं। भोजनालय की पुष्टि वहां मौजूद सीमेंटेड बेंचों के पास मिट्टी से बने चूल्हों से होती है। जब आप आते हैं तो एक बार में तो लगता है कि यह बहुत प्राचीन स्थल है।





