Van Gurjar education Mohammad Rafi: नरेंद्रनगर, 16 अगस्त, 2026ः “तालीम ही दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है। इंसान अगर पढ़ा-लिखा है, तो वह समाज को सही दिशा दे सकता है, लेकिन जाहिलियत इंसान को पीछे धकेलती है।” यह कहना है उत्तराखंड के नरेंद्रनगर मार्ग स्थित सिमलसेत-कुशरैला वन गुर्जर बस्ती के निवासी चौधरी मोहम्मद रफी गुर्जर का, जिनकी उम्र करीब 35 साल है। लोकगायक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाने वाले मोहम्मद रफी की ज़िंदगी का सबसे बड़ा दर्द यह रहा कि वह बचपन में कभी स्कूल की दहलीज नहीं लांघ सके। आज वही दर्द उनकी सबसे बड़ी ताकत बन चुका है, जिसके दम पर वे अपनी पूरी बस्ती की नई पीढ़ी के हाथों में किताबें देखना चाहते हैं।
Van Gurjar education Mohammad Rafi: मोहम्मद रफी का बचपन संघर्षों और अभावों के बीच बीता। बेहद कम उम्र में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। घर में तीन भाई और मां थीं, जिनकी जिम्मेदारी और आजीविका के संघर्ष के चलते कभी औपचारिक स्कूल नहीं जा पाए। लेकिन सीखने की ललक कभी कम नहीं हुई। उन्होंने अपनी मां से उर्दू और अरबी की बुनियादी तालीम ली। बाद में, जब उन्हें दुनिया को समझने और अपनी बात कहने की ज़रूरत महसूस हुई, तो उन्होंने खुद के प्रयास से घर पर ही हिंदी पढ़ना और लिखना सीखा। मोबाइल फोन, इंटरनेट और दोस्तों के सहयोग से ककहरा सीखकर उन्होंने न केवल हिंदी भाषा पर पकड़ बनाई, बल्कि आज सोशल मीडिया पर सक्रियता से अपने विचार लिखते हैं और खुद अपने लोकगीतों की रचना भी करते हैं।
संगीत और गायकी मोहम्मद रफी को विरासत और परिवेश से मिली। उनके माता-पिता ने उनका नाम मशहूर पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के नाम पर रखा था, जिसने उन्हें बचपन से ही गाने के लिए प्रेरित किया। करीब 13-14 साल की उम्र से उन्होंने गोजरी बोली में गाना शुरू किया। उन्होंने पारंपरिक गायकी अपनी मां और नाना से सीखी, जो भट्टी पर मावा बनाते समय लोकगीत गुनगुनाया करते थे। रफी गोजरी बोली में वन गुर्जरों के इतिहास, ऋतु प्रवास (माइग्रेशन), मवेशियों, जंगलों, पर्यावरण और वन्यजीवों से जुड़े पारंपरिक गीतों को गाते हैं। इसके अलावा देशप्रेम से ओत-प्रोत गीत और स्वतंत्रता दिवस पर विशेष रचनाएं भी खुद तैयार करते हैं। वन गुर्जर समाज के बड़े सम्मेलनों, सेला पर्व और विभिन्न आयोजनों में उन्हें विशेष रूप से गाने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
Van Gurjar education Mohammad Rafi: गायन के साथ-साथ मोहम्मद रफी ने अपनी संस्कृति और पहचान को बचाने की एक बड़ी मुहिम शुरू की है। बताते हैं कि वन गुर्जर समाज का पारंपरिक पहनावा, खासकर सिर की खास पगड़ी, समुदाय की ऐतिहासिक पहचान है। उन्होंने सम्मेलनों और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को अपनी पारंपरिक पगड़ी और वेशभूषा से जोड़ने का अभियान शुरू किया। इसके साथ ही जंगलों, पारंपरिक खानपान और औषधीय जड़ी-बूटियों से जुड़े वन गुर्जर समाज के पारंपरिक ज्ञान को सहेजने के लिए भी लोगों को जागरूक कर रहे हैं।
इन तमाम गतिविधियों के केंद्र में मोहम्मद रफी का सबसे बड़ा सपना है—हर वन गुर्जर बच्चे तक शिक्षा पहुंचाना। शुरुआत में समुदाय में शिक्षा के प्रति उदासीनता थी और लोग बच्चों को स्कूल भेजने से कतराते थे। रफी को अपनी ही बस्ती में लोगों को समझाने के लिए भारी विरोध और बहसों का सामना करना पड़ा। उन्होंने जबरन और मनुहार दोनों तरीकों से अभिभावकों को तैयार किया। आज उनकी मेहनत का परिणाम है कि कुशरैला बस्ती के 20 से 25 बच्चे और बच्चियां नियमित स्कूल जा रहे हैं। बस्ती के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि बच्चे, विशेषकर बेटियां, पढ़ाई करते हुए छठी कक्षा तक पहुंच चुकी हैं।
बस्ती से स्कूल की डगर बेहद कठिन और जोखिम भरी है। बारिश के दिनों में पहाड़ों से पत्थर गिरने का खतरा रहता है और जंगल के लंबे रास्ते में जंगली जानवरों का डर बना रहता है। इस सबके बावजूद बच्चे उत्साह के साथ रोजाना स्कूल का सफर तय करते हैं। मोहम्मद रफी अब सामाजिक संस्थाओं और शिक्षाविदों से यह अपील कर रहे हैं कि यदि कोई संस्था इन बच्चों को बस्ती में रोजाना दो से चार घंटे का अतिरिक्त शैक्षणिक सहयोग (ट्यूशन) दे सके, तो जंगलों में जल रही यह शिक्षा की लौ और अधिक मजबूत हो सकेगी। खुद अनपढ़ रहकर समाज को साक्षर बनाने में जुटे मोहम्मद रफी आज पूरे क्षेत्र में बदलाव की एक जीवंत मिसाल बन चुके हैं।



