Millets and Ganga conservation: राजेश पांडेय. देहरादून, 29 मई, 2026: देहरादून के भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) में नमामि गंगे परियोजना की विषय विशेषज्ञ (Subject Matter Expert (SME)) श्रीमती अनुपमा कुलियाल ने ‘श्री अन्न’ (मिलेट्स) को भविष्य का अनाज बताते हुए इसे गंगा संरक्षण और जन-स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य बताया। उन्होंने अपनी यात्रा साझा करते हुए बताया कि मिलेट्स के प्रति उनका समर्पण एक व्यक्तिगत घटना से उपजा। इस अनुभव ने उन्हें मिलेट्स के वैज्ञानिक और पर्यावरणीय पहलुओं पर शोध करने के लिए प्रेरित किया।
अनुपमा कुलियाल ने भारतीय वन्यजीव संस्थान से वाइल्डलाइफ साइंस में मास्टर्स किया है। इकोलॉजी से संबंधित कई परियोजनाओं पर कार्य किया है। कुछ प्रोजेक्ट मेरे कैप्टिव एनिमल्स से रिलेटेड थे, कुछ लोगों के कॉन्फ्लिक्ट से रिलेटेड थे, जो जंगल के आसपास रहते हैं। किस तरह से वे जंगली जानवरों से जूझ रहे हैं या जंगली जानवर उनकी वजह से जूझ रहे हैं। व्यक्तिगत घटना से उनकी यह यात्रा धीरे-धीरे मिलेट तक पहुंच गई।
Millets and Ganga conservation: उन्होंने बताया, मैंने खुद मिलेट्स को इस्तेमाल करना शुरू किया। मुझे बेनिफिट मिला। फिर मैंने मिलेट्स को लेकर ही ट्रेनिंग कीं। इसके बारे में जानकारी मैं हासिल करने लगीं। जब मैं इसके बारे में और-और जानने लगी, तब मुझे पता चला कि यह कितना इंपॉर्टेंट है, कितना यूजफुल है हमारे पूरे इकोसिस्टम के लिए। यह हमारी कृषि में बहुत बड़ा हिस्सा कॉन्ट्रिब्यूट करता है। हमारी एग्रो-बायोडायवर्सिटी को विकसित करता है। यह हमारे लिए और वन्य जीवों के लिए भी फायदेमंद है।
रेडियो केदार के एक विशेष कार्यक्रम में नमामि गंगे परियोजना की विषय विशेषज्ञ अनुपमा कुलियाल ने ‘श्री अन्न’ यानी मिलेट्स के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए, बल्कि गंगा नदी के संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए भी ‘संजीवनी’ बताया। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) से जुड़ीं श्रीमती कुलियाल ने मिलेट के प्रोत्साहन को अपना मिशन बना लिया। उन्होंने मिलेट्स फॉर लाइफ पुस्तक भी लिखी है।

Millets and Ganga conservation: उन्होंने कहा, मैं कॉम्प्लीमेंट देना चाहूंगी हमारी डीन डॉ. रुचि बडोला को। यह बात 2019 की है जब कोविड स्टार्ट हुआ था। उस समय हम लोगों का एक्सेस नहीं था कि हम गंगा प्रहरियों को बुला पाएं। उस समय डॉ. बडोला ने उनको इस प्रोजेक्ट में एज अ रिसोर्स पर्सन इनवॉल्व किया। हमने 2019 से मिलेट्स को लेकर लोगों को अवेयर करने के लिए ऑनलाइन वर्कशॉप्स और कुकरी क्लासेस आयोजित कीं।
Millets and Ganga conservation: साक्षात्कार के दौरान विषय विशेषज्ञ (Subject Matter Expert (SME) श्रीमती कुलियाल ने कहा, अगर पर्यावरण को लेकर बात करें, मिलेट को ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट क्रॉप’ कहा जाता है। यानी ऐसी फसल जो किसी भी स्ट्रेस में उग सकती हैं। जैसे आजकल बहुत गर्मी हो रही है, इस गर्मी में हमारी फसलें फेल हो जाती हैं, लेकिन मिलेट ऐसी है जो तेज से तेज गर्मी सह सकती है। इस पौधे को उगाने में बहुत कम पानी चाहिए। गंगा का वाटर टेबल एग्रीकल्चर की वजह से नीचे जाता जा रहा है, क्योंकि सिंचाई के लिए बहुत पानी चाहिए। यह फसल 10% कम पानी लेती है।
डॉ. खादर वली, जिन्हें ‘फादर ऑफ मिलेट’ कहा जाता है, उनका कहना है कि जितना पानी हम एक साल धान में लगाते हैं, उससे आप 20 साल तक मिलेट उगाकर लोगों का पेट पाल सकते हैं। यह फसल तेज गर्मी और कठिन परिस्थितियों को सहने में सक्षम है, जो इसे उत्तराखंड की बंजर होती खेती के लिए एक आदर्श विकल्प बनाती है।
मिलेट्स को उगाने के लिए किसी कीटनाशक (Pesticides) की जरूरत नहीं होती। इससे गंगा में मिलने वाले जहरीले कृषि अवशेषों में कमी आती है और भूजल भी शुद्ध रहता है। उनका कहना है, अगर हम ऐसी क्रॉप इंट्रोड्यूस करें जो पानी बचा रही है और जिसमें पेस्टिसाइड नहीं डालना पड़ रहा, तो ऑटोमेटिकली वह गंगा के संरक्षण में कॉन्ट्रिब्यूट कर रही है।
स्वास्थ्य का ‘सुपर फूड’ और प्राकृतिक इंश्योरेंस
Millets and Ganga conservation: श्रीमती कुलियाल ने बताया कि मिलेट्स केवल अनाज नहीं, बल्कि औषधि भी हैं। डॉ. खादर वली ने इनके माध्यम से मधुमेह (Diabetes), रक्तचाप (BP), थायराइड और यहाँ तक कि कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार के लिए 120 प्रोटोकॉल तैयार किए हैं। माइनर मिलेट्स (जैसे कोदो, कुटकी, झंगोरा) में फाइबर की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो हमारे ‘गट माइक्रोबायोम’ (पेट के सूक्ष्मजीवों) को पुष्ट कर मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को ठीक करती है।

नमामि गंगे प्रोजेक्ट का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया, महिलाओं को मिलेट्स के मूल्य संवर्धित उत्पाद (Value Added Items) जैसे लड्डू, बर्फी और नमकीन बनाना सिखाया जा रहा है। अनुपमा कुलियाल ने एक स्लोगन साझा किया: “मोटे अनाज का यह किस्सा होगा, नारी तेरी साड़ी में खिसा (जेब) होगा”। यह आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक है। हालांकि, आज भी कृषि भूमि के मात्र 9% हिस्से पर ही मिलेट्स उगाए जा रहे हैं। सप्लाई चेन की कमी, प्रोसेसिंग यूनिट्स का न होना और पलायन जैसी समस्याएं अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
साक्षात्कार के अंत में अनुपमा कुलियाल ने युवाओं को संदेश दिया कि मिलेट्स ही हमारा भविष्य है। यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र, किसानों की आय और स्वास्थ्य का सबसे बड़ा इंश्योरेंस है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मिलेट्स फॉर लाइफ’ के माध्यम से भी लोगों को इस प्राचीन और समृद्ध कृषि परंपरा से जुड़ने का आह्वान किया।




