NMCG-WII Paryavaran Champion Award 2026:देहरादून, 1 जून, 2026ः विश्व पर्यावरण दिवस (5जून) के अवसर पर भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India – WII) और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) की संयुक्त महत्वाकांक्षी परियोजना नमामि गंगे के अंतर्गत सोमवार को संस्थान के मुख्य सभागार में एक ऐतिहासिक भव्य पुरस्कार समारोह संपन्न हुआ। इस विशेष गरिमामयी अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से आए पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और छात्र-छात्राओं ने एक स्वर में हिमालय की पारिस्थितिकी, गंगा की अविरलता और भारत की पारंपरिक लोक चेतना को बचाने का महासंकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण संरक्षण, जन-जागरूकता, सामुदायिक सहभागिता और सतत विकास के सिद्धांतों (Sustainable Practices) को जमीनी स्तर पर क्रियान्वित करने वाले देश के नौ अग्रणी शिक्षण संस्थानों एवं मीडिया संगठनों को प्रतिष्ठित ‘पर्यावरण चैंपियन अवार्ड 2026’ (Paryavaran Champion Award 2026) से विभूषित किया गया।

इस वृहद कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नदियों और उनके उद्गम स्थल हिमालय के वैश्विक संकटों की ओर ध्यान आकर्षित करना और पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से उनके व्यावहारिक समाधान खोजना था। कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत अतिथियों ने पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई। समारोह में स्कूली बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुति के माध्यम से धरा की स्वच्छता तथा गंगा के संरक्षण का आह्वान किया।
प्रकृति की आंतरिक लय ही मानवीय जीवन की आत्माः डॉ. माधुरी बर्थवाल
NMCG-WII Paryavaran Champion Award 2026: समारोह में देश की प्रख्यात लोक संस्कृति मर्मज्ञ और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ लोक गायिका डॉ. माधुरी बर्थवाल ने लोक संगीत, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के अंतर्संबंधों पर एक अत्यंत भावुक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। डॉ. बर्थवाल ने स्पष्ट किया कि प्रकृति का प्रत्येक तत्व एक आंतरिक अनुशासन और लयबद्धता में बंधा हुआ है। वन्यजीवों की आवाज़ें, नदियों का कलकल निनाद और हवा की सरसरायत केवल प्राकृतिक घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ये जीवन के संगीत की मूल कड़ियाँ हैं जो हमें जीवन का आधार प्रदान करती हैं।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “हमारे चारों ओर फैले पक्षी, वनस्पति और हिमालय के ऊंचे बुग्याल एक विशेष नैसर्गिक लय में बंधे हुए हैं। हर प्राकृतिक प्रक्रिया में एक आंतरिक लय होती है, और यह लय ही हमारी आत्मा तथा धड़कन है। यदि मनुष्य के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण यह लय टूट गई, तो पूरी वैश्विक पारिस्थितिकी और मानवीय जीवन समूल नष्ट हो जाएगा। इसलिए प्रकृति की इस लय को बनाए रखना हमारा सर्वोच्च संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य है।”
अपनी लोक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और उद्बोधन को विस्तार देते हुए डॉ. बर्थवाल ने पारंपरिक लोक संगीत की महत्ता को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ा। उन्होंने कहा कि हमारे लोकगीत केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे हमारे पूर्वजों द्वारा संचित किए गए इतिहास, भूगोल, मौसम विज्ञान, रहन-सहन और पर्यावरण संरक्षण के जीवंत दस्तावेज हैं। डॉ. बर्थवाल ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारे ये अमूल्य लोकगीत और पारंपरिक ज्ञान विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। यदि जड़ें ही सूख गईं, तो विकास का वृक्ष कभी हरा-भरा नहीं रह सकता। उन्होंने नई पीढ़ी से अपनी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय जड़ों से फिर से जुड़ने की भावुक अपील की। मंच से उन्होंने जब गंगा स्तुति के पारंपरिक स्वर प्रस्तुत किए।
बढ़ता तापमान महाविनाश का संकेतः पर्यावरणविद् कल्याण सिंह रावत
NMCG-WII Paryavaran Champion Award 2026: समारोह में देश के जाने माने पर्यावरणविद् प्रसिद्ध मैती आंदोलन के प्रणेता पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित कल्याण सिंह रावत ने देश और दुनिया के सामने मंडरा रहे जल संकट, ग्लेशियरों के पिघलने और ग्लोबल वार्मिंग के आंकड़ों को प्रस्तुत किया। वैज्ञानिक शोधों का हवाला देते हुए उन्होंने गोमुख ग्लेशियर की वर्तमान स्थिति पर बेहद चिंताजनक तथ्य साझा किए। गोमुख ग्लेशियर, जो वर्तमान में लगभग 25 किलोमीटर लंबा और 4 किलोमीटर चौड़ा है, मानवीय गतिविधियों और अनियंत्रित प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष खतरनाक गति से पीछे खिसकता जा रहा है। यदि इन ग्लेशियरों के अस्तित्व पर संकट आया, तो सदाबहार मानी जाने वाली गंगा और उसकी सहायक नदियों का जलप्रवाह पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, ऐसी आशंका व्यक्त की।
उन्होंने वैश्विक तापमान (Global Warming) के विनाशकारी प्रभावों की चेतावनी देते हुए बताया गया कि वर्ष 1857 के औद्योगिक काल के आसपास पृथ्वी का औसत तापमान जो लगभग 13.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था, वह आज बढ़कर 15.1 डिग्री सेल्सियस के खतरनाक स्तर को पार कर चुका है। आगाह किया कि यदि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन इसी गति से बढ़ता रहा और पृथ्वी का तापमान 60 डिग्री सेल्सियस के चरम स्तर को छू गया, तो इंसानी शरीर की समस्त चयापचय क्रियाएं (Metabolic activities) पूरी तरह ठप हो जाएंगी और नसें फट जाएंगी। यह तापमान वृद्धि केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जैव-विविधता के लिए एक महाविनाश का संकेत है।
इस सत्र में भारत में गहराते जल संकट को रेखांकित करते हुए कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य साझा किए गए:
ऐतिहासिक रूप से भारत में लगभग 15,000 छोटी-बड़ी नदियां प्रवाहित होती थीं, जिनमें से 30 प्रतिशत नदियां पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं।
वर्तमान में देश के 21 से अधिक बड़े महानगर गंभीर जल संकट के कगार पर खड़े हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए शुद्ध पेयजल जुटाना एक बहुत बड़ी चुनौती बनने जा रहा है।
बुग्यालों का पारिस्थितिकी तंत्र और पूर्वजों का पारंपरिक ज्ञान
NMCG-WII Paryavaran Champion Award 2026: पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने हिमालय की तलहटी और ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले ‘बुग्यालों’ (High-altitude Himalayan Meadows) को संपूर्ण गंगा बेसिन के जीवन का आधार बताया। ये बुग्याल केवल घास के मैदान नहीं हैं, बल्कि ये विशाल प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करते हैं जो मानसून के पानी और पिघलती हुई बर्फ को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं और धीरे-धीरे उन्हें विभिन्न जल धाराओं के रूप में छोड़ते हैं। इन्हीं क्षेत्रों में जटामांसी, कुटकी, कूट, डोलू और सालम पंजा जैसी अत्यंत दुर्लभ और मूल्यवान औषधीय जड़ी-बूटियां उगती हैं।
उन्होंने कहा, पूर्वजों ने इन क्षेत्रों को ‘देवताओं का आंगन’ मानकर इसकी पवित्रता बनाए रखने के कड़े नियम बनाए थे। प्राचीन काल में बुग्यालों में जाने के लिए नंगे पैर जाना, शोर न मचाना, सीटी न बजाना और चटक कपड़े न पहनना जैसे नियम अनिवार्य थे, ताकि वहां का सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित न हो। परंतु आज, पर्यटन और आधुनिक विलासिता के नाम पर इन संवेदनशील बुग्यालों में डीजे बजाए जा रहे हैं, कचरा फेंका जा रहा है और कंक्रीट के निर्माण किए जा रहे हैं, जिससे गंगा का उद्गम स्थल प्रदूषित हो रहा है।
पूर्वजों के इसी पारंपरिक ज्ञान को रेखांकित करते हुए उत्तराखंड के गांवों की एक प्राचीन सुंदर परंपरा का विशेष रूप से उल्लेख किया गया। आज भी पर्वतीय गांवों में जब कोई नई दुल्हन विवाह के पश्चात प्रथम बार ससुराल आती है, तो गांव की महिलाएं उसे सबसे पहले बर्तन देकर गांव के प्राकृतिक जल स्रोत (पंधेरा या नौला) पर ले जाती हैं। वहां दुल्हन जल देव की पूजा करती है और घड़े में पानी भरकर घर लाती है, जिसे परिवार के सभी सदस्यों को पिलाया जाता है। यह कोई साधारण परंपरा नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और पर्यावरणीय संकल्प है, जिसके माध्यम से नई पीढ़ी को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है कि इस गांव को जीवित रखने के लिए इन जल स्रोतों की रक्षा करना उसका प्राथमिक कर्तव्य है।
सामुदायिक सहभागिता ही पर्यावरण संरक्षण का एकमात्र मार्ग: डॉ. रुचि बडोला
भारतीय वन्यजीव संस्थान की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, डीन और परियोजना की नोडल ऑफिसर डॉ. रुचि बडोला ने सामुदायिक सहभागिता और जन-भागीदारी की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। डॉ. बडोला ने कहा, साइंस और सोसाइटी के बीच बेहतर समन्वय से ही इको सिस्टम के संरक्षण की परिकल्पना की जा सकती है। उन्होंने मानव जाति और प्रकृति के बदलते संबंधों पर गंभीर चिंता व्यक्त की।उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों और व्यावहारिक अनुभवों का हवाला देते हुए उपस्थित लोगों, विशेषकर शिक्षकों और छात्रों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग होने का आह्वान किया। डॉ. बडोला ने कहा कि मानव इतिहास में पृथ्वी के संसाधनों का जितना दोहन पिछले 50 वर्षों में हुआ है, उतना पहले कभी नहीं देखा गया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बदलाव प्रकृति का नियम है, लेकिन मानव गतिविधियों ने इस बदलाव की गति को खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिया है।
उन्होंने कहा, पर्यावरण में आ रहे तीव्र बदलाव केवल वैज्ञानिक आंकड़ों (जैसे AQI, जल और मिट्टी की गुणवत्ता) तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह मानव जीवन के संरक्षण के लिए एक बड़ा खतरा बन चुके हैं। कोविड-19 और हाल के वर्षों में सामने आ रहे नए-नए वायरस सीधे तौर पर प्रकृति के असंतुलन का परिणाम हैं। जंगलों, घास के मैदानों (ग्रासलैंड्स) और जल स्रोतों के सिमटने के कारण वन्यजीवों, पालतू जानवरों और इंसानों के बीच की दूरी कम हो गई है। यह बढ़ता हुआ आपसी संपर्क (Interaction) बीमारियों को न्योता दे रहा है। उन्होंने दुनिया भर में गहराते जा रहे पीने के साफ पानी के संकट को आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया। उन्होंने कहा, “प्रकृति अब हमसे हर पल पूछ रही है कि अब आगे क्या? हमें प्रकृति के लिए ही नहीं, बल्कि खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए सजग होना होगा।”
डॉ. बडोला ने कहा, “गंगा की अविरलता, नदियों का पुनरुद्धार और हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण के संरक्षण के लिए हमें समाज के भीतर एक गहरी पर्यावरणीय चेतना को जगाना होगा। डब्ल्यूआईआई-एनएमसीजी परियोजना का मूल आधार ही यही है कि हम स्थानीय समुदायों, युवाओं और शैक्षणिक संस्थानों को इस संरक्षण अभियान का मुख्य कर्णधार बनाएं। पर्यावरण चैंपियन अवार्ड इसी जन-भागीदारी और जमीनी स्तर पर किए जा रहे असाधारण प्रयासों को सम्मानित करने और उन्हें राष्ट्रव्यापी मंच प्रदान करने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।”
डॉ. बडोला ने सम्मानित होने वाले सभी संस्थानों की सराहना करते हुए कहा कि देश के विभिन्न राज्यों से आए ये शैक्षणिक संस्थान अपने-अपने क्षेत्रों में ‘पर्यावरण दूत’ की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं और छात्रों को इस अभियान से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया, क्योंकि वे ही भविष्य के नीति-निर्धारक और पर्यावरण रक्षक हैं।
देश के नौ ‘पर्यावरण चैंपियंस’ का भव्य सम्मान
NMCG-WII Paryavaran Champion Award 2026: समारोह के मुख्य आकर्षण के रूप में, देश के विभिन्न राज्यों में पर्यावरण संरक्षण, गंगा प्रहरी अभियान, कचरा प्रबंधन, सामुदायिक जुड़ाव और सतत विकास के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले नौ शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों एवं संगठनों को ‘पर्यावरण चैंपियन अवार्ड 2026’ से विभूषित किया गया।
| क्र.सं. | संस्थान/संगठन का नाम | प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकारी/प्रतिनिधि |
| 01 | रॉयल ड्रीम वर्ल्ड इंटर कॉलेज, कानपुर, उत्तर प्रदेश | सपना सिंह, प्रधानाचार्या |
| 02 | न्यू गुरुकुल पब्लिक स्कूल, रसालपुर, समस्तीपुर, बिहार | कुणाल, प्रतिनिधि |
| 03 | फुलिया शिक्षानिकेतन, फुलिया कॉलोनी, शांतिपुर, नादिया, पश्चिम बंगाल | कलीमोल्लाह मोल्ला, बीजीपी (BGP) प्रोग्राम प्रभारी |
| 04 | जीपीएस नवाच (GPS Nawach), कैथल, हरियाणा | सन्नी कुमार, बीजीपी (BGP) प्रोग्राम प्रभारी |
| 05 | साजेस सेमरा (SAGES Semra), जीपीएम, छत्तीसगढ़ | नरेंद्र तिवारी, प्रधानाचार्य |
| 06 | पर्यावरण विज्ञान और आपदा प्रबंधन विभाग, बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय, धनबाद, झारखंड | डॉ. रूपम मलिक, विभागाध्यक्ष (HoD) |
| 07 | कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, नेरी, डॉ. वाई. एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, हिमाचल प्रदेश | डॉ. यशस्वी ठाकुर, असिस्टेंट प्रोफेसर |
| 08 | लिंगो मुदियाल कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, आईजीकेवी, नारायणपुर, छत्तीसगढ़ | डॉ. रतना नशीने, डीन (Dean) |
| 09 | रेडियो केदार 91.2 एफएम, उत्तराखंड | राजेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रतिनिधि |
डॉ. संगीता अंगोम ने विजेताओं को सराहा, साझा प्रयासों से ‘गंगा जैव विविधता’ बचाने का आह्वान
NMCG-WII Paryavaran Champion Award 2026: कार्यक्रम में परियोजना की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संगीता अंगोम ने सभी विजेताओं की हौसला-अफजाई करते हुए ‘ज्ञान की साझेदारी’ (Knowledge Sharing) के माध्यम से पर्यावरण और गंगा संरक्षण की मुहिम को आगे बढ़ाने की बात कही। डॉ. अंगोम ने बताया कि इस पुरस्कार के लिए देशभर से 100 से अधिक नामांकन प्राप्त हुए थे। विजेताओं का चयन बेहद कड़े क्राइटेरिया के आधार पर किया गया, जिसमें विशेष रूप से पिछले 3 वर्षों के दौरान पर्यावरण, वन्यजीव संरक्षण और जागरूकता के क्षेत्र में किए गए कार्यों को मुख्य आधार बनाया गया। उन्होंने इस आयोजन को सफल बनाने के लिए पर्दे के पीछे पिछले तीन महीनों से लगातार मेहनत कर रही अपनी पूरी टीम (दानिश, सोफिल, सिमरन, अस्मिका, राहुल गुप्ता, अंशुल, एके पाल आदि) की सराहना की।
डॉ. संगीता ने बताया कि यह पूरा कार्यक्रम संस्थान की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रुचि बडोला के कुशल निर्देशन और मार्गदर्शन में क्रियान्वित किया गया है, जिनका हर कदम पर पूरी टीम को सहयोग मिलता रहा है। उन्होंने कहा कि मंच पर भले ही वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रोफेसर, पर्यावरणविद और गायक (पद्मश्री डॉ. माधुरी बर्थवाल) जैसे अलग-अलग विधाओं के लोग मौजूद हैं, लेकिन हम सभी की प्राथमिकता एक ही है—’पर्यावरण संरक्षण’।
भाषण के समापन पर डॉ. संगीता अंगोम ने विद्या की महत्ता पर एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक साझा किया:
“न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि। व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥”
इसका अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञान (विद्या) एक ऐसा धन है जिसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है और न ही भाइयों में बांटा जा सकता है. यह खर्च करने पर हमेशा बढ़ता है। उन्होंने सभी से अपील की, वे आने वाली पीढ़ी को एक सही दिशा देने के लिए अपने पर्यावरण संबंधी ज्ञान को लगातार साझा करते रहें ताकि गंगा की जैव विविधता को बचाया जा सके।




